गुरुवार, २८ जनवरी २०१०

बंगलौर में मकर सक्रांति पर दाल-बाटी की दावत


बंगलौर में यह मेरी पहली सक्रांति थी। होशंगाबाद की नर्मदा नदी,तिल के लड्डू  और घर की दाल बाटी की याद याना स्‍वाभाविक था। सक्रांति यहां भी मनाई जाती है। और पड़ोस के राज्‍य यानी तमिलनाडु में पोंगल के नाम से। सो सक्रांति की छुट्टी तो थी। जिस बिल्‍डिंग में रहता हूं, वहां मेरे दो और साथी ,जो स्‍वयं उत्‍तर भारतीय हैं ,और मकर संक्रा‍ति से अच्‍छी तरह परिचित हैं। हम सब अकेले ही हैं। मेरा परिवार भोपाल में है। और बाकी दोनों की अभी शादी नहीं हुई। दोनों मतलब सैयद मुनव्‍वर अली मासूम(दूसरे चित्र में यही हमारे मुख्‍य रसोईया हैं) और यशवेन्‍द्र सिंह रावत (पहले चित्र में यही महाशय हैं जो बता रहे हैं कि बाटी बनाने का आयोजन इस घर के अंदर हो रहा है। बाकी सब फोटो इन्‍होंने ही लिए हैं। कैमरा भी उनका है)

योजना बनी कि आज दाल-बाटी बनाई जाए। कंडे की जुगाड़ करना आसान था। क्‍योंकि जहां हम रहते हैं वह बंगलौर का ग्रामीण इलाका ही है। पर फिर लगा कौन इतनी झंझट करे। बंगलौर में कहीं न कहीं जरूर कोई ऐसी होटल या रेस्‍टारेंट या ढाबा होगा जहां बाटी खाने को मिल ही जाएगी। परिचितों को फोन लगाया। एक- दो सूत्र मिले। तैयार होकर निकले कि चलो ढूंढते हैं।

बस पकड़ने के लिए मुख्‍य सड़क पर यानी विप्रो के सामने मोरी गेट तक आना पड़ता है। रास्‍ते में तमाम दुकानें पड़ती हैं। उनमें से एक है सुरेश अंबानी की दुकान। बरतन और घर की अन्‍य तमाम चीजों की दुकान। आते-जाते हम लोग पांचेक मिनट उसकी दुकान पर जरूर रूकते हैं। सुरेश राजस्‍थान का रहने वाला है। हमने उससे पूछा कि बाटी कहां मिलेगी। उसने भी एक-दो जगह बताईं। फिर कहा अरे आप घर में बनाईए न। हमने कहा कैसे? गैस पर कैसे बनाएंगे? हमारे पास तो ओवन भी नहीं है। उसने टोस्‍ट सेंकने वाली एक जाली निकालकर दी और कहा इस पर बनाईए। बाटी बनाओ और इस पर रख दो, उस पर कड़ाई उल्‍टी कर दो। बाटी सिक जाएगी। हम तीनों ने एक-दूसरे को देखा और तय किया कि आज यह प्रयोग हो ही जाए।
रात को भोपाल में पत्‍नी नीमा से मैंने पूछा था कि बाटी बनाने के लिए क्‍या  करना होगा। यह मुझे पता था कि उसके लिए आटा थोड़ा मोटा चाहिए होता है। वह अलग से पिसवाना होता है। नीमा ने कहा था कि अगर मोटा आटा नहीं मिले तो उसमें थोड़ा रवा मिलाने से काम बन जाता है।

तो बस जाली और किराने की दुकान से बाटी के लिए आटा,रवा,घी,अजवायन आदि सब खरीदकर उल्‍टे पांव घर की तरफ रवाना हुए।

आटा गूंथने का काम यशवेन्‍द्र यानी यश बहुत अच्‍छे से करते हैं। पर यह जिम्‍मेदारी फाउंडेशन की हमारी एक और सहयोगी सुवर्णा ने ले ली(इन्‍हें तो आप देख ही सकते हैं,आटा गूंथते हुए)। वह भी उसी बिल्डिंग में रहती थीं। थीं इसलिए कि सक्रांति के दो दिन बाद ही वे मंडिया(पास का एक जिला। जहां उन्‍हें अपना फील्‍डवर्क करना है) चली गईं। आटे में पहले रवा मिलाया,फिर अजवायन और थोड़ा नमक। फिर थोड़ा घी भी डाला।

दाल बनाने की जिम्‍मेदारी सैयद ने ली । क्‍योंकि वे सब्‍जी और दाल बहुत स्‍वादिष्‍ट बनाते हैं। बाटी सेंकने की जिम्‍मेदारी मेरी थी। पहले मैंने बाटी बनाई। उसे देखकर सुवर्णा ने कहा ये ठीक नहीं हैं। मैं बनाती हूं।  

मैंने गैस पर जाली रखकर उस पर बाटियां रखीं। चिमटे से उनको उल्‍टा–पलटा और फिर थोड़ी देर के लिए कड़ाई से ढक दिया। दो घंटे की मेहनत के बाद बाटियां तैयार थीं। एक-एक करके उनको कटोरी में घी का स्‍नान कराया गया। और फिर उसके बाद हम तीनों खाने बैठे। सुवर्णा ने बाटी पहली बार देखी थी। वे अपना उस दिन का खाना खा चुकी थीं,इसलिए उन्‍होंने नहीं खाई।

बाटी थोड़ी कड़क जरूर बनी थीं, पर उससे खाने के आनंद में कोई अंतर नहीं आया। मुझे पता है कि बाटियां देखकर आपके मुंह में भी पानी जरूर आ रहा होगा। तो आप भी कभी यह प्रयोग कर डालिए।


बुधवार, १३ जनवरी २०१०

बंगलौर के लालबाग में दो दीवाने







सोमवार, १४ दिसम्बर २००९

बंगलौर से भोपाल व्‍हाया चैन्‍ने


इस दिवाली पर घर जाने का कार्यक्रम जैसे-तैसे बना। बंगलौर से भोपाल जाने के लिए ट्रेन में रिजर्वेशन ही नहीं मिल रहा था। इस बीच कुछ मित्रों ने सलाह दी कि व्‍हाया चैन्‍ने जाओ। मैंने भोपाल में कबीर से कहा कि एंजेट से पता करो कि टिकट मिल रहा है क्‍या।

अतंत: चैन्‍ने से जीटी एक्‍सप्रेस में भोपाल आने-जाने का रिजर्वेशन मिल गया। बंगलौर से चैन्‍ने और चैन्‍ने से बंगलौर का वापसी टिकट भी करवा लिया।
बंगलौर में जहां रहता हूं वहां से रेल्‍वे स्‍टेशन लगभग 20 किलोमीटर है। इसलिए पंद्रह अक्‍टूबर की सुबह सवा आठ बजे की ट्रेन पकड़ने के लिए घर से पांच की बस से निकलना पड़ा। चैन्‍ने एक्‍सप्रेस में सवार हुआ। लगभग तीन सौ पचास किलोमीटर की यात्रा सात घंटे में तय की। ट्रेन में केवल बैठने का आरक्षण था ,ले‍टने का नहीं। पूरे रास्‍ते जैसा कि होता है, ट्रेन में तरह-तरह की चीजें बेचने वाले लोग आते रहे। पर नोटिस करने वाली बात यह थी कुछ लोग खिलौने और रोजमर्रा उपयोग की प्‍लास्टिक आदि की चीजें बेचने आ रहे थे। पर ये सभी के सभी नेत्रहीन थे। जरूर किसी नेत्रहीन संघ के सदस्‍य होंगे। जिन्‍होंने उन्‍हें इस तरह कमाकर खाने की राह दिखाई होगी।

बंगलौर से चैन्‍ने तक की रेल लाइन पर विद्युतीकरण हो चुका है। चैन्‍ने का रेल्‍वे स्‍टेशन किसी हवाई अड्डे की तरह लगता है। जीटी शाम को सवा सात बजे थी। मैं दोपहर को लगभग साढ़े तीन बजे पहुंच गया था। पहले सोचा बैग अमानती सामान घर में जमा करवा दूं। फिर समझ आया कि एक घंटा तो सामान जमा करने और वापस लेने में ही लगेगा। उससे अच्‍छा है कि साथ में ही रखा जाए। मैं सामान लेकर खाने की खोज में निकल पड़ा। खोज में इसलिए क्‍योंकि स्‍टेशन पर जो रेस्‍टारेंट थे,उनमें घुसने की हिम्‍मत नहीं हुई। स्‍टेशन के बाहर निकलकर थोड़ा भटकने पर एक पंजाबी ढाबा मिला। सबसे अच्‍छी बात यह थी कि वह सचमुच पंजाबी था। वहां मैंने दाल रोटी खाई। 

फिर खरामा-खरामा कदमों से स्‍टेशन लौट आया। जीटी अपने निर्धारित समय से लगभग घंटे भर बाद चली। मेरा टिकट झांसी तक का था। डिब्‍बे में लगभग सभी उत्‍तर भारतीय ही थे। जाहिर है सभी दिवाली पर अपने घर जा रहे थे। पंद्रह की पूरी रात और सोलह का पूरा दिन  ट्रेन में गुजारकर शाम को भोपाल पहुंचा। ट्रेन से उतरते ही मोबाइल पर एकलव्‍य के वरिष्‍ठ साथी टीसी कोटवानी जी का फोन आ गया। वे पूछ रहे थे, मैं दिवाली पर कहां रहूंगा। दिवाली सत्रह की थी।
लगभग हर दिवाली होशंगाबाद में मनती रही है। लेकिन इस दिवाली पर होशंगाबाद जाना नहीं हुआ। मैं अगले दिन होशंगाबाद गया। सबसे मिलकर शाम को वापस आ गया। फिर तेईस तक भोपाल में ही था।

एकलव्‍य से छह महीने का अवैतनिक अवकाश लिया था। उसकी मियाद भी अगस्‍त अंत में खत्‍म हो गई थी। अतंत: भारी मन से एकलव्‍य जाकर औपचारिक रूप से इस्‍तीफा लिखकर दे आया। 1982 में शुरू हुए सफर का अंत था यह। सत्‍ताइस साल में बस कुछ ही महीने कम। कुछ दिन पहले किसी ने पूछा था, ‘यानी अब आप एकलव्‍य में नहीं हैं।’  अनायास ही मेरे मुंह से निकला था, ‘हां, पर एकलव्‍य मुझ में है और हमेशा रहेगा।’

