शनिवार, 13 जून 2009

आशियाने की तलाश

जैसा कि अक्‍सर होता है आप नई जगह जाते हैं तो नए लोगों से परिचय होता है नए दोस्‍त बनते हैं। परिचय होने में देर नहीं लगती। देर लगती है दोस्‍ती करने में या दोस्‍त बनाने में। परिचय और दोस्‍ती में अंतर है, बहुत बारीक अंतर। बैंगलोर इतना बड़ा है कि‍ एक ही शहर में रहकर भी आप अपरिचित बने रहते हैं। या परिचितों से शायद वर्षों तक नहीं मिल सकते ।
भोपाल से जब बंगलौर आना तय हुआ तो सबसे पहले अजीम प्रेमजीफाउंडेशन यानी जहां मैं मुझे काम करना था वहां पहले से मौजूद एलेक्‍स एम जार्ज की याद आई। एलेक्‍स पिछले लगभग तीन-चार साल से फाउंडेशन में है। एलेक्‍स एकलव्‍य में भी लगभग पांच साल रहा है। इसलिए उससे एक तरह का परिचय पहले से था। इसीलिए उससे तो हर हाल में मुलाकात होनी ही थी। हुई भी।

मैंने 2 मार्च,2009 को फाउंडेशन ज्‍वाइन किया । पहला एक हफ्ता गेस्‍ट हाउस में रहा। इस बीच एक आशियाना तलाश कर लेने का नोटिस जेब में था। एक शाम एलेक्‍स के साथ बंगलौर की गलियां नापीं। नए तरह के अनुभव अपने खाते में दर्ज किए । एक गली में एक सुंदर सी बिल्डिंग में रहने का इंतजाम था। हर महीने साढ़े तीन हजार खर्च करो और दो और लोगों के साथ एक कमरा आपस में बांट लो। टीवी पर मनपसंद कार्यक्रम देखो। फिल्‍में देखो। क्रिकेट देखो। पलंग मिलेगा, बिस्‍तर सहित। लेकिन सबके पलंग केवल छह-छह इंच के अंतर पर लगाए जाएंगे। खाना मिलेगा। लिफ्ट सुविधा होगी। नीचे चौकीदार नहीं, सिक्‍योरिटी गार्ड होगा। रात को एक तय समय पर दरवाजे पर ताला लग जाएगा। सुबह एक तय समय पर खुलेगा। वहां के मैनेजर ने कहा था और क्‍या चाहिए आपको। जैसे पूछ रहा हो कमी हो तो बताएं। इंतजाम हो जाएगा। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। बस चुपचाप वहां से निकल लिया। मुझे लगा यह तो सर्वसुविधा युक्‍त जेल है।

शनिवार, 6 जून 2009

बंगलौर डायरी


‍बंगलौर आए तीन महीने हो गए हैं। ऐसा लगता नहीं है कि भोपाल छोड़कर बंगलौर में हूं। इसका बहुत कुछ श्रेय शायद मोबाइल फोन को जाता है। लगभग हर रोज नीमा,गोलू,मोलू से बातचीत हो ही जाती है। और किसी न किसी दोस्‍त या परिचित से भी।

फिर भी बंगलौर में ऐसा बहुत कुछ है जो मुझे अलग लगता है।
घर। हां, जहां हम रहते हैं उसे ही तो हम घर कहते हैं। मेरी सुबह ये रातें,जो बंगलौर में बीत रहीं हैं,अब कभी वापस नहीं आएंगी। इन्‍हें जिस छत के नीचे मैं बिता रहा हूं, उसे अगर घर न कहूं तो क्‍या हूं। असल में यह उस जगह का,उस जमीन का अपमान होगा, अनादर होगा। क्‍या घर केवल सामान से बनता है। शायद नहीं। अगर सामान परिभाषा है तो इस घर में मेरे पास सामान के नाम पर दो बैग,सात जोड़ी कपड़े, एक कंबल, दो ओढ़ने की चादर,दो बिछाने की और दो चटाईयां हैं। लेकिन फिर भी मैं वहां रहता हूं। और उसी को घर कहता हूं। केवल मैं ही नहीं हम तीन लोग रहते हैं। बाकी दो के पास तो और भी कम सामान है।