रात को मैं चाहे जितने बजे सोऊं,सुबह पांच और छह बजे के बीच नींद खुल ही जाती है। सामने दीवार पर लगी घड़ी में छह बजते-बजते मैं बिस्तर छोड़ ही देता हूं।
मेरा दफ्तर सुबह साढे़ आठ बजे शुरू होता है। दफ्तर अक्सर पैदल ही जाता हूं। घर से दफ्तर तक का सफर मुझे किसी कविता को पढ़ने जैसा लगता है। जैसे अच्छी कविता को हम जितनी बार पढ़ते हैं उतनी बार उसके अलग अर्थ समझ आते हैं। मेरा घर पहली मंजिल पर है। घर से निकलते ही 5 कदम चलता हूं तो सीढि़यां आ जाती हैं। 15 सीढि़यों एक बड़े से आहते में ले जाती हैं। आहते के दरवाजे पर लोहे का बड़ा-सा गेट लगा हुआ है। गेट पर दो कद्दावर कुत्ते होते हैं। वे हर आने-जाने वाले को देखकर भौंकते हैं। पता नहीं वे डरा रहे होते हैं या फिर सूचित कर रहे होते हैं कि कोई आ रहा है या जा रहा है। पर उनकी आक्रामकता देखकर ऐसा लगता है कि अगर वे छूट जाएं तो बोटी-बोटी नोच खाएं ।
कजरारी आंखों वाला कुत्ता
आहते से निकलकर पक्की सड़क पर पूर्व की ओर चल पड़ता हूं। बाईं तरफ बड़ा सा जंगली मैदान है। मैदान के तीन ओर यूकिलिप्टस का जंगल है। दाईं तरफ बस्ती है। और सामने बहुत सारे नारियल के पेड़। सामने राममंदिर है लगभग सौ साल पुराना । दक्षिण भारत के मंदिर बाहर से बहुत सुंदर होते हैं। उन पर इतनी कारीगरी और नक्काशी होती है कि बरबस ही ध्यान उनकी तरफ खिंच जाता है। मेरी तरफ मंदिर की पीठ होती है। मैं मंदिर से पहले ही उत्तर की तरफ एक कच्चे रास्ते पर मुड़ जाता हूं। लगभग सौ मीटर चलने के बाद पक्की सड़क पर पहुंचता हूं। और फिर पश्चिम की ओर चलना शुरू कर देता हूं। सौ मीटर चलने के बाद उत्तर की तरफ मुड़ जाता हूं। यह कजरारी आंखों वाले कुत्ते का इलाका है। उसकी आंखों के चारों तरफ काले गोले बने हैं। दूर से ऐसा लगता है जैसे उसने आंखों में काजल लगाया हो। मेरी तो उससे पहचान हो गई है। पर नए लोगों को देखकर वह भौंकता है। यह पूरा इलाका हलनायकनहल्ली के नाम से जाना जाता है।