भोजन के बहाने
बंगलौर आ रहा था तो सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर थी कि वहां खाने का क्या होगा। खाना बनाना मुझे आता नहीं है। यह अंदाजा था कि वहां तो केवल इडली, डोसा और सांभर ही खाने को मिलेगा। पर यह भ्रम कुछ ही दिनों में टूट गया।
पहली बात तो यही कि दोपहर का खाना यहां विप्रो की कैंटीन में खाता हूं। जहां उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय दोनों तरह का खाना मिलता है। मजे कि बात यह कि मुझे आंध्रा स्टायल का खाना ज्यादा अच्छा लगता है। वह लगभग उत्तर भारतीय खाने की तरह ही होता है। खाना बाजार की तुलना में बहुत सस्ता है। तीस से पैंतीस रुपए में रोटी,चावल,सब्जी,सांभर,रसम,दाल,मिठाई,दही,पापड़,सलाद,अचार सब कुछ मिलता है भरपेट।
शाम का खाना हम घर पर बनाते हैं मिलकर।
बंगलौर आ रहा था तो सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर थी कि वहां खाने का क्या होगा। खाना बनाना मुझे आता नहीं है। यह अंदाजा था कि वहां तो केवल इडली, डोसा और सांभर ही खाने को मिलेगा। पर यह भ्रम कुछ ही दिनों में टूट गया।
पहली बात तो यही कि दोपहर का खाना यहां विप्रो की कैंटीन में खाता हूं। जहां उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय दोनों तरह का खाना मिलता है। मजे कि बात यह कि मुझे आंध्रा स्टायल का खाना ज्यादा अच्छा लगता है। वह लगभग उत्तर भारतीय खाने की तरह ही होता है। खाना बाजार की तुलना में बहुत सस्ता है। तीस से पैंतीस रुपए में रोटी,चावल,सब्जी,सांभर,रसम,दाल,मिठाई,दही,पापड़,सलाद,अचार सब कुछ मिलता है भरपेट।
शाम का खाना हम घर पर बनाते हैं मिलकर।
