शनिवार, 10 मार्च 2012

उदयपुर में 'वह, जो शेष है'


उदयपुर की सड़कों के किनारे ये पानी राम 
हर जगह नजर आए। सच है पेड़ हैं तो 
पानी है। पेड़ को सहेजने के लिए है यह। 
पहली बार उदयपुर की यात्रा पर था। शैक्षिक संस्‍था विद्याभवन दो शैक्षिक पत्रिकाओं का प्रकाशन करती है। एक ‘बुनियादी शिक्षा’ और दूसरी ‘खोजें और जानें’। हाल ही में इन पत्रिकाओं को  अज़ीमप्रेमजी फाउंडेशन के साथ मिलकर निकाले जाने का फैसला हुआ है। ‘खोजें और जानें’ की सम्‍पादकीय टीम में मेरा नाम शामिल है। उदयपुर में सम्‍पादकीय टीम की बैठक थी 3 और 4 मार्च को। फाउंडेशन की ओर से वीरेन्‍द्र शर्मा भी जयपुर से आ रहे थे और देहरादून से बुनियादी शि‍क्षा की टीम के सदस्‍य गुरवचनसिंह और कमलेश जोशी भी ।
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2 मार्च की दोपहर बंगलौर से उड़ा हवाई जहाज लगभग ढाई बजे मुंबई के छत्रपति शिवाजी हवाई अड्डे पर उतरा। शाम छह बजे उदयपुर के लिए अगली उड़ान थी। हवाई अड्डे का वही लाउंज था जहां पिछली यात्रा में गुलज़ार जी से मुलाकात हुई थी और बाद में वे और मैं भोपाल तक पूरे समय साथ थे। वही समय था, वही गेट और वही रनवे। बस तारीख बदल गई थी और लोग भी। साढ़े तीन घंटे का समय वहीं काटना था।
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उमर का फोन आ गया था। मोहम्‍मद उमर एकलव्‍य में साथ था। फिर एक साल अज़ीमप्रेमजी फाउंडेशन में रहा। और अब आईसीआईसीआई की एक शैक्षिक परियोजना में उदयपुर में है।  परियोजना के सिलसिले में ही एलीथिया वहां थीं। एलीथिया भी एकलव्‍य में सहयोगी रही हैं। वे भी मिलना चाहती थीं। लेकिन कुछ संयोग ऐसा था कि जिस हवाई जहाज से मैं जा रहा था, उसी से वे वापस पूना लौट रही थीं। शाम लगभग सवा सात बजे उदयपुर में उतरा। किसी छोटे से रेल्‍वे स्‍टेशन की तरह छोटा-सा हवाई अड्डा, भोपाल जितना ही। एलीथिया प्रस्‍थान कक्ष में बैंठी थीं, वे मुझे नजर आ गईं, लेकिन वे मुझे नहीं देख पा रही थीं। हमारे बीच मोटा शीशा था। जब तक इशारे से उन तक अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश करता तब तक उनके हवाई जहाज में बैठने के लिए प्रस्‍थान की उद्घोषणा हो चुकी थी।
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मैं बाहर निकल आया। विद्याभवन से गाड़ी आने वाली थी। नाम की त‍ख्‍ती लिए खडे़ लोगों में अपना नाम खोज रहा था। नाम नहीं था। एक तख्‍ती पर राजेश सिंघवी लिखा था। मैंने सोचा हो सकता है उत्‍साही का सिंघवी हो गया होगा। पूछा तो निराशा हाथ लगी। वे सिंघवी जी को ही लेने आए थे। पता करने के लिए फोन कर ही रहा था कि अचानक ‘वेलकम टू विद्याभवन’ की तख्‍ती प्रगट हो गई।
टैक्‍सी के ड्रायवर ने पूछा, ‘आप अकेले ही हैं?’
मैंने कहा, ‘भैया यहां तो अकेले ही हैं और कौन आने वाला था अपने साथ।’ 
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‘वह, जो शेष है’ का औपचारिक विमोचन 27 फरवरी को विश्‍व‍पुस्‍तक मेले में हो चुका था। लेकिन अभी तक संग्रह हाथ नहीं आया था। कमलेश जोशी विश्‍वपुस्‍तक मेले में होते हुए आ रहे थे। उनसे अनुरोध किया था कि वे संग्रह की बीस-पच्‍चीस प्रतियां कबीर ( मेरा बेटा, जो पुस्‍तक मेले में एकलव्‍य के स्‍टाल पर था) से लेते आएं।
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खारोल कालोनी में  गेस्‍टहाउस के पास एक घर की चारदिवारी 
पर कांच से बनी ये आकृतियां आने-जाने वालों को मन मोह लेती हैं।
सबका ठिकाना एक ही गेस्‍टहाऊस में था। प्रथम तल पर अपने लिए तय कमरे में सामान रखा। सप्‍पने में जाकर हाथ-मुंह धोकर दिन भर की थकान उतार फेंकने की असफल कोशिश की।
कमलेश और गुरवचन जी मैदान तल पर ही थे। उनके कमरे में पहुंचा तो संग्रह मेरे सामने था। हाथ में उठाया जैसे कोई नवजात शिशु हो। नवजात शिशु ही तो था मेरे लिए। उलट-पलटकर देखा। पहली नजर में संतुष्‍ट था। सब कुछ ठीक ही लग रहा था।

