बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

यूं ही राह चलते चलते.....

कबाड़ से जुगाड़: अपनी तो पानी की बोतल ही हार्न का काम भी करती है। पर हां थोड़ी जुगत भिड़ानी पड़ती है। 

पांडिचेरी में सड़क किनारे :  नींद बड़ी चीज है चाहे मुंह बिना ढके सोइए। 
पांडिचेरी में अरोविंदो आश्रम की गली : मेरी भी एक तस्‍वीर हो जाए। 

फोटो और कैप्‍शन :राजेश उत्‍साही 

4 टिप्‍पणियां:

  1. जीवंत...बोलते चित्र...आपकी इस विधा पर पकड़ काबिले तारीफ़ है...क्लिक करते रहें

    नीरज

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  2. पूरा देश ही जुगाड़ पर चला रहा है

    क्योकि जिन्हें देश चलाना चाहिए वो तो मुंह ढक कर सो रहे है

    और सारी दुनिया हम देखा आश्चर्य कर रही है की आखिर हम अभी तक चल कैसे रहे है |

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  3. जीवंत चित्र. सामाजिक खाका खींच रही हैं ये तस्वीरें.

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  4. अच्‍छे अच्‍छे जुगाड होते हैं हमारे यहां .. बढिया तस्‍वीरें !!

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