गुरुवार, 10 सितंबर 2009

चायना में चामराज नगर की चर्चा


27 से 31 जुलाई,2009 तक चायना के कुनमिंग शहर के युन्नान विश्वविद्यालय में इन्टरनेशनल यूनियन ऑफ एंथ्रोपोलोजिकल एंड एथोनोजिकल साइंस की 16 वीं वर्ल्ड कांग्रेस का आयोजन था। इसमें दुनिया भर से 2400 सेअधिक लोग आमंत्रित थे जो 93 देशों प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इनमें भारत के 529 भागीदार थे। ये भारत के विभिन्न विश्वविद्यालय,महाविद्यालय,स्रोत संस्थाओं और गैर सराकारी संगठनों से थे। इनमेंप्राध्यापक,विभागाध्यक्ष,सहायक प्राध्यापक,शोध छात्र शामिल थे। 15 भागीदार मैसूर से थे, जिनमें से डॉ.सरस्वतीजी. भी थीं(ऊपर फोटो में)। उन्हें इस कांग्रेस में Medical Pluralism sectors of Health Care and Health Seeking :Problems and Perspectives in Critical Medical Anthropology विषय परआयोजित पेनल डिस्कसन में Divergence from Medicine To Modern Medicine among Soiliga Tribe of B.R.Hills,Chamrajanagar District,Karnatak पर पेपर पढ़ने के लिए आमंत्रित किया गया था। ‍‍‍ ‍ ‍ ‍‍‍ ‍‍‍ ‍‍ डॉ.सरस्वती जी. ने कर्नाटक के चामराजनगर जिले के बी.आर.हिल्के आदिवासियों के रहन-सहन का गहराई से अध्ययन किया है। उनका प्रस्तुतिकरण और उस पर पेनल डिस्कशन 30 जुलाई को था।

सरस्वती चीन यानी चाइना की यात्रा से लौट आई हैं। हम जानते हैं कि ऐसी किसी भी यात्रा के लिए महीनों पहले से तैयारी शुरू हो जाती है। यह तैयारी भौतिक रूप से कम मानसिक रूप से ज्यादा होती है। मन में तमाम योजनाएं बनती हैं, सपने पनपते हैं। सरस्वती भी इस अहसास से जरूर गुजरी हैं। जब उन्होंने मुझे पहली बार इस यात्रा केबारे में बताया था तो मैं चायना को चैन्ने समझ बैठा था। और कुछ दिनों तक यही समझता रहा कि उन्हें
चैन्ने में किसी विश्वविद्यालय में अपना परचा पढ़ने जाना है। फिर एक दिन अचानक पता चला कि वे पासपोर्ट और वीजाकी औपचारिकताओं में व्यस्हैं। तब यह बात साफ हुई कि वे चैन्नै नहीं चायना जा रही हैं।

उन्हें 25 जुलाई,2009 को चैन्ने से अपनी यात्रा पर रवाना होना था। उन्हें टूरिस्श्रेणी में वीजा दिया जा रहा था, इसलिए बैंक खाते में एक निश्वित जमा राशि दिखानी जरूरी थी। वह दस- बीस हजार नहीं बल्कि एक लाख पचहत्तर हजार थी। एक औसत मध्यमवर्गीय परिवार के बैंक खाते में इतनी राशि होना सचमुच मुश्किल काम है।पर सरस्वती और उनके परिवार ने अपने सम्पर्कों का इस्तेमाल करके इसे संभव बनाया।
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दो सहेलियां:डॉ.सरस्‍वती और डॉ.प्रगति

सरस्वती इस यात्रा पर अकेली नहीं गईं थीं। बहुत से और लोग उनके साथ थे। परिवार,शुभचिंतकों और दोस्तों की शुभकामनाएं भी साथ थीं। और मुझ जैसा एक यायावर भी उनके साथ था, जो उनकी नजरों से चायना की यादगार यात्रा को देख रहा था।
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आइए आप भी देखिए।