कंडक्‍टर से झड़प और सलोना चेहरा
चौबीस की सुबह जीटी से वापसी थी। रास्‍ते भर खाना,चाय और दूसरा सामान बेचने वाले वही चेहरे दिखे जो जाते समय दिखे थे। नागपुर से थोड़ा आगे निकलकर लकड़ी का सामान बेचने वाली महिलाएं लगभग हर दस-पंद्रह मिनट में डिब्‍बे में मौजूद होती थीं। आते समय मेरी साइड अपर बर्थ थी। लेकिन इस बार मेरे कूपे में मुझे छोड़कर बाकी सवारियां मथुरा से आ रही थीं। असल में पूरी ट्रेन के हर डिब्‍बे में हरे कृष्‍णा संप्रदाय के लोग थे। ये लोग भी उनके साथ ही थे। उनका खाने का अपना इंतजाम था। मेरी मिडिल बर्थ थी, पर उनके आग्रह पर मैं ऊपर वाली बर्थ पर चला गया था। यह टिकट भी भोपाल की बजाय विदिशा से थी। होशंगाबाद के निकलते ही मैं ऊपर की बर्थ पर चढ़कर सो गया। उठा तो वहीं ऊपर ही बैठा रहा। दो कूपे छोड़कर तीसरे कूपे की साइड वाली सीट पर एक सांवली महिला थी। वह अपने मोबाइल पर गाने सुन रही थी। साथ-साथ गा भी रही थी। उसके चेहरे पर कुछ ऐसा सलोनापन था कि बार-बार नजर उससे टकरा ही जाती। मैं उसके हिलते हुए होंटों को देखकर यह बूझने की कोशिश करने में लगा रहा कि वह कौन से गीत गा रही होगी। मेरे हाथ में धर्मवीर भारती का उपन्‍यास ‘गुनाहों का देवता’ था। उपन्‍यास पढ़ते हुए और गानों की पहेली हल करते हुए दिन बीत गया।

शाम घिर आई। अचानक एक लड़के ने आकर मुझसे कहा कि उठिए यह सीट मेरी है। मुझे कुछ समझ नहीं आया। हम दोनों बहस करने लगे। मैंने अपना टिकट उसे दिखाया, उसने अपना। असल में उसका टिकट आरएसी में था। चूंकि मैं विदिशा के बजाय भोपाल से सवार हुआ था। और वह भी अपनी वास्‍तविक बर्थ पर न होकर अन्‍य किसी बर्थ पर था, सो भोपाल के कंडक्‍टर ने मुझे नहीं आया मानकर मेरी बर्थ खाली मार्क कर दी थी। नतीजा यह हुआ कि यहां जो कंडक्‍टर आया उसने बर्थ आरएसी के एवज में उसे दे दी। अब मेरी बहस लड़़के के बजाय कंडक्‍टर से हो रही थी। मुझे ऐसा लगा कि कंडक्‍टर नशे में था। उसकी जबान लड़खड़ा रही थी और मुंह से गंध आ रही थी। अंतत: मामला निपटा और मैं अपनी बर्थ पर ही था। उस लड़के को कंडक्‍टर को दूसरी बर्थ देनी पड़ी। पर इस घटना से मैंने सबक लिया कि ट्रेन में आपको जैसे ही कंडक्‍टर दिखाई दे, अपनी टिकट उसे जरूर दिखा दें।

खैर चौबीस का पूरा दिन और रात का ट्रेन में गुजारकर एक बार फिर चैन्‍ने स्‍टेशन पर था। सुबह के अभी छह ही बजे थे। बंगलौर के लिए ट्रेन दिन में दो बजे थी। यह समय कैसे काटा जाए यह जानने के लिए मैंने साथ के सह यात्रियों से चर्चा की थी। उन्‍होंने ही सुझाव दिया था कि मरीना बीच पास में ही है,वहां चले जाएं। सामान अमानती घर में जमा करके चैन्‍ने के मरीना बीच के लिए निकल पड़ा।

मरीना बीच पर मधुबी जोशी की बातें
केवल सात रूपए खर्च करके मरीना बीच के किनारे था। सड़क से लगभग एक किलोमीटर रेत में चलने के बाद समुद्र यानी बंगाल की खाड़ी के किनारे था। अपने जीवन में दूसरी बार समु्द्र के किनारे। पहली बार जब बारह-तेरह बरस की उम्र में जगन्‍नाथपुरी में समुद्र देखा था। साथ में लेपटाप का बैग था, इसलिए समुद्र की लहरों में अंदर तक जाने का संयोग नहीं हुआ। हालांकि मन बहुत था। पर बीच के किनारे-किनारे राजकपूर की स्‍टायल में पैंट को घुटनों तक चढ़ाकर   लगभग तीन घंटे तक टहलता रहा। अटखेलियां करती समुद्र की लहरों के बीच कई जवानियां अटखेलियां कर रही थीं। शोर करती लहरों के बीच मैंने अपने कुछ दोस्‍तों से मोबाइल पर बात करके ही मन बहलाया।

मरीना बीच की इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान एक जिंदादिल दोस्‍त मधुबी जोशी से लगभग पच्‍चीस-तीस मिनट तक बातचीत होती रही।मधुजी की बातें भी समु्द्र की अनंत गहराईयों की तरह होती हैं। जब वे बतियाना शुरू करतीं हैं तो बस उनकी बातों पर सवार होकर हम दूर-दूर तक निकल जाते हैं। और अगर यह अहसास नहीं हो कि बातें फोन पर हो रही हैं तो शायद बात करते-करते सदियां बीत जाएं, पर बातों की अनंत राशि कभी खत्‍म न हो। उनके पास सुनाने के लिए हर बार इतना कुछ होता है कि कभी-कभी मुझे आश्‍चर्य होता है कि वे सचमुच बोल रही हैं या अपनी किसी डायरी के पन्‍ने पढ़ रही हैं। उनसे पहली मुलाकात लखनऊ की एक कार्यशाला में हुई थी। वहां यह नाचीज मधुजी को बच्‍चों के लिए कहानी लिखना सिखाने की जुर्रत कर रहा था। पता चला कि वे तो खुद एक उपन्‍यास हैं। बहरहाल उसके बाद से उनसे दोस्‍ती का कुछ ऐसा रिश्‍ता बना कि अब तक निभ रहा है। पिछले नवम्‍बर में वे दिल्‍ली में रूमटूरीड की एक कार्यशाला में टकरा गईं थीं।


हमारे टकराने का यह आयोजन एक और जिंदादिल दोस्‍त रंजना ने किया था। रंजना रूमटूरीड में लोकल लैंग्‍वेज प्रोग्राम आफीसर हैं। मैं वहां रूमटूरीड द्वारा चुने हुए उभरते लेखकों से कहानियां लिखवाने की कोशिश कर रहा था।(ऊपर के फोटो में मेरे साथ मधु बी जोशी हैं। नीचे बाएं फोटो में रंजना। दोनों फोटो रूमटूरीड कार्यशाला के हैं।)

खैर इस तरह मरीना बीच मेरी यादों में हमेशा के लिए बस गया। कहते हैं पहले बहुत सुंदर था। लेकिन कुछ साल पहले आए सुनामी ने इसे उजाड़ डाला। दिन होने के कारण दो-ढाई सौ से ज्‍यादा लोग नहीं थे। पर लगता था कि शाम को अच्‍छी खासी भीड़ और रौनक होती होगी। यादगार के तौर पर अपने कुछ और दोस्‍तों के लिए बीच की दुकान से चाबी के गुच्‍छे खरीदे। फिर स्‍टेशन लौट आया।

यादगार सफर
बंगलौर जाने वाली ट्रेन में सवार हुआ तो देखकर सुखद आश्‍चर्य हुआ कि मेरे आगे वाली सीट पर वही सलोनी महिला थी जो जीटी में गाना गाकर अपना दिल बहला रही थी। जीटी में तो उससे कोई परिचय नहीं हुआ था। पर यहां हम एक दूसरे को देखकर स्‍वाभाविक रूप से मुस्‍करा दिए। और फिर परिचय भी हुआ। देवी जी वैष्‍णों देवी की यात्रा करके लौट रहीं थी। बंगलौर में रहती हैं। कुछ और दोस्‍त भी साथ थे, वे चैन्‍ने में उतर गए। चैन्‍ने से बंगलौर की इस यात्रा में जो अंत में याद रखने वाली बात है वह यह कि ट्रेन में राजस्‍थान के कॉलेजों के एनसीसी के एयरविंग के 40 छात्र-छात्राओं का एक दल भी कैम्‍प के लिए बंगलौर जा रहा था। संयोग से मेरे बगल की सीट पर एक लड़की थी जो अपने दल की मुखिया थी। उससे भी परिचय हुआ और उसने भी परिचय लिया। उसके साथ उसके तीन जूनियर, जो दोस्‍त भी थे। उनकी बातों में अल्‍हड़पन था और इस उम्र का खिलंदड़पन भी। मुझे उनकी बातें सुनकर अच्‍छा भी लग रहा था और ईर्ष्‍या भी हो रही थी। क्‍योंकि हमने यह उम्र एक तरह के संकोच और बंदिशों के बीच गुजारी थी। अंतत: एक यादगार सफर अपने अंजाम पर पहुंचा। यह बंगलौर आने के बाद यह पहली यात्रा थी, जो पूरी तरह निजी थी।
        

मंगलवार, १३ अक्तूबर २००९

सफर: घर से दफ्तर, दफ्तर से घर


रात को मैं चाहे जितने बजे सोऊं,सुबह पांच और छह बजे के बीच नींद खुल ही जाती है।  सामने दीवार पर लगी घड़ी में छह बजते-‍बजते मैं बिस्‍तर छोड़ ही देता हूं।
  
मेरा दफ्तर सुबह साढे़ आठ बजे शुरू होता है। दफ्तर अक्‍सर पैदल ही जाता हूं। घर से दफ्तर तक का सफर मुझे किसी कविता को पढ़ने जैसा लगता है। जैसे अच्‍छी कविता को हम जितनी बार पढ़ते हैं उतनी बार उसके अलग अर्थ समझ आते हैं। मेरा घर पहली मंजिल पर है। घर से निकलते ही 5 कदम चलता हूं तो सीढि़यां आ जाती हैं। 15 सीढि़यों एक बड़े से आहते में ले जाती हैं। आहते के दरवाजे पर लोहे का बड़ा-सा गेट लगा हुआ है। गेट पर दो कद्दावर कुत्‍ते होते हैं। वे हर आने-जाने वाले को देखकर भौंकते हैं। पता नहीं वे डरा रहे होते हैं या फिर सूचित कर रहे होते हैं कि कोई आ रहा है या जा रहा है। पर उनकी आक्रामकता देखकर ऐसा लगता है कि अगर वे छूट जाएं तो  बोटी-बोटी नोच खाएं ।