गुरवचन जी के साथ भोपाल में गुल्‍लक और पलाश के लिए काम किया था। पूछा, ‘ सर, आपने देखा है यह संग्रह?’  
बोले, ‘नहीं।’  

मैं उठा और अपने शिशु को उनके हाथ में थमा दिया। वे बोल उठे, ‘अरे वाह।’ मैंने संग्रह वापस लिया और उसमें ‘गुरु समान गुरवचन जी को सादर’, लिखकर हस्‍ताक्षर कर भेंट कर दिया। एक सौजन्‍य प्रति का अधिकार तो कमलेश का बनता ही था, सो उन्‍हें भी सप्रेम लिखकर हस्‍ताक्षर कर प्रति भेंट कर दी।

तब तक गुरवचन जी ने संग्रह के कुछ पन्‍ने पलट डाले थे। एक कविता में सतरस्‍ता शब्‍द आया था। उसका अर्थ पूछते हुए उन्‍होंने कहा, यानी सात रास्‍ते। मैंने हामी भरी। वे बोले, ‘धोबी’ कविता अच्‍छी है। संग्रह पर दूसरी प्रतिक्रिया थी यह। पहली प्रतिक्रिया रमणीक मोहन ने दी थी रोहतक से। वे अपने साथ पुस्‍तक मेले से पच्‍चीस प्रतियां ले गए थे। उन्‍हें गांधी जी पर लिखीं कविताएं अच्‍छी लगीं थीं।
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कमलेश भी बीस प्रतियां लाए थे। मैंने तय कर लिया था कि अब जो भी सामने आएगा, उसे संग्रह बाकायदा यथोचित मूल्‍य लेकर ही दूंगा। संग्रह का दाम रुपए 99 है। मुझे लगा सौ रुपए कहने में भी कोई समस्‍या नहीं है।

सबसे पहले मिले कमल महेन्‍द्रू ,एकलव्‍य के पुराने साथी। वे आजकल विद्याभवन के साथ हैं। अपने अंदर के सारे संकोच और शर्म को ताक पर रखकर मैंने कहा, ‘सौ रुपए निकालिए और यह संग्रह खरीदिए।’
चिरपरिचित मुस्‍कान के साथ उनकी प्रतिक्रिया थी, ‘खरीदना पड़ेगा।’   
मैंने भरसक प्रयास करके निसंकोच कहा, ‘जी बिलकुल।’   
उनके चेहरे पर ‘ठीक है’ का भाव था।

कुछ ही समय बाद रमाकांत अग्निहोत्री सामने थे। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से सेवानिवृत भाषाशास्‍त्र के प्रोफेसर। लम्‍बे समय तक वे एकलव्‍य की गवर्निंग बॉडी में रहे हैं, सो उनसे भी बहुत पुराना परिचय है। वे भी इन दिनों विद्याभवन के साथ हैं। मैंने रटा हुआ वाक्‍य उनके सामने भी दोहराया। लेकिन उसमें एक परिवर्तन था, संग्रह देते हुए कहा, ‘सौ रूपए चाहिए।’ संग्रह देखकर उनके चेहरे पर प्रसन्‍नता का भाव था। वे संग्रह पलटने लगे। पहली कविता ‘चुप्‍पी’ पढ़ते हुए वे चुप थे। लेकिन ‘मरने से पहले’ कविता का अंतिम पद पढ़ते हुए वे चहक उठे, ‘वाह।’ उनकी प्रतिक्रिया थी, ‘राजेश तुम्‍हारी कविता की भाषा पढ़कर बहुत अच्‍छा लग रहा है। यह सहजता और सरलता अब दुर्लभ होती जा रही है। गनीमत है कि तुमने इसे अपनी कविता में बचाए रखा है।’ एक भाषाशास्‍त्री की यह टिप्‍पणी कवि के लिए क्‍या मायने रखती है, यह बखूबी समझा जा सकता है।