हवाई यात्रा चैन्ने से शुरू होने वाली थी। सरस्वती मैसूर में रहती हैं। वे अज़ीमप्रेमजी फाउंडेशन,बंगलौर में शैक्षिक नेतृत्व एवं प्रबंधन कार्यक्रम(ईएलएमपी) में बतौर समन्वयक(शोध एवं दस्तावेजीकरण) कार्यरत हैं। मैसूर से चैन्ने ले जाने के लिए शताब्दी एक्सप्रेस यात्रियों का इंतजार कर रही थी। यह 25 जुलाई की दोपहर थी। सरस्वती को विदा करने उनके पति श्री प्रसाद और बेटी राधा आए थे। सरस्वती कम्पार्टमेंट की खिड़की पर अपना चेहरा सटाए देर तक आंखें बाहर गड़ाए रहीं। उनका एक हाथ खिड़की से बाहर हवा में लगातार हिलता रहा। वे और उनके साथी आखिरकार चायना यात्रा के लिए निकल ही पड़े। रात आठ बजे वे सब चैन्ने के रेल्वे स्टेशन पर थे। उनकी उड़ान रात ग्यारह बजे थी।
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थाई एयरलाइंस का हवाई जहाज यहां से बैंकाक के लिए उड़ा। दूरी थी लगभग 2000 किलोमीटर। भारतीय समय के अनुसार रात को
लगभग दो बजे जहाज बैंकाक के एयरपोर्ट पर उतर रहा था। जबकि यहां सुबह के लगभग साढ़े तीन बज रहे थे। यानी यहां समय डेढ़ घंटे आगे चल रहा था। बैंकाक का हवाई अड्डा भी किसी पर्यटन स्थल से कम नहीं है। तीन घंटे के पड़ाव के बाद अगली उड़ान सीधी कुनमिंग शहर के लिए थी। कुनमिंग जहां कांग्रेस का आयोजन था। दूरी कुछ 800 किलोमीटर। यह उड़ान भी थाई एयरवेज की थी। थाई एयरवेज में यात्रा करना अपने आप में एक नया अनुभव था। बैंकाक से कुनमिंग का सफर भी लगभग तीन घंटे का था।

कुनमिंग एयरपोर्ट पर आगंतुकों के लिए युन्
नान विश्वविद्यालय की बस मौजूद थी।


कुनमिंग
मेजबान शहर यानी कुनमिंग युन्
नान प्रांत की राजधानी है। युन्नान प्रांत राजनीतिक,आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न है। युन्नान यातायात और संचार के साधनों का केन्द्र है। 21000 वर्गकिलोमीटर में फैले कुनमिंग की आबादी 6 करोड़ से अधिक है। इनमें 7,60,000 इथेनिक अल्पसंख्यक आबादी है,जो कि कुल आबादी का लगभग 15 प्रतिशत है। अन्य प्रजातियों में यिस,हूयस,मिआस,बाइस तथा डाइस शामिल हैं। कुनमिंग प्रख्यात ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर है। कुनमिंग हवाई अड्डा चीन के पांच अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों में से एक है। कुनमिंग पहाडि़यों से घिरा है। मानसून यहां हमेशा बना रहता है। दक्षिणी गर्म हवाएं और बंगाल की खाड़ी से आने वाली सम्रुदी हवाएं यहां का मौसम खुशगवार रखती हैं। कुनमिंग का दिन बहुत लम्बा होता है जबकि रात छोटी होती है। सूर्यास्त लगभग 9.30 पर होता है। औसत तापमान 15 डिग्री सेल्सियश रहता है। इसीलिए कुनमिंग को स्प्रिंग सिटी भी कहा जाता है।

युन्‍नान विश्‍वविद्यालय

कांग्रेस का आयोजन युन्
नान विश्वविद्यालय में था। यह पूर्वी चायना का एक जाना-माना विश्वविद्यालय है। 1922 में स्थापित यह विश्वविद्यालय 1946 में ही ब्रिटानिका एनसाइक्लोपीडिया में चायना के 15 महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में आ गया था। आज यह चायना में उच्च शिक्षा के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय केन्द्र के रूप में जाना जाता है। बड़े पैमाने पर यहां विभिन्न अकादमिक पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं। जिनमें कला,विधिक,विज्ञान,तकनॉलॉजी,अर्थशास्त्र और प्रबंधन के पाठ्यक्रम शामिल हैं। युन्नान विश्वविद्यालय 27 स्कूल, महाविद्यालय तथा अन् संस्थानों का प्रबंधन करता है। 56 शोध कार्यक्रम,158 स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम और 5 पोस्ट डॉक्टरल पाठ्यक्रम चलाता है। विश्वविद्यालय में एक राज्यस्तरीय शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान भी है। विश्वविद्यालय का अपना एक प्रकाशन विभाग भी है जो विभिन्न शैक्षिक पत्रिकाओं का प्रकाशन करता है।

चायना में जिस बात ने सबसे ज्
यादा प्रभावित किया वह है वहां का वातावरण और नागरिक सुविधाएं। सड़क, सार्वजनिक शौचालय बिलकुल साफ-सुथरे और हरियाली से युक्त हैं। जो अपने आप में इस बात के परिचायक और प्रेरक हैं कि वहां स्वास्थ्य का हर कदम पर ध्यान रखा जाता है।