कजरारी आंखों वाला कुत्‍ता
आहते से निकलकर पक्‍की सड़क पर पूर्व की ओर चल पड़ता हूं। बाईं तरफ बड़ा सा जंगली मैदान है। मैदान के तीन ओर यूकिलिप्‍टस का जंगल है। दाईं तरफ बस्‍ती है। और  सामने बहुत सारे नारियल के पेड़। सामने राममंदिर है लगभग सौ साल पुराना । दक्षिण भारत के मंदिर बाहर से बहुत सुंदर होते हैं। उन पर इतनी कारीगरी और नक्‍काशी होती है कि बरबस ही ध्‍यान उनकी तरफ खिंच जाता है। मेरी तरफ मंदिर की पीठ होती है। मैं मंदिर से पहले ही उत्‍तर की तरफ एक कच्‍चे रास्‍ते पर मुड़ जाता हूं। लगभग सौ मीटर चलने के बाद पक्‍की सड़क पर पहुंचता हूं। और फिर पश्चिम की ओर चलना शुरू कर देता हूं। सौ मीटर चलने के बाद उत्‍तर की तरफ मुड़ जाता हूं। यह कजरारी आंखों वाले कुत्‍ते का इलाका है। उसकी आंखों के चारों तरफ काले गोले बने हैं। दूर से ऐसा लगता है जैसे उसने आंखों में काजल लगाया हो। मेरी तो उससे पहचान हो गई है। पर नए लोगों को देखकर वह भौंकता है। यह पूरा इलाका हलनायकनहल्‍ली के नाम से जाना जाता है।

लगभग पचास मीटर चलने के बाद दो विशाल घर नजर आते हैं। असल में वे फार्म हाउस ज्‍यादा लगते हैं। उनके बीच सड़क लगभग सौ मीटर पसरकर चलकर मुख्‍य सड़क पर पहुंचती है। लगभग सौ मीटर चलने के बाद यह फिर से उत्‍तर की तरफ मुड़ जाती है। यहां से विप्रो आफिस की दो विशाल बहुमंजिला इमारतें नजर आने लगती हैं। आगे- पीछे सब तरफ काम पर जाने वालों का रेला। ज्‍यादातर महिलाएं। किसी को ऑफिस पहुंचना है तो किसी को किसी बनती हुई बिल्‍डिंग में मजदूरी के लिए। लेकिन सबके बालों में फूल या वेणी जरूर लगी होती है। जल्‍दी हो तो सामने चल रहे लोगों को ओवरटेक करके आगे बढ़ना पड़ता है। इस सड़क के बाईं ओर अभी बस्‍ती नहीं है। बल्कि बस्‍ती बसाने वालों के अधपक्‍के घर हैं। इनके रहन-सहन और बातचीत से लगता है  ज्‍यादातर लोग बिहार या उप्र से आए हैं। एक तरह से प्रवासी मजदूर।

नार सलोनी
जब सड़क लगभग तीन सौ मीटर चल लेती है तो एक और मंदिर आता है अयप्‍पा मंदिर। यहां से दुकानों का सिलसिला शुरू हो जाता है। मंदिर से लगी एक छोटी सी किराने की दुकान है। एक सलोनी महिला दुकान में नजर आती है। वही मालकिन है दुकान की। बिल्‍कुल एक सजग दुकानदार की तरह तैयार। उसके बालों में भी ताजे फूलों की वेणी सजी होती है। इसका मतलब है वह मुंह अंधेरे जाग गई होगी। रोजमर्रा के सुबह के काम निपटाकर स्‍नान कर तैयार होकर दुकान पर आई होगी। उसे देखकर मैं नई उर्जा से भर उठता हूं। मेरे कदम और तेज हो जाते हैं।

सड़क थोड़ी सी तिरछी होकर फिर सीधी हो जाती है। और जहां मैं पहुंचता हूं वह जनसन्‍द्रा कहलाता है। सड़क के दाईं तरफ एक छोटी-सी मडि़या है पता नहीं किस देवता या देवी की। उसके आसपास खाली जगह पड़ी है। यहां इतवार को हाट लगता है। पर  हाट में मुश्किल से बीस दुकानें होती हैं। अधिकतर सब्‍जी की दुकानें। मोड़ पर एक हेयर सैलून है। हजामत यहीं बनवाता हूं। सैलून के बाजू में एक बड़ी इमारत है जिसमें नीचे  नीचे किराने और बेकरी की दुकान हैं। बेकरी की दुकान में चाय मिलती है। यहां चाय तैयार कर बड़े से थर्मस में भर ली जाती है। वही ग्राहकों को मांगने पर दी जाती है। इस बेकरी के बाजू में एक छोटी सी लांड्री है। दुकान के बाहर चबूतरे पर लगी एक टेबिल पर बडी-बड़ी काली आंखों वाली एक सांवली महिला कपड़ों को कोयले वाली प्रेस कर रही होती है। उसको प्रेस करता देखना मुझे बहुत भाता है। उसकी दुकान के सामने से गुजरने में मुझे कम से कम एक मिनट तो लगता ही है। जब मैं वहां से गुजरता हूं तो इस एक मिनट में भी ऐसे क्षण आते हैं जब हमारी नजरें आपस में टकराती हैं। लेकिन अगले ही क्षण वह अपने काम में मशगूल हो जाती है और मैं अपने गंतव्‍य की ओर जाने में। पर न जाने क्‍यों मुझे इस क्षण का इंतजार रहता है।

सुरेश अंबानी
यहां सड़क जैसे लुढ़कने लगती है। दाईं तरफ किराने की दुकान है भाग्‍यलक्ष्‍मी जहां से घर के लिए पीने का पानी लेते हैं। मारवाडि़यों की दुकान । तीन-चार भाई मिलकर दुकान चलाते हैं। उनमें से कोई दिख जाता है तो हाथ उठाकर नमस्‍कार-चमत्‍कार कर लेता हूं। यहीं इलाके का एक मात्र मेडीकल स्‍टोर है। इसकी खासयित यह है कि अगर कोई दवा नहीं हो तो वो शाम तक बुलवाकर दे देता है। 

यहां से लगभग सौ मीटर के बाद दांईं और बाई तरफ लगभग पांच-पांच दुकानें कतार में बनी हैं। इनमें जूते, कपड़े, जेवर, गिफ्ट आयटम, हेयर सैलून, हार्डवेयर, प्‍लास्टिक और बर्तन और टेलर की दुकानें हैं। इनमें से सबसे प्रिय दुकान है बर्तन वाली दुकान। इसे सुरेश नाम का एक मारवाड़ी नवयुवक चलाता है। जिस काम्‍पलेक्‍स में मैं रहता हूं, उसमें मेरे दफ्तर के लगभग दस और लोग रहते हैं। सबने अपनी रोजमर्रा की जरूरत का सामान जिसमें गैस तथा रसोई के बर्तन प्रमुख हैं,इसी दुकान से खरीदे हैं। सुरेश बताता है कि वह जब चौदह साल का था तो राजस्‍थान से जिद करके किसी परिचित के साथ बंगलौर आ गया था। लगभग छह साल उसने अलग-अलग दुकानों में सेठों के यहां काम किया। उसे पांच हजार रूपए महीना,खाना और रहने की जगह मिलती थी। सुरेश पांच हजार में से एक भी पैसा खर्च नहीं करता था। वह उसे बैंक में जमा रखता था। इन छह सालों में वह राजस्‍थान अपने घर भी नहीं गया। उसने जो जमा किया उस पूंजी से उसने यह दुकान डाली। पहले उसने बकायदा सर्वे किया। आसपास के दस किलोमीटर के इलाके में घूमकर आया। देखा कि किस तरह की दुकान इस इलाके में चल सकती है। कुछ पैसा उसने दुकान की पगड़ी के लिए दिया। लगभग एक लाख रूपया लगाकर उसमें अंदर अलमारी और शो केस बनवाए। दो लाख का सामान दुकान में भरा। जब दुकान चलने लगी तो राजस्‍थान गया और शादी करके वापस आया। जब उसने मुझे अपनी कहानी सुनाई तब तक वह राजस्‍थान नहीं गया था। तमिल,तेलुगू,कन्‍नड़,मलयालम,हिन्‍दी और अंग्रेजी बोलता है। औपचारिक स्‍कूल उसने दसवीं के बाद ही छोड़ दिया था। ग्राहकों से इतने प्‍यार से बात करता है कि ग्राहक दुकान से खरीदकर ही बाहर निकलता है। मैं उसकी व्‍यवहारिकता और व्‍यापारिक बुद्धिमता से बहुत प्रभावित हूं। मैंने उसका नाम सुरेश अंबानी रख दिया है।

यहां से मोरी गेट कोई तीन सौ मीटर दूर रह जाता है। यहां बाईं और रेनबो रेसीडेंसी है। पाश कालोनी। जिसके दरवाजे पर बाकायदा जांच पड़ताल होती है। दार्इं तरफ एक विशाल अपार्टमेंट बन रहा है।


आते जाते रास्‍तों पर
मोरी गेट बस स्‍टाप है विप्रो ऑफिस के लगभग सामने। यह है सरजापुर रोड। जो हमारे पते में मिलती है। यहां से दाईं तरफ सरजापुर का रास्‍ता है और बाईं तरफ बंगलौर शहर। बार्इं तरफ मुड़ते ही लगभग पचास मीटर चलने पर विप्रो आफिस का बड़ा सा गेट। यहां पहुंचते ही अपना आई कार्ड निकालकर उसे गले में लटका लेना पड़ता है,वरना वहां खड़े गार्ड रोक लेते हैं। लगभग तीन सौ मीटर चलने पर एक और बड़ा गेट आता है। यहां बेग की तलाशी ली जाती है। कार रोकी जाती है, उसके अंदर का मुआयना किया जाता है। यहां से फिर लगभग दो सौ मीटर चलने के बाद हम खुली जगह में पहुंच जाते हैं। यहां दाईं और विप्रो का स्‍पेशल इकोनोमिक जोन कार्यालय है। बाईं ओर विप्रो का कारपोरेट कार्यालय। इन दोनों के बीच से जाती हुई सड़क पर चलते हुए जब लगभग तीन सौ मीटर की दूर तय करते हैं तो अजीम प्रेमजी फाउंडेशन का कार्यालय का कैम्‍पस आ जाता है। विप्रो की बहुमंजिला इमारत के उलट यह बिलकुल अलग तरह की एक मंजिला इमारत है। सौ मीटर चलने पर कार्यालय की इमारत आ जाती है।

