रविवार, 19 जुलाई 2009

दोस्‍तों की दुनिया

भोजन के बहाने
बंगलौर आ रहा था तो सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर थी कि वहां खाने का क्या होगा। खाना बनाना मुझे आता नहीं है। यह अंदाजा था कि वहां तो केवल इडली, डोसा और सांभर ही खाने को मिलेगा। पर यह भ्रम कुछ ही दिनों में टूट गया।

पहली बात तो यही कि दोपहर का खाना यहां विप्रो की कैंटीन में खाता हूं। जहां उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय दोनों तरह का खाना मिलता है। मजे कि बात यह कि मुझे आंध्रा स्टायल का खाना ज्यादा अच्छा लगता है। वह लगभग उत्त‍र भारतीय खाने की तरह ही होता है। खाना बाजार की तुलना में बहुत सस्ता है। तीस से पैंतीस रुपए में रोटी,चावल,सब्जी,सांभर,रसम,दाल,मिठाई,दही,पापड़,सलाद,अचार सब कुछ मिलता है भरपेट।

शाम का खाना हम घर पर बनाते हैं मिलकर।

शनिवार, 11 जुलाई 2009

बंगलौर: दो

फूल
यहां अल्‍लसुबह
बगीचे में नहीं
महिलाओं की
चोटी में खिलते हैं

राह चलते
नजरें उनके
नितम्‍बों पर नहीं
उनकी चोटियों के साथ झूलती
वेणियों पर टिकती हैं
फूलों की सुंदरता निहारते हम
नितम्‍बों का मोहक नृत्‍य भूल जाते हैं

हमारा आदिम मन
वासना नहीं साधना
की ओर जाता है

सोचते हैं
फूलों के रंग
वेणी की बनावट
उसमें फूलों की सजावट

सोचते हैं
वेणी बनाने वाले
धागे में फूल पिरोने वाले
हाथों के बारे में

सोचते हैं
उन्‍हें बगीचे में
देर रात या कि मुंह अंधेरे
पौधे से उतारने वाले
कांपते हाथों के बारे में

सोचते हैं
साइकिल के पीछे
परातनुमा डलिया में रखकर
फर्राटा भरते छोकरे के बारे में
या कि
सिर पर धरे डलिया
आवाज लगाती
बिना अपने बालों में लगाए वेणी
वेणी बेचती औरत के बारे में

सोचते हैं
यहां अल्‍लसुबह
जैस्‍मीन, सेंवती और ऐसे तमाम फूलों के बारे में
जो बगीचे में नहीं
महिलाओं के जूडे़ में
खिलते हैं।

राजेश उत्‍साही

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

रेलगाड़ी से चीलगाड़ी में

मैं उस जमाने का हूं जब रेलगाड़ी भी ज्‍यादातर लोगों के लिए एक अजूबा थी। बेशक हमारे ही देश के कई इलाकों में अब भी लोग केवल इसके बारे में सुनते भर हैं। मेरी पत्‍नी निर्मला ने अपनी शादी तक रेलगाड़ी नहीं देखी थी। वह कालेज में हिन्‍दी की अध्‍यापिका थी।

मुझे याद है मैं पहली में था। मध्‍यप्रदेश में होशंगाबाद और इटारसी के बीच एक रेल्‍वे स्‍टेशन है पवारखेड़ा। वहां स्‍टेशन के पास ही रहता था। रोज सुबह लगभग नौ बजे जनता एक्‍सप्रेस दिल्‍ली की ओर से आती थी। यह उसका रोज का क्रम था। उसमें चपटे मुंह का कोयले वाला इंजन लगता था। जिसे हम चपटा इंजन ही कहते थे। लेकिन एक दिन वह हम सबके लिए खासकर बच्‍चों के लिए विशेष हो गई। उसमें गोल और नुकीले मुंह का इंजन लगकर आया। जैसे इंजन में किसी ने नाक लगा दी हो। इस इंजन को खूब सजा-धजाकर गाड़ी में लगाया जाता था। हम बच्‍चों ने चपटे इंजन का नाम अब नकटा इंजन रख दिया था। और इस नए इंजन को नाम दिया था-नाक वाला इंजन। हमें हर सुबह जिस चीज का इंतजार सबसे ज्‍यादा रहता वह यह इंजन ही था।

अब आप सोच सकते हैं कि जब इंजन को लेकर हम इतने दीवाने थे, तो चीलगाड़ी यानी हवाई जहाज को देखकर हमारी क्‍या हालत होती होगी। जब भी हवाई जहाज की आवाज सुनाई पड़ती तो सब कुछ छोड़कर उसे खोजने निकल पड़ते। एक बार नजर भर आ जाता तो फिर जब तक वह दूर बादलों में खो नहीं जाता तब तक उसका पीछा करते रहते। कभी भूले से कोई हवाई जहाज बहुत नीचे उड़ान भरता हुआ चला जाता,तब तो बस आंखें बाहर ही नहीं आतीं बाकी सब कोशिश कर लेते। धीरे-धीरे नाक वाला इंजन, फिर डीजल इंजन और फिर हवाई जहाज रोजमर्रा की बात हो गई। वो रोमांच नहीं रहा।

उम्र ज्‍यों ज्‍यों बढ़ती है, रोमांच के विषय या दायरे बदलते जाते हैं। हवाई जहाज के बारे में रोमांच का दायरा इतना ही बड़ा कि एक दिन भोपाल के हवाई अड्डे पर जाकर हवाई जहाज को उतरते और रनवे से उड़ते हुए देख लिया। अगला दायरा था हवाई जहाज में बैठकर कैसा लगता होगा। हम कभी हवाई जहाज में बैठेंगे यह तो सोच ही नहीं सकते थे।