दो पहिया वाहन बैटरी से चलते हैं, जिससे न तो प्रदूषण होता है और न शोर। दो पहिया वाहन के लिए सड़क पर अलग से लेन है। पेट्रोल तथा
डीजल की बचत के लिए सारे संभव उपाय किए जाते हैं। हर सिग्नल पर वाहन अपना इंजन बंद कर देते हैं और सिग्नल मिलने पर फिर से चालू करते हैं। सारे वाहन अपनी लेन में ही चलते हैं। न ओवरटेक करने को कोशिश होती है न बेवजह हार्न बजाए जाते हैं।

बिजली की बचत के लिए भी इतनी ही संवेदनशीलता बरती जाती है। सभी होटलों,इमारतों और स्
कूलों के कमरों में बड़ी-बड़ी खिड़कियां बनाई गई हैं ताकि पर्याप्त रोशनी और हवा बिना रोक टोक के मिलती रहे। सबसे आश्चर्य की बात यह देखने में आई कि किसी होटल,आफिस या कालेज में पंखे, एयरकूलर या एसी देखने को नहीं मिले। पोलीथीन देखने को भी नहीं मिला। अगर आप कुछ खरीदते हैं तो आपको सामान कपड़े के बैग में दिया जाता है। आपको बाकायदा इसका मूल्य भी चुकाना होता है।

कांग्रेस के पांच दिन के कार्यक्रम में एंथ्रोपोलोजी और इथोनोलॉजी के विभिन्
न पहलुओं पर दुनिया भर से आए विद्वानों और शोधकर्त्ता के विचार जानने को मिले। पास के शहर में भ्रमण पर भी ले जाया गया। 1980 के आसपास यह शहर एक पिछड़ा हुआ गांव था। समय के साथ इसने विकास किया। और आज यह आत्मनिर्भर है। इसके पीछे यहां की सरकार की अपनी नीतियां हैं। सोशिलिज्म,कम्युनिज्म और सहकारिता के आंदोलन ने इसमें बहुत मदद की है। यहां सारी जमीन सरकार के अधिकार में है। हर परिवार को कुछ जमीन दी गई है। इस जमीन पर वे फसल उगाते हैं,फसल का एक हिस्सा सरकार को दिया जाता है। शेष में परिवार अपनी जीविका चलाता है। बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखा जाता है। जहां बच्चों को शिक्षा,भोजन,कपड़े आदि उपलब्ध कराए जाते हैं वहीं बुजुर्गों को पेंशन तथा मेडीकल की सुविधाएं दी जाती हैं। यह बताता है कि वहां बीते हुए कल और आने वाले कल का कितना ध्यान रखा जाता है।

वहां वालिंटियर मौजूद थे जो स्
थानीय समुदाय और मेजबानों के बीच दुभाषिए का काम कर रहे थे। उनकी मुस्काराहट और मधुर आवाज मेजबानों का उत्साह बनाए रखती थी। केवल इतना ही नहीं वे मेजबानों की हर जरूरत पूरी करने में पूरे मनोयोग से जुटे रहते थे। उनके सहयोग के बिना चायना की यह यात्रा यादगार नहीं बन सकती थी। आयोजकों ने भी कांग्रेस को सफल बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

चायना में खाने के लिए बहुत कुछ उपलब्
ध था। जिनमें मीठे आलू,कार्न, सब्जियां और फल तथा जूस दोपहर और रात के खाने के लिए थे। जबकि नाश्ते में बिस्कुट,केक,ब्रेड और नूडल्स होते थे।

चायना यात्रा पर जाते समय सरस्
वती को सलाह दी गई थी कि वे भारतीय व्यंजन साथ ले जाएं, वहां उन्हें भारतीय व्यंजन नहीं मिलेंगे। लेकिन वे अपने साथ कुछ नहीं ले गईं। सरस्वती एंथ्रोपोलोजिस्ट हैं। उन्होंने सीखा है वातावरण के अनुसार अपने को अनुकूलित करना है, अपनी संस्कृति और अपने रहन-सहन को भूलकर।

वे डार्विन का एक वाक्
य हमेशा याद रखती हैं कि, ‘जीवित वही रहते हैं जो अपने को परिस्थिति के अनुसार ढाल लेते हैं।’

2 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर चर्चा...बड़े ही मनभावन चित्र लिया हुआ आप का यह आलेख बेहतरीन है..
    डॉ. सरस्वती जी को उनके नेक कार्यो के लिए बधाई..और इस उपलब्धि के लिए भी बधाई..

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