मुख्‍य सड़क से लेकर यहां तक जो गार्ड तैनात होते हैं उनसे पहचान हो गई है। उनसे हर रोज नमस्‍कार आदि के अलावा नाश्‍ता किया या नहीं या आप कैसे हैं आदि वाक्‍यों का आदान प्रदान भी होता है। कई बार जब हम भूल जाते हैं या देख नहीं पाते हैं तब वे खुद ही आवाज देकर अभिवादन करते हैं। इनमें महिलाएं भी हैं। इनमें से एक है विजय लक्ष्‍मी- दुबली पतली सांवली। उसकी सौम्‍य मुस्‍कान और अभिवादन घर से यहां तक की सारी थकान उतार देता है। जिस दिन वह नहीं होती है तो कुछ खालीपन सा लगता है। कई बार वह अंदर वाले गेट पर होती है। तब दूर से ही हाथ उठाकर एक दूसरे का अभिवादन करते हैं।

गौधूलि बेला
दिन भर की व्‍यस्‍तता के बाद जब शाम को घर लौटता हूं तो रास्‍ता वही होता है पर चेहरे बदल जाते हैं। गार्ड अभिवादन जरूर करते हैं,पर बैग की तलाशी जैसी कोई बात नहीं होती है। मोरी गेट पार करके हलनायकलहल्‍ली की ओर जाने वाली सड़क पर मुड़ जाता हूं। यहां मोड़ पर ही एक सब्‍जी वाली से भेंट होती है। जो हाथ ठेले पर सब्‍जी बेच रही होती है। उसे देखकर अजीब सा सुकून मिलता है। कई बार हम उससे ही सब्‍जी खरीदते हैं। कई बार जब वह लेट हो जाती है तो रास्‍ते में मिलती है।

शाम और सुबह का एक अंतर और होता है। जब हम सुबह जाते हैं तो चलने की गति तेज होती है,लेकिन शाम को लौटते वक्‍त आराम से खरामा खरामा लौटते हैं। सुबह के समय सुरेश की दुकान नहीं खुली होती है। लेकिन शाम को वह दुकान में होता है। अगर नजर आ जाए तो दो’तीन मिनट उससे बात होती ही है। सड़क पर अंधेरा घिर आता है। अयप्‍पा मंदिर तक ही चहल पहल दिखाई देती है, उसके बाद इक्‍का-दुक्‍का लोग ही दिखाई देते हैं।
कभी बाजू से कोई मोटर साइकिल वाला या आटो या कार हार्न बजाती हुई तेज गति से निकल जाती है। बहरहाल जब वापस घर की बिल्डिंग में वापस पहुंचते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई पहाड़ चढ़कर आ रहे हैं।


   


गुरुवार, १० सितम्बर २००९

चायना में चामराज नगर की चर्चा


27 से 31 जुलाई,2009 तक चायना के कुनमिंग शहर के युन्नान विश्वविद्यालय में इन्टरनेशनल यूनियन ऑफ एंथ्रोपोलोजिकल एंड एथोनोजिकल साइंस की 16 वीं वर्ल् कांग्रेस का आयोजन था। इसमें दुनिया भर से 2400 सेअधिक लोग आमंत्रित थे जो 93 देशों प्रतिनिधित् कर रहे थे। इनमें भारत के 529 भागीदार थे। ये भारत के विभिन् विश्वविद्यालय,महाविद्यालय,स्रोत संस्थाओं और गैर सराकारी संगठनों से थे। इनमेंप्राध्यापक,विभागाध्यक्ष,सहायक प्राध्यापक,शोध छात्र शामिल थे। 15 भागीदार मैसूर से थे, जिनमें से डॉ.सरस्वतीजी. भी थीं(ऊपर फोटो में) उन्हें इस कांग्रेस में Medical Pluralism sectors of Health Care and Health Seeking :Problems and Perspectives in Critical Medical Anthropology विषय परआयोजित पेनल डिस्कसन में Divergence from Medicine To Modern Medicine among Soiliga Tribe of B.R.Hills,Chamrajanagar District,Karnatak पर पेपर पढ़ने के लिए आमंत्रित किया गया था। ‍‍‍ ‍ ‍ ‍‍‍ ‍‍‍ ‍‍ डॉ.सरस्वती जी. ने कर्नाटक के चामराजनगर जिले के बी.आर.हिल्के आदिवासियों के रहन-सहन का गहराई से अध्ययन किया है। उनका प्रस्तुतिकरण और उस पर पेनल डिस्कशन 30 जुलाई को था।

सरस्वती चीन यानी चाइना की यात्रा से लौट आई हैं। हम जानते हैं कि ऐसी किसी भी यात्रा के लिए महीनों पहले से तैयारी शुरू हो जाती है। यह तैयारी भौतिक रूप से कम मानसिक रूप से ज्यादा होती है। मन में तमाम योजनाएं बनती हैं, सपने पनपते हैं। सरस्वती भी इस अहसास से जरूर गुजरी हैं। जब उन्होंने मुझे पहली बार इस यात्रा केबारे में बताया था तो मैं चायना को चैन्ने समझ बैठा था। और कुछ दिनों तक यही समझता रहा कि उन्हें
चैन्ने में किसी विश्वविद्यालय में अपना परचा पढ़ने जाना है। फिर एक दिन अचानक पता चला कि वे पासपोर्ट और वीजाकी औपचारिकताओं में व्यस्हैं। तब यह बात साफ हुई कि वे चैन्नै नहीं चायना जा रही हैं।

उन्हें 25 जुलाई,2009 को चैन्ने से अपनी यात्रा पर रवाना होना था। उन्हें टूरिस्श्रेणी में वीजा दिया जा रहा था, इसलिए बैंक खाते में एक निश्वित जमा राशि दिखानी जरूरी थी। वह दस- बीस हजार नहीं बल्कि एक लाख पचहत्तर हजार थी। एक औसत मध्यमवर्गीय परिवार के बैंक खाते में इतनी राशि होना सचमुच मुश्किल काम है।पर सरस्वती और उनके परिवार ने अपने सम्पर्कों का इस्तेमाल करके इसे संभव बनाया।
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दो सहेलियां:डॉ.सरस्‍वती और डॉ.प्रगति

सरस्वती इस यात्रा पर अकेली नहीं गईं थीं। बहुत से और लोग उनके साथ थे। परिवार,शुभचिंतकों और दोस्तों की शुभकामनाएं भी साथ थीं। और मुझ जैसा एक यायावर भी उनके साथ था, जो उनकी नजरों से चायना की यादगार यात्रा को देख रहा था।
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आइए आप भी देखिए।


हवाई यात्रा चैन्ने से शुरू होने वाली थी। सरस्वती मैसूर में रहती हैं। वे अज़ीमप्रेमजी फाउंडेशन,बंगलौर में शैक्षिक नेतृत् एवं प्रबंधन कार्यक्रम(ईएलएमपी) में बतौर समन्वयक(शोध एवं दस्तावेजीकरण) कार्यरत हैं। मैसूर से चैन्ने ले जाने के लिए शताब्दी एक्सप्रेस यात्रियों का इंतजार कर रही थी। यह 25 जुलाई की दोपहर थी। सरस्वती को विदा करने उनके पति श्री प्रसाद और बेटी राधा आए थे। सरस्वती कम्पार्टमेंट की खिड़की पर अपना चेहरा सटाए देर तक आंखें बाहर गड़ाए रहीं। उनका एक हाथ खिड़की से बाहर हवा में लगातार हिलता रहा। वे और उनके साथी आखिरकार चायना यात्रा के लिए निकल ही पड़े। रात आठ बजे वे सब चैन्ने के रेल्वे स्टेशन पर थे। उनकी उड़ान रात ग्यारह बजे थी।
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थाई एयरलाइंस का हवाई जहाज यहां से बैंकाक के लिए उड़ा। दूरी थी लगभग 2000 किलोमीटर। भारतीय समय के अनुसार रात को
लगभग दो बजे जहाज बैंकाक के एयरपोर्ट पर उतर रहा था। जबकि यहां सुबह के लगभग साढ़े तीन बज रहे थे। यानी यहां समय डेढ़ घंटे आगे चल रहा था। बैंकाक का हवाई अड्डा भी किसी पर्यटन स्थल से कम नहीं है। तीन घंटे के पड़ाव के बाद अगली उड़ान सीधी कुनमिंग शहर के लिए थी। कुनमिंग जहां कांग्रेस का आयोजन था। दूरी कुछ 800 किलोमीटर। यह उड़ान भी थाई एयरवेज की थी। थाई एयरवेज में यात्रा करना अपने आप में एक नया अनुभव था। बैंकाक से कुनमिंग का सफर भी लगभग तीन घंटे का था।

कुनमिंग एयरपोर्ट पर आगंतुकों के लिए युन्
नान विश्वविद्यालय की बस मौजूद थी।


कुनमिंग
मेजबान शहर यानी कुनमिंग युन्
नान प्रांत की राजधानी है। युन्नान प्रांत राजनीतिक,आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से सम्पन् है। युन्नान यातायात और संचार के साधनों का केन्द्र है। 21000 वर्गकिलोमीटर में फैले कुनमिंग की आबादी 6 करोड़ से अधिक है। इनमें 7,60,000 इथेनिक अल्पसंख्यक आबादी है,जो कि कुल आबादी का लगभग 15 प्रतिशत है। अन् प्रजातियों में यिस,हूयस,मिआस,बाइस तथा डाइस शामिल हैं। कुनमिंग प्रख्यात ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर है। कुनमिंग हवाई अड्डा चीन के पांच अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों में से एक है। कुनमिंग पहाडि़यों से घिरा है। मानसून यहां हमेशा बना रहता है। दक्षिणी गर्म हवाएं और बंगाल की खाड़ी से आने वाली सम्रुदी हवाएं यहां का मौसम खुशगवार रखती हैं। कुनमिंग का दिन बहुत लम्बा होता है जबकि रात छोटी होती है। सूर्यास् लगभग 9.30 पर होता है। औसत तापमान 15 डिग्री सेल्सियश रहता है। इसीलिए कुनमिंग को स्प्रिंग सिटी भी कहा जाता है।

