सोमवार, 14 दिसंबर 2009

बंगलौर से भोपाल व्‍हाया चैन्‍ने


इस दिवाली पर घर जाने का कार्यक्रम जैसे-तैसे बना। बंगलौर से भोपाल जाने के लिए ट्रेन में रिजर्वेशन ही नहीं मिल रहा था। इस बीच कुछ मित्रों ने सलाह दी कि व्‍हाया चैन्‍ने जाओ। मैंने भोपाल में कबीर से कहा कि एंजेट से पता करो कि टिकट मिल रहा है क्‍या।

अतंत: चैन्‍ने से जीटी एक्‍सप्रेस में भोपाल आने-जाने का रिजर्वेशन मिल गया। बंगलौर से चैन्‍ने और चैन्‍ने से बंगलौर का वापसी टिकट भी करवा लिया।
बंगलौर में जहां रहता हूं वहां से रेल्‍वे स्‍टेशन लगभग 20 किलोमीटर है। इसलिए पंद्रह अक्‍टूबर की सुबह सवा आठ बजे की ट्रेन पकड़ने के लिए घर से पांच की बस से निकलना पड़ा। चैन्‍ने एक्‍सप्रेस में सवार हुआ। लगभग तीन सौ पचास किलोमीटर की यात्रा सात घंटे में तय की। ट्रेन में केवल बैठने का आरक्षण था ,ले‍टने का नहीं। पूरे रास्‍ते जैसा कि होता है, ट्रेन में तरह-तरह की चीजें बेचने वाले लोग आते रहे। पर नोटिस करने वाली बात यह थी कुछ लोग खिलौने और रोजमर्रा उपयोग की प्‍लास्टिक आदि की चीजें बेचने आ रहे थे। पर ये सभी के सभी नेत्रहीन थे। जरूर किसी नेत्रहीन संघ के सदस्‍य होंगे। जिन्‍होंने उन्‍हें इस तरह कमाकर खाने की राह दिखाई होगी।

बंगलौर से चैन्‍ने तक की रेल लाइन पर विद्युतीकरण हो चुका है। चैन्‍ने का रेल्‍वे स्‍टेशन किसी हवाई अड्डे की तरह लगता है। जीटी शाम को सवा सात बजे थी। मैं दोपहर को लगभग साढ़े तीन बजे पहुंच गया था। पहले सोचा बैग अमानती सामान घर में जमा करवा दूं। फिर समझ आया कि एक घंटा तो सामान जमा करने और वापस लेने में ही लगेगा। उससे अच्‍छा है कि साथ में ही रखा जाए। मैं सामान लेकर खाने की खोज में निकल पड़ा। खोज में इसलिए क्‍योंकि स्‍टेशन पर जो रेस्‍टारेंट थे,उनमें घुसने की हिम्‍मत नहीं हुई। स्‍टेशन के बाहर निकलकर थोड़ा भटकने पर एक पंजाबी ढाबा मिला। सबसे अच्‍छी बात यह थी कि वह सचमुच पंजाबी था। वहां मैंने दाल रोटी खाई।