युन्‍नान विश्‍वविद्यालय

कांग्रेस का आयोजन युन्
नान विश्वविद्यालय में था। यह पूर्वी चायना का एक जाना-माना विश्वविद्यालय है। 1922 में स्थापित यह विश्वविद्यालय 1946 में ही ब्रिटानिका एनसाइक्लोपीडिया में चायना के 15 महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में गया था। आज यह चायना में उच् शिक्षा के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय केन्द्र के रूप में जाना जाता है। बड़े पैमाने पर यहां विभिन् अकादमिक पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं। जिनमें कला,विधिक,विज्ञान,तकनॉलॉजी,अर्थशास्त्र और प्रबंधन के पाठ्यक्रम शामिल हैं। युन्नान विश्वविद्यालय 27 स्कूल, महाविद्यालय तथा अन् संस्थानों का प्रबंधन करता है। 56 शोध कार्यक्रम,158 स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम और 5 पोस् डॉक्टरल पाठ्यक्रम चलाता है। विश्वविद्यालय में एक राज्यस्तरीय शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान भी है। विश्वविद्यालय का अपना एक प्रकाशन विभाग भी है जो विभिन् शैक्षिक पत्रिकाओं का प्रकाशन करता है।

चायना में जिस बात ने सबसे ज्
यादा प्रभावित किया वह है वहां का वातावरण और नागरिक सुविधाएं। सड़क, सार्वजनिक शौचालय बिलकुल साफ-सुथरे और हरियाली से युक् हैं। जो अपने आप में इस बात के परिचायक और प्रेरक हैं कि वहां स्वास्थ् का हर कदम पर ध्यान रखा जाता है।

दो पहिया वाहन बैटरी से चलते हैं, जिससे तो प्रदूषण होता है और शोर। दो पहिया वाहन के लिए सड़क पर अलग से लेन है। पेट्रोल तथा
डीजल की बचत के लिए सारे संभव उपाय किए जाते हैं। हर सिग्नल पर वाहन अपना इंजन बंद कर देते हैं और सिग्नल मिलने पर फिर से चालू करते हैं। सारे वाहन अपनी लेन में ही चलते हैं। ओवरटेक करने को कोशिश होती है बेवजह हार्न बजाए जाते हैं।

बिजली की बचत के लिए भी इतनी ही संवेदनशीलता बरती जाती है। सभी होटलों,इमारतों और स्
कूलों के कमरों में बड़ी-बड़ी खिड़कियां बनाई गई हैं ताकि पर्याप् रोशनी और हवा बिना रोक टोक के मिलती रहे। सबसे आश्चर्य की बात यह देखने में आई कि किसी होटल,आफिस या कालेज में पंखे, एयरकूलर या एसी देखने को नहीं मिले। पोलीथीन देखने को भी नहीं मिला। अगर आप कुछ खरीदते हैं तो आपको सामान कपड़े के बैग में दिया जाता है। आपको बाकायदा इसका मूल् भी चुकाना होता है।

कांग्रेस के पांच दिन के कार्यक्रम में एंथ्रोपोलोजी और इथोनोलॉजी के विभिन्
पहलुओं पर दुनिया भर से आए विद्वानों और शोधकर्त्ता के विचार जानने को मिले। पास के शहर में भ्रमण पर भी ले जाया गया। 1980 के आसपास यह शहर एक पिछड़ा हुआ गांव था। समय के साथ इसने विकास किया। और आज यह आत्मनिर्भर है। इसके पीछे यहां की सरकार की अपनी नीतियां हैं। सोशिलिज्,कम्युनिज् और सहकारिता के आंदोलन ने इसमें बहुत मदद की है। यहां सारी जमीन सरकार के अधिकार में है। हर परिवार को कुछ जमीन दी गई है। इस जमीन पर वे फसल उगाते हैं,फसल का एक हिस्सा सरकार को दिया जाता है। शेष में परिवार अपनी जीविका चलाता है। बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखा जाता है। जहां बच्चों को शिक्षा,भोजन,कपड़े आदि उपलब् कराए जाते हैं वहीं बुजुर्गों को पेंशन तथा मेडीकल की सुविधाएं दी जाती हैं। यह बताता है कि वहां बीते हुए कल और आने वाले कल का कितना ध्यान रखा जाता है।

वहां वालिंटियर मौजूद थे जो स्
थानीय समुदाय और मेजबानों के बीच दुभाषिए का काम कर रहे थे। उनकी मुस्काराहट और मधुर आवाज मेजबानों का उत्साह बनाए रखती थी। केवल इतना ही नहीं वे मेजबानों की हर जरूरत पूरी करने में पूरे मनोयोग से जुटे रहते थे। उनके सहयोग के बिना चायना की यह यात्रा यादगार नहीं बन सकती थी। आयोजकों ने भी कांग्रेस को सफल बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

चायना में खाने के लिए बहुत कुछ उपलब्
था। जिनमें मीठे आलू,कार्न, सब्जियां और फल तथा जूस दोपहर और रात के खाने के लिए थे। जबकि नाश्ते में बिस्कुट,केक,ब्रेड और नूडल् होते थे।

चायना यात्रा पर जाते समय सरस्
वती को सलाह दी गई थी कि वे भारतीय व्यंजन साथ ले जाएं, वहां उन्हें भारतीय व्यंजन नहीं मिलेंगे। लेकिन वे अपने साथ कुछ नहीं ले गईं। सरस्वती एंथ्रोपोलोजिस् हैं। उन्होंने सीखा है वातावरण के अनुसार अपने को अनुकूलित करना है, अपनी संस्कृति और अपने रहन-सहन को भूलकर।

वे डार्विन का एक वाक्
हमेशा याद रखती हैं कि, ‘जीवित वही रहते हैं जो अपने को परिस्थिति के अनुसार ढाल लेते हैं।’

बुधवार, १९ अगस्त २००९

रायपुर-भोपाल-नागपुर-रायपुर


28 जुलाई,2009

सुबह तीन बजे बिस्‍तर छोड़ देना पड़ा क्‍योंकि रायपुर के लिए उड़ान साढ़े छह बजे सुबह थी। वह भी सीधी नहीं वाया हैदराबाद । बंगलौर से छोटा हवाई जहाज हमें लेकर उड़ा। मेरे साथ फाउंडेशन की धीरा भी थी। साढ़े़ सात बजे हम हैदराबाद के शमशाबाद हवाई अड्डे पर थे। मौसम साफ पर ठ़ंडा था। रायपुर जाने वाला हवाई जहाज जैसे हमारी प्रतीक्षा में ही था। यह भी छोटा ही था। इस बार मैंने खिड़की वाली सीट चुनी। आठ बजे हैदराबाद से उड़े और दस बजे रायपुर के माना हवाई अड्डे पर थे। हैदराबाद से रायपुर के बीच का दृश्‍य देखने लायक था। रायपुर से कुछ पहले नीचे एक बहुत चौड़े पाट वाली नदी के दर्शन हुए। संभवत: महानदी थी। सबसे सुखद बात यह थी कि इसमें पानी भी था। पिछले दिनों इधर बारिश हुई थी। अच्‍छी बारिश।

फाउंडेशन के कम्‍प्‍यूटर एडेड लर्निग प्रोग्राम के तहत शिक्षक विकास परिचर्चा कार्यशाला का आयोजन धमतरी जिले के कुरूद विकासखंड में था। धीरा और मुझे इस कार्यशाला में ही जाना था। कार्यशाला 30 से थी। मैं दो दिन रायपुर में रूकने वाला था। धीरा को सीधे कुरूद जाना था। उसे लेने टैक्‍सी आने वाली थी। हम उसके इंतजार में एयरपोर्ट पर बैठे रहे। लगभग ग्‍यारह बजे टैक्‍सी आई। उसने मुझे छत्‍तीसगढ़ शिक्षा स्रोत केन्‍द्र में छोड़ा। मैं दो दिन यहीं रहने वाला था। यह केन्‍द्र एकलव्‍य, विद्यामंदिर तथा दिगन्‍तर ने मिलकर बनाया है। एकलव्‍य के पुराने साथी संजय तिवारी इसके प्रभारी हैं। उनसे मिलने का भी लोभ था और उनके साथियों से भी। संजय और उनके साथियों से तो मुलाकात हुई। औपचारिक बातचीत हुई। टीचर्स पोर्टल के बारे में बात हुई।

>कुंवर एक नए दोस्‍त का नाम है

यहां एक नया दोस्‍त बना कुंवर। दुबला-पतला लंबा। गेहुए रंग वाला कुंवर। धीरे-धीरे बोलता है पर साफ-साफ। कुंवर केन्‍द्र की देखभाल करता है। आफिस में चाय बनाकर देता है। जो अतिथि आते हैं उनके लिए खाना बनाता है। अच्‍छा खाना।

कुंवर बहुत जिज्ञासु है। कालेज की पढ़ाई कर रहा है,प्राइवेट। कम्‍प्‍यूटर चलाना सीख लिया है। अंग्रेजी इनपुटिंग करता है। हिन्‍दी सीख रहा है। स्‍केनिंग करता है। नया सीखने को, नई बात सुनने को हमेशा तत्‍पर रहता है। मैं सचमुच उससे बहुत प्रभावित हुआ। मुझे अपनी युवा अवस्‍था याद आ गई। मैंने भी शुरूआत ऐसे ही की थी। हां काम कुछ अलग तरह का था।

कुंवर से मैंने कहा कि मेरा खास ध्‍यान रखने की जरूरत नहीं है। मैं बहुत साधारण व्‍यक्ति हूं। उसने कहा जो लोग ऐसा कहते हैं मैं उनका ज्‍यादा ही ध्‍यान रखता हूं। iपता नहीं यह बात उसने व्‍यंग्‍य में कही थी या गंभीरता से। मैं सोचता रह गया वह उठकर चला गया। अपनी आदत के मुताबिक मैंने उसे गेस्‍ट हाउस की साफ-सफाई को लेकर कुछ टिप्‍स दीं। उसने मेरी बातें ध्‍यान से सुनीं।

>बरसों बाद संजय के साथ

संजय अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर घर ले गए। पर रास्‍ते भर जिस तरह वह मोटरसाइकिल चला रहे थे, मुझे डर ही लग रहा था। ऐसा लगता था,बस अब कहीं टपक ही पड़ेंगे। पर आखिरकार सुरक्षित घर पहुंच ही गए। संजय और मैं एकलव्‍य में लगभग दस-बारह साल साथ रहे,पर कभी उनके परिवार से मिलने का संयोग नहीं बना। असल में संजय होशंगाबाद में थे और मैं भोपाल में। पहली बार संजय की पत्‍नी सुखमणि और बच्‍चों से मुलाकात हुई। होशंगाबाद की, घर परिवार की बातें हुईं,बच्‍चों की बातें, उनकी पढ़ाई-लिखाई की बातें हुईं। छोटे बेटे ने आलू की चिप्‍स तलकर खिलाई। वह उसे बहुत पसंद है।

रत्‍ना जी से एक मुलाकात

रायपुर में डॉ.रत्‍ना वर्मा हैं जो udanti.com नामक एक पत्रिका निकालती हैं। यह वेब पत्रिका है जो कागज पर भी प्रकाशित होती है। उनसे स्रोत फीचर सर्विस के सिलसिले में सम्‍पर्क हुआ था। बाद में वह लेखकीय बिरादरी के रिश्‍ते में बदल गया। रायपुर मैं था तो उनसे मिलने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। फोन पर बात की उन्‍होंने कहा शाम को आ जाइए।

रत्‍ना जी रायपुर में पंडरी में जीवन बीमा रोड पर रहती हैं। उनके पिताजी बृजलाल वर्मा जाने माने स्‍वतंत्रता सेनानी और केन्‍द्रीय संचार मंत्री रहे हैं। वे अब नहीं हैं। उनके अनुभवों की एक डायरी जल्‍द ही रत्‍ना जी प्रकाशित करने जा रही हैं। रत्‍ना जी लगभग बीस-पच्‍चीस साल पत्रकारिता करती रहीं हैं। वे लम्‍बे समय तक नवभारत में फीचर संपादक रहीं हैं। रायपुर में साप्‍ताहिक अखबार इतवारी का संपादन भी करती रहीं हैं। दो एक साल पहले उन्‍होंने तय किया कि वे अब सक्रिय पत्रकारिता छोड़कर कुछ रचनात्‍मक काम करना चाहेंगी। इस निर्णय का नतीजा udanti.com पत्रिका है। बहुरंगी और आकर्षक पत्रिका पहली बार में ही मन मोह लेती है। सामग्री से लेकर साज-सज्‍जा और छपाई सब कुछ आला दर्जे की। मुझे भी इसमें दो बार प्रकाशित होने का अवसर मिला। संजय और मैं लगभग एक डेढ़ घंटे रत्‍ना जी के साथ रहे। साहित्‍य, समाज पत्रकारिता की तमाम बातें हुईं। संजय ने यह संभावना खोजने की कोशिश की कि वे रत्‍ना जी को अपने रिर्सोस सेंटर से कैसे जोड़ सकते हैं। रत्‍ना जी से मिलकर अच्‍छा लगा।

30 जुलाई,2009

कुरूद के पास भाटागांव में कार्यशाला थी। कुंवर मुझे बस में बिठाने के लिए आया। यहां एक मजेदार अनुभव हुआ। बस का कंडक्‍टर चिल्‍ला रहा था दुर्ग और हमने सुना कुरूद। मैं बस में बैठ गया। शंका होने पर मैंने दो बार आगे की सीट पर बैठे एक व्‍यक्ति से समाधान करने की कोशिश की। उसने दोनों बार मेरे सवाल के जवाब में हां में सिर हिलाया। इस बीच बस पूरे रायपुर में घूमती रही और मैं एक तरह से रायपुर दर्शन करता रहा। रायपुर मैं तीसरी बार आया था। सबसे पहले लगभग तीस साल पहले रेल्‍वे की एक परीक्षा देने आया था। दूसरी बार लगभग बीस साल पहले माखनलाल चतुर्वेदी प‍त्रकारिता विश्‍वविद्यालय और राष्‍ट्रीय विज्ञान एवं तकनालॉजी संचार परिषद द्वारा आयोजित विज्ञान पत्रकारिता कार्यशाला में स्रोतव्‍यक्ति के रूप में आया था। रायपुर अभी भी और शहरों की तुलना में शहर कम कस्‍बा ज्‍यादा प्रतीत होता है। जब बस एक जगह जाकर रूकी और कंडक्‍टर तथा ड्रायवर उतरकर चाय पीने लगे तो मुझे लगा कि उनसे ही पूछ लिया जाए।

मेरा सवाल सुनकर दोनों ने मुझे आश्‍चर्य से देखा और कहा अंकल बस पर इतने बड़े अक्षरों में लिखा है कि बस राजनांदगांव जा रही है। मैंने कहा भैया मैं बाहर से आया हूं मुझे नहीं मालूम कि कुरूद किस रास्‍ते पर है। बैठने के पहले मैंने कंडक्‍टर से पूछा था। अब वे मेरी अज्ञानता पर हंस रहे थे और मैं अपनी वेबकूफी पर। मामला बोलने और सुनने का था। कंडक्‍टर जिस तरह से बोल रहा था,वह सुनने में दुर्ग कम कुरूद ज्‍यादा सुनाई देता था। बहरहाल मैं वहां उतरकर आटो लेकर बस स्‍टेंड गया। वहां से धमतरी जाने वाली बस में बैठा।

भाटागांव कुरूद से कोई सात किलोमीटर पहले ही है। यह राष्‍ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 पर है। भाटागांव में छत्‍तीसगढ़ पर्यटन मंडल ने अपना गेस्‍ट हाउस बनाया है। यह बिलकुल रोड पर ही है। पर गांव से बाहर। कार्यशाला यहीं थी। गेस्‍ट हाउस का डिजायन अच्‍छा है। गेस्‍ट हाउस बने अगस्‍त में एक साल होगा। लेकिन उसके पहले ही एक बड़े हाल की फालसीलिंग नीचे गिर गई है। घटिया निमार्ण और घटिया सामग्री का इस्‍तेमाल । मैं दो रात इस गेस्‍टहाउस में रहा। दिन में तो बिजली नहीं रहती थी,पर संयोग से रात में दोनों दिन बिजली नहीं गई। कार्यशाला में भाग लेने वाले शिक्षक चूंकि कुरूद विकासखंड के ही थे,इसलिए वे शाम को अपने घर लौट जाते थे। फाउंडेशन की स्‍थानीय टीम के लोग कुरूद में रहते हैं, इसलिए वे भी कुरूद चले जाते थे। यहां गेस्‍टहाउस में मेरे अलावा फाउंडेशन के दो और साथी थे। खाने की व्‍यवस्‍था नहीं थी,वह कुरूद से बनकर आता था। एक सुबह उठकर मैं चाय की तलाश में गांव की तरफ चला गया। गांव छोटा-सा है। चाय की दुकान से पहले मुझे देशी शराब की सरकारी दुकान मिली। यहां ग्राहक भी मौजूद थे। चाय की दुकान भी मिली। मैंने दो गिलास चाय पी और एक गिलास तोड़ा। जानबूझकर नहीं गलती से गिर गया टेबिल से।

आसपास नजर डालने से पता चल रहा था कि पिछले दिनों यहां अच्‍छी बारिश हुई है। खेतों में पानी भरा हुआ था। महिलाएं सिर पर गोबर और घास रखकर ले जा रही थीं। ऐसे दृश्‍य अब गांवों में ही नजर आते हैं।

पिछले साल रूम टू रीड ने एक कार्यशाला दिल्‍ली में आयोजित की थी। मैं उसमें स्रोत व्‍यक्ति था। उसमें एक शिक्षक कुरूद के भी थे तोमनसिंह । उनको फोन किया तो वे सब काम छोड़कर मिलने चले आए। बातों बातों में ही लैपटॉप पर उनका ईमेल एकांउट बनाया और फिर टीचर्स पोर्टल के लिए उनका रजिस्‍ट्रेशन भी किया।

1 अगस्‍त, 2009

शाम को रायपुर वापस लौटा। फिर कुंवर से मुलाकात हुई। उसे मालूम था कि मैं आने वाला हूं। उसने मेरे लिए भी खाना बनाया था। देर रात तक उसके साथ बातचीत होती रही। उसे अपना ब्‍लाग दिखाया। उस पर कमेंट कैसे करते हैं। यह सिखाया। वह मेरे ब्‍लाग का अनुसरणकर्ता बनना चाहता था,वह भी उसे बनाया।


2 अगस्‍त,2009 ** कोरबा में दो दिन

सु‍बह यशंवतपुर लिंक एक्‍सप्रेस पकड़कर कोरबा गया। कोरबा छत्‍तीसगढ़ का बिजली उत्‍पादन केन्‍द्र है। यहां बसंती दीदी (बुआ की लड़की) रहती हैं। वे यहां पिछले लगभग तीस साल से रह रही हैं। रमेश जी यानी मेरे बहनोई एनटीपीसी में एकाउंटेंट थे। रिटायर्ड होने के बाद उन्‍होंने यहीं घर बना लिया। बीच के कुछ साल वे शराब के नशे के बेहद आदी हो गए थे। किसी ने उन्‍हें सलाह दी कि भोपाल में गांधीभवन में नशामुक्ति केन्‍द्र में जाकर रहें। मैं उन्‍हें दो बार वहां लेकर गया। वे लगभग हफ्ता-हफ्ता भर वहां रहे भी। उन्‍हें उससे फायदा हुआ भी। पर वे इस हद तक इस नशे की गिरफ्त में आ चुके थे कि उससे निकलने में उन्‍हें बहुत कोशिश करनी पड़ी। अब वे ठीक हैं। पर कहते हैं उनका लीवर बिलकुल छलनी हो चुका है। मैं पहली बार कोरबा आया। दीदी का छोटा बेटा चिंटू मुझे लेने स्‍टेशन आया। स्‍टेशन से उनका घर लगभग चौदह किलोमीटर दूर है। एक्टिवा स्‍कूटर पर लेकर गया। कम से कम आठ-दस पावर हाउस पूरे कोरबा में फैले हैं,कुछ निजी कंपनियों के हैं तो कुछ सरकार के। ये सब कोयले से बिजली बनाते हैं। पास में हसदेव थर्मल पावर कारपोरेशन भी है,जहां पानी से बिजली बनाई जाती है। हवा में लगातार भारीपन और कोयले के कण महसूस होते रहते हैं। मैं दो दिन कोरबा में रहा। रक्षाबंधन पांच अगस्‍त को था। मैंने बंसती दीदी से तीन तारीख को कहा आप तो आज ही राखी बांध दो।

8 अगस्‍त 2009** यादों का नागपुर

भोपाल से लौटते हुए नागपुर आया हूं। नागपुर स्‍टेशन पर उतरते ही यादें संतरे की फांकों की तरह एक-एक करके खुलने लगी हैं। नागपुर पिछली बार मैं 1994 में आया था। नेशनल बुक ट्रस्‍ट ने राष्‍ट्रीय पुस्‍तक मेले में एक सेमीनार का आयोजन किया था। मुझे उसमें परचा पढ़ना था, ‘क्‍या बच्‍चे बच्‍चों का लिखा पढ़ते हैं। ’ कवि मित्र इलाकुमार भी तब नागपुर में थीं। उनसे भी मिला था। नागपुर मेरी ननिहाल है। जब पिछली बार आया था तो नानी थी। उसी साल वे गुजर गईं । तीन मामा और दो मामियां थीं। वे भी समय के साथ गुजर गए। उनके बेटे-बेटियां हैं। नागपुर के लोहापुल के पास तेलीपुरा-सीताबर्डी मो‍हल्‍ले में रहते हैं। दो मामा इलेक्‍ट्रोप्‍लेंटिग का काम करते थे। छोटे मामा ने घर में ही छोटा-सा कारखाना बनाया था। उनके बेटे उसे अब भी चला रहे हैं। जिस घर में वे सब रहते हैं वह अब भी वैसा ही है जैसा बीस साल पहले था। लगभग हजार वर्गफुट का प्‍लाट तीन-चार हिस्‍सों में बंटा।

नागपुर के साथ बचपन की कितनी यादें जुड़ी हैं। बडे़ मामा मोहनलाल पटेल कपड़ा मिल में काम करते थे। शादी हुई थी,पर किसी कारण से ज्‍यादा दिन नहीं चली। मैं जब भी नागपुर आता बड़े मामा मुझे सिनेमा दिखाने जरूर ले जाते। असल में तो तीनों मामा बारी-बारी से एक एक दिन सिनेमा ले जाते। उन दिनों सिनेमा ले जाना बड़ा सम्‍मान माना जाता था। मैंने नागपुर में आवारा, ललकार,ज्‍वार भाटा,नहले पे दहला जैसी फिल्‍में देखीं थीं। बड़े मामा बहुत अच्‍छे कव्‍वाली गायक थे। नागपुर आकाशवाणी पर उन्‍हें बुलाया जाता था।

मंझले मामा मदनलाल पटेल इलेक्‍ट्रो‍प्‍लेंटिग कारखाने में काम करते थे। जब वे युवा थे तो एक्‍टर बनने बंबई चले गए थे। वहां से निराश होकर लौटे तो मानसिक रूप से गहरे अवसाद मे रहने लगे। वे अक्‍सर राजनीति की बात करते और नेहरू और इंदिरा गांधी की आलोचना करने लगते। जब बोलना शुरू करते तो उन्‍हें रोकना मुश्किल हो जाता। वे हमेशा धोती और कुरता ही पहनते थे। हल्‍की दाढ़ी रखते। किसी युवा समाजवादी नेता की तरह नजर आते।

छोटे मामा का नाम रामनारायण पटेल था। जिन्‍हें हम सब लल्‍लू मामा के नाम से जानते थे। वे शराब के बिना एक दिन नहीं रह सकते थे। पर पीकर भी वे होश में रहते थे। सबसे ज्‍यादा फिल्‍में मैंने उनके साथ ही देखीं। वे घर में ही इलेक्‍ट्रोप्‍लेंटिंग का कारखाना चलाते थे। स्‍टील के बरतन और मोटरसाइकिल के विभिन्‍न पार्टस को निकिल पालिश होते देखना एक अलग अनुभव था।

इन सबके बीच सबसे छोटी मौसी शारदा भी रहती थीं। बचपन में उन्‍हें चेचक निकली थी। इससे उनका पूरा चेहरा चेचक के दागों से भर गया था। वे स्‍कूल गईं थीं और अच्‍छा खासा पढ़ लिख लेती हैं। जब उनकी शादी होनी थी तो उन्‍हें देखने जो लड़का आया उसने हाथ में घड़ी बांधी थी और शर्ट की जेब में पेन रखा था और एक छोटी डायरी। इससे मौसी ने अंदाज लगाया कि वह पढ़ा-लिखा है। शादी हो गई। बाद में पता चला कि लड़का यानी मौसा जी तो कुछ भी नहीं जानते । मौसी ने तय किया कि वे उन्‍हें पढ़ाएंगी। शाम को जब मौसा कपड़ा मिल से लौटते तो उनकी क्‍लास लगती। एक दिन गुस्‍से में मौसी ने मौसा को एक चांटा भी जड़ दिया। पर न तो मौसा ने पढ़ना छोड़ा, न मौसी ने पढ़ाना। आखिरकार मौसा ने अपना नाम लिखना,चिट्ठी पढ़ना और लिखना सीखकर ही दम लिया। दोनों अब भी हैं। मौसी मानसिक रूप से कुछ अस्‍वस्‍‍थ हो गईं थीं। बहुत इलाज चला। बीच में हालत यहां तक बिगड़ी कि उनके हाथ पांव बांधकर रखने पड़ते थे। अब ठीक हैं। पर बीच-बीच में भूल जाती हैं। पहचानने में देर लगती है।

वे अब नागपुर में ही अयोध्‍यानगर में रहते हैं। वहीं मदन मामा की बड़ी बेटी मुक्‍ता का परिवार। इन सबसे लगभग बीस साल बाद मुलाकात हुई। मदन मामा की दूसरी बेटी विद्या तेलीपुरा में ही रहती है। उसकी शादी हुई थी, पर कुछ साल बाद ही पति की मृत्‍यु हो गई। एक बेटी है। विद्या ने हार नहीं मानी। दूसरी शादी नहीं की। अखबार की एंजेसी ले ली और उससे अपनी जीविका चलाई। अब भी चला रहीं हैं। बेटी पढ़ रही है।

शारदा मौसी की तीन बेटियों में से सबसे छोटी बेटी संतोषी के साथ भी ऐसी ही त्रासदी हुई। वह भी अपनी छह साल की प्‍यारी-सी बेटी सृष्टि को लेकर मां-बाप के पास ही रह रही है। घर में छोटी-सी किराने की दुकान है। उस पर बैठती है। हाल ही में एक निजी विद्यालय में नर्सरी कक्षा को पढ़ाना शुरू किया है। दिन भर सबसे मिलकर रात को शिवनाथ एक्‍सप्रेस से रायपुर गया और वहां से अगले दिन हैदराबाद होते हुए वापस बंगलौर।

रायपुर में एक और चरित्र जो याद रह गया है वह है उत्‍तम आटो वाले का। उत्‍तम अक्‍सर छत्‍तीसगढ़ एजूकेशन रिसोर्स सेंटर में आने जाने वालों को यहां से वहां लाते ले जाते हैं। मुझे भी उनके आटो में बैठने का अवसर मिला। वैसे वे वादे के पक्‍के हैं,समय पर आ जाते हैं। पर अगर देर हो जाए तो भी नाराज नहीं हो पाएंगे। जैसे ही आटो में बैठेंगे सामने आपको लिखा नजर आएगा- मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है।

रविवार, १९ जुलाई २००९

दोस्‍तों की दुनिया


भोजन के बहाने
बंगलौर आ रहा था तो सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर थी कि वहां खाने का क्या होगा। खाना बनाना मुझे आता नहीं है। यह अंदाजा था कि वहां तो केवल इडली, डोसा और सांभर ही खाने को मिलेगा। पर यह भ्रम कुछ ही दिनों में टूट गया।

पहली बात तो यही कि दोपहर का खाना यहां विप्रो की कैंटीन में खाता हूं। जहां उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय दोनों तरह का खाना मिलता है। मजे कि बात यह कि मुझे आंध्रा स्टायल का खाना ज्यादा अच्छा लगता है। वह लगभग उत्त‍र भारतीय खाने की तरह ही होता है। खाना बाजार की तुलना में बहुत सस्ता है। तीस से पैंतीस रुपए में रोटी,चावल,सब्जी,सांभर,रसम,दाल,मिठाई,दही,पापड़,सलाद,अचार सब कुछ मिलता है भरपेट।

शाम का खाना हम घर पर बनाते हैं मिलकर।

दो महीने ही हुए थे कि फाउंडेशन में हमारी एक सहकर्मी सरस्वती भी पड़ोस में आकर रहने लगीं। उनका परिवार मैसूर में है। उन्होंने तय किया था कि वे यहां अपनी रसोई जैसा कुछ नहीं बनाएंगी। इसलिए उन्होंने रसोई का कोई सामान नहीं खरीदा। पर वे अपने को रसोई से बहुत दिन दूर नहीं रख पाईं। और जल्द ही हम लोगों के साथ शाम के खाने में शामिल हो गईं। खाने में शामिल हुईं तो बनाने में होना ही था। उनके आने से अब हम यह कह सकते हैं कि शाम को भी बाकायदा बना हुआ खाना खाते हैं।

सरस्वती एंथ्रोपोलोजी में पीएचडी हैं। लगभग मेरी हमउम्र। मूलत: कन्नड़ भाषी। वे तमिल,तेलुगू,मलयालम,कन्नड़,‍अंग्रेजी और हिन्दी जानती हैं। स्वभाव से घुमक्कड़ हैं। इसलिए पिछले बीस-बाइस सालों में यह उनकी चौथी या पांचवीं नौकरी है। कर्नाटक के आदिवासियों पर काम किया है। जुलाई के अंत में चीन की यात्रा पर जा रहीं हैं। वहां अन्‍तरराष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में उन्‍हें अपना परचा पढ़ना है। किताबें प्रकाशित हुईं हैं। अखबारों में लेख लिखती रही हैं। परिवार में पति के अलावा एक बेटी है।

एक दिन हमने फरमाईश की कि पूड़ी खानी है तो उन्होंने पूड़ी बनाई। फिर एक दिन उपमा बनाया। और एक दिन आलू की बिलकुल नई तरह की सब्जी। एक दिन कर्नाटक में खास तरह से बनने वाला रंगीन चावल भी उन्होंने बनाया। जब वे किचन में होती हैं तो मेरा तो प्रवेश निषेध हो जाता है।

खाने के लिए हम सब फर्श पर बैठते हैं और सारा खाना बीच में रखते हैं। फिर एक दूसरे को परसते रहते हैं। थोड़ा और थोड़ा और के अंदाज में । जो बच जाता है वह सुबह का ब्रेकफास्ट होता है।

इस तरह दोस्तों में, सरस्वती जी. (यह उनका पूरा नाम है) का नाम भी जुड़ गया। सिर्फ दोस्त नहीं एक अच्छी दोस्त।

दो भूले-बिसरे
बंगलौर आकर जो मुझे दो और बहुत अच्छे दोस्त मिले उनके बारे में क्या कहूं। वे कितने दिन से मेरे साथ थे। पर मेरे पास उनके लिए समय ही नहीं था। जैसे और दोस्तों के लिए भी मेरे पास समय नहीं था। बाकी दोस्त तो वहीं भोपाल में रह गए। पर ये दोनों साथ चले आए। आप सोच रहे होंगे कौन हैं ये। ये हैं शनि और रवि। यानी शनिवार और रविवार। मामला यह है कि यहां फाउंडेशन में शनिवार और रविवार को अवकाश होता है। इन दो दिनों में मेरे साथ कोई और हो या नहीं ये तो रहते ही हैं। इनसे बतियाने का खूब मौका होता है। अब तक इनकी उपेक्षा ही करता रहा था।


किन्नरी-आनंद
दोस्तों में जिनका शुमार किया जा सकता है उनमें दूसरी जोड़ी है किन्नरी-आनंद की। किन्नरी यानी किन्नरी पंडया से परिचय फाउंडेशन में आकर ही हुआ। पर यह परिचय और प्रगाढ़ हो गया जब यह पता चला कि उनके जीवनसाथी आनंद स्वामीनाथन हैं। आनंद पहले विप्रो के वॉटिज कार्यक्रम में थे। वॉटिज का एक प्रोजेक्ट एकलव्य में भी था। आनंद वॉटिज के इंचार्ज थे। इसलिए उनका एकलव्य में आना-जाना लगा रहता था। इसलिए उनसे परिचय था। आनंद ने कुछ साल पहले विप्रो छोड़ दिया था। वे कुछ दिन मसूरी में सिद्ध संस्था में रहे। सुना था जैसे उन्हें दुनिया से विरक्ति हो गई थी। फिर कुछ दो एक महीने एकलव्य में रहे। तब उनसे बहुत बातचीत हुई। फिर कुछ दिन वे उदयपुर में विद्याभवन में रहे। सुनते हैं किन्नरी और उनका परिचय वहीं हुआ,जो जल्द ही परिणय में परिणित हो गया। किन्नरी गुजराती हैं और आनंद तमिल। आप किन्नरी से मिलेंगे तो समझ जाएंगे कि जिसे दुनिया से विरक्ति हो गई हो वह क्यों दुनिया पर पुन: आसक्त हो गया।

तो किन्नरी-आनंद ने एक दिन भोजन पर घर आमंत्रित किया। अब यहां दिन का मतलब शनिवार या रविवार ही होता है। तो रवि ने कहा कि हम भी चलेंगे आपके साथ। अब भला मैं मना कैसे कर सकता था। वह मेरे साथ हो लिया या कहूं कि मैं उसके साथ हो लिया।

मैं उनके घर गया। आनंद के पिताजी भी आए हुए थे। उनका घर इंदिरानगर में है। किन्नरी सुबह से खाने की तैयारी में लगीं थीं,ऐसा प्रतीत हुआ। आनंद के पिताजी इस बात पर उतारू थे कि वे भी किचन में मदद करेंगे। कुछ नहीं तो बरतन ही साफ करेंगे। किन्नरी ने किसी तरह उन्हें समझाकर मेरे पास बैठने के लिए राजी किया। किन्नरी ने सारा खाना अपने गुजराती अंदाज में ही बनाया था। पराठे,दाल,भिंडी, पालक पनीर और पापड़। दही भी था। आनंद ने मुझ से बात करते हुए सलाद काटा। कहा कि राजेश भाई अपन को तो ऐसे ही काटना आता है। रवि जी मुझे देखकर
मुस्कराए जैसे कह रहे हों आप कौन सी महारत रखते हैं सलाद काटने में। मैंने मन ही मन कहा सच है।

फिर किन्नरी और आनंद ने मिलकर डायनिंग टेबिल पर खाना सजाया। हां सजाया ही कहा जाना चाहिए। फिर हम सब यानी किन्नरी,आनंद,आनंद के पिताजी और मैं खाने बैठे। रविवार जी भी बीच में ठस लिए। सच कहूं तो बंगलौर में पहली बार ऐसा लगा कि घर में खाना खा रहा हूं। खासकर दा‍ल में हरी धनिया का स्वाद ऐसा था जैसे घर की दाल में होता है। बंगलौर आकर पराठे भी पहली बार खाने को मिले थे। कुल मिलाकर मन भर और पेट भर खाना खाया। यह जानकर रविवार जी भी खुश हुए।

आनंद ने जिम्मेदारी ली थी कि खाने के बाद बरतन वे साफ करेंगे,लेकिन वे मुझसे बात करने में उलझ गए। नतीजा यह हुआ कि किन्नरी किचन में बरतन साफ करने में उलझ गईं। बाद में हम तीनों के बीच इस बात पर चर्चा भी हुई और विश्लेषण भी। किन्नरी ने कहा मैं आप लोगों की बातचीत सुन रही थी। बहरहाल किन्नरी के हाथ के बनाए खाने का स्वाद कई दिनों तक मुंह में घुलता रहेगा।

शालिनी-दिनेश
अपना पहला ब्लाग गुल्लक मैंने 2007 में बना लिया था। लेकिन एक आलू,मिर्ची,चाय के अलावा उस पर कुछ नहीं था। लेकिन बंगलौर आकर उसे अपडेट किया और उस पर नियमित रूप से कुछ न कुछ लिख रहा हूं। एक दिन मेल बाक्स में एक संदेश था, ‘मेरा नाम दिनेश श्रीनेत है। मैं यहां दैट्स हिन्दी में संपादक हूं। आपके ब्लाग से पता चला कि चकमक जैसी पत्रिका के पीछे आप थे। मैं आपसे मिलना चाहता हूं।’ भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती थी। मैंने कहा जब मर्जी हो तब आ जाओ। और फिर एक दिन रविवार जी उन्हें पकड़ लाए। उस शाम खूब बातें हुईं। साहित्य की,ब्लाग की, उनके शहर बरेली की और मेरे शहर भोपाल की। उनके भी दो ब्लाग हैं खिड़कियां और इंडियन बायस्कोप। फिर तय हुआ कि मैं उनके घर आऊं। मैंने हामी भर ली ।

फिर रविवार जी को लेकर उनके घर के लिए निकला। फोन पर बात हुई। दिनेश जयनगर में रहते हैं। वहां पास के आरवी डेंटल कालेज तक मुझे बस से जाना था। वहां दिनेश मुझे लेने आने वाले थे। मैं पूछते हुए कालेज तक पहुंचा। वहां से दिनेश को फोन किया। दस मिनट इंतजार किया। रविवार जी ने कहा खाली हाथ जाओगे। कुछ शरम करो। कुछ नहीं तो आम ही खरीद लो। मैंने रवि जी को धन्यवाद कहा और आम खरीद लिए। दिनेश आए। उनकी मोटरसाइकिल पर बैठकर मैं उनके घर के लिए चला। बाद में समझ में आया कि दिनेश का घर वहां से भी लगभग पांच किलोमीटर दूर था। जिस फिल्मी अंदाज में दिनेश मोटर साइकिल चला रहे थे,उसे देखकर मेरी रूह कांप रही थी। उन्हें जहां जगह दिखती वहां अपनी बाइक डाल देते। एक बार तो हम एक दूसरी मोटर सायकिल से रगड़ाते हुए निकले। दिनेश ने कहा यहां ऐसे ही चलाना पड़ती है,वरना न तो आप टाइम से आफिस पहुंचेंगे, न टाइम से घर। अच्छी बात यह थी कि हम घर पहुंच गए थे।

एक छोटे बच्चे ने आधा दरवाजा खोला। उसमें से अपनी मुंडी बाहर निकाली हमें देखा। मम्मी कहकर आवाज दी और फिर पूरा दरवाजा खोलकर बाहर आ गया। यह उद्भव थे। दिनेश के बड़े बेटे। पांच साल के । घर में पहुंचे तो दिनेश की पत्नी ने अभिवादन किया। दिनेश ने परिचय कराया। शालिनी। हम लोग हाल में पड़े सोफे में धंस गए। वहां टीवी चल रहा था। जिसके एकमात्र सुधी दर्शक उद्भव थे। बगल के कमरे में उद्भव से छोटा बेटा सो रहा था। अभी छह महीने पूरे किए हैं। हम लोगों का शोर सुनकर जाग गया। और फिर थोड़ी ही देर बाद वह मेरी गोद था। यहां भी शालिनी संभवत: दोपहर से तैयारी कर रही थीं खाने की।

हमारे बैठते ही पहले जूस पेश कर दिया गया। उसके साथ मिठाई। फिर पकौड़े। जब मैं किसी के घर जाता हूं तो यह देखकर थोड़ा असहज हो जाता हूं कि घर की महिलाओं या महिला को तुरंत व्यस्त हो जाना पड़ता है। और हम पुरूष अपनी दुनिया जहान की चर्चा में लगे रहते हैं। बहरहाल यहां स्थिति ऐसी नहीं थी। अव्वल तो शालिनी स्वयं ही कमरे से किचन में, किचन से हाल में, हाल से कमरे में आ जा रही थीं। छोटे बेटे का भी उतना ही ख्याल रख रही थीं,जितना हमारा। साथ-साथ खाने की तैयारी भी करती जा रहीं थीं। और बीच-बीच में हमारी बातचीत में हिस्सेदारी भी। लेकिन उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आ रही थी। बीच-बीच में दिनेश भी मदद कर रहे थे। पकौड़े तो शालिनी ने छोटे को गोद में लेकर तले। जब दिनेश ने कहा कि छोटे को मुझे दे दो,तो शालिनी ने कहा फिकर मत करो। वह मेरा भी बेटा है। कुछ नहीं होगा।

सब्जी शालिनी ने अपनी पसंद से ही बनाई। फिर पूछा कि पूड़ी खांएगे या रोटी। किन्‍नरी के यहां पराठे तो खाए थे,पूड़ी अभी तक नहीं खाई थी। रविवार जी बोले मत चूको चौहान। हमने भी कहा हां पूड़ी ही चलेगी। फूल गोभी की सूखी सब्जी खाए भी बहुत दिन गुजर गए थे। पूड़ी के साथ छोला भी था। जो भी बना था वह स्वादिष्ट तो था ही उसमें ऐसा अपनापन था कि यहां एक बार फिर घर की याद आ गई। शालिनी ने कहा आप तो हर रविवार को यहां ही आ जाया करिए। रविवार जी ने मुझे देखा और मुस्कराए। जैसे कह रहे हों, राजेश जी आपकी तो लॉटरी खुल गई। पर रविवार जी भी जानते हैं और मैं भी कि हर रविवार आना तो संभव ही नहीं। मैंने कहा कोशिश करूंगा कि महीने में एक बार आ जाऊं। इस बीच उद्भव मुझे खींचकर अपने कमरे में ले गए। वहां कम्‍प्‍यूटर पर बिठाकर उन्होंने कहा कि आप अब गेम खेलिए। कम्‍प्‍यूटर पर हमने कभी जिंदगी में गेम नहीं खेले। जब कहा कि हमें नहीं आते। तो उद्भव बाकायदा सिखाने लगे। फिर उन्होंने कम्‍प्‍यूटर पर अपनी पेटिंग दिखाईं। किस्‍से और भी हैं। पर अभी इतना ही। तो इस तरह दो नहीं तीन और दोस्त मिले- उद्भव,शालिनी और दिनेश।