अगली सुबह विद्याभवन में कार्यरत शालिनी नाश्‍ते के लिए वहां आई थीं। रमाकांत जी ने कहा, ‘राजेश का कविता संग्रह आया है। आपको भी खरीदना चाहिए।’ शालिनी ने उत्‍सुकता प्रकट की और फिर संग्रह खरीद लिया। रमाकांत बोले, ‘राजेश मैंने रात को सब कविताएं पढ़ डालीं। नीमा पर लिखी तुम्‍हारी कविता बताती है कि तुमने क्‍या भोगा है।’ फिर बोले संग्रह की दो प्रतियां और दो। इसे यहां विद्याभवन के पुस्‍तकालय में भी होना चाहिए।

वीरेन्‍द्र शर्मा 
मेरे अगले ग्राहक वीरेन्‍द्र शर्मा थे। उन्‍होंने संग्रह बाद में देखा पहले उसके लिए आवश्‍यक राशि का भुगतान किया।
दो दिन बैठक थी। सो पूरे समय विद्याभवन के कार्यालय में ही बैठे रहे। ‘खोजें और जानें’ की सम्‍पादकीय टीम में विद्याभवन की विश्‍वविजया सिंह भी थीं। उन्‍होंने संग्रह देखा तो हाथ में ले‍ लिया। जब वापस किया तो उनकी प्रतिक्रिया लिखित रूप में साथ थी-
उत्‍साही जी,
दिल को छू गई है
सबसे अधिक
आपकी कविता
नीमा।
नीमा से मिलने की
इच्‍छा भी
बलवती हुई है।
कब होगा संयोग
पता नहीं।
संभव है
भविष्‍य में हो जाए संभव।
गांधी वाली कविताएं भी
अच्‍छी लगीं।
’इतनी जल्‍दी नहीं मरूंगा मैं’
में उत्‍सुकता
निरंतर बनी रही
लिखते रहें
आप
सतत-सर्वदा
अभी
शेष है
बहुत कुछ।
 *
बैठक समाप्‍त हुई तो एकलव्‍य के एक और पुराने साथी हृदयकांत दीवान साथ सामने थे। वे भी विद्याभवन में हैं। उनकी जेब से सौ का नोट बाहर आ चुका था और मेरे बैग से संग्रह की प्रति। बोले, ‘कवि महोदय आपके हस्‍ताक्षर भी चाहिए उस पर।‘
रमाकांत जी को याद आया कि उनकी प्रति पर तो मैंने कुछ भी नहीं लिखा है। बोले गेस्‍टहाउस लौटकर हमारी प्रति पर भी हस्‍ताक्षर करें। मैं हर प्रति पर हस्‍ताक्षर कर रहा था और लिख रहा था कि शुक्रिया आप मेरी कविताएं खरीदकर पढ़ रहे हैं।
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गेस्‍टहाउस की देखरेख करने वाले और अतिथियों के लिए भोजन बनाने वाले मोखम जी ने भी मेरा संग्रह पढ़ डाला था। वे बोले,'आपकी बीनड़ी वाली कविता बहुत अच्‍छी है।' और नूर मोहम्‍मद कविता पढ़कर उन्‍हें उदयपुर के किसी तांगे वाले की याद हो आई। 
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ज्ञानशाला की युवतियां 
एक शाम उदयपुर की अपनी ढाणी में खाना खाते बीती थी। विद्याभवन में गुजरात से ज्ञानशाला परियोजना में कार्यरत युवतियों का एक दल प्रशिक्षण के लिए आया था। उन सबके साथ अपन भी अपनी ढाणी जा पहुंचे थे। वहां उन युवतियों ने वहां के लोक कलाकारों के साथ अपनी नृत्‍य कला भी दिखाई। बस में रास्‍ते भर वे अंताक्षरी खेलती रहीं, उसमें हम भी शामिल थे।
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आखिरी शाम खाने के लिए वीरेन्‍द्र जी और मैं उमर के घर आमंत्रित थे। फतेह सागर के किनारे उसके घर पहुंचे तो उमर ,रुखसाना और उनका बेटा अमान और खाने में छोले और पूरियां हमारी प्रतीक्षा में थे। रुखसाना ने बताया कि अमान तो सुबह से ही सबको कह रहा है हमारे घर राजेश रुत्‍साही आ रहे हैं। चार साल के अमान से उत्‍साही नहीं बोला जा रहा था।

एक विमोचन रुखसाना के हाथों 
सोचा था उमर और रुखसाना ने इतने प्‍यार से खाने पर बुलाया है, उन्‍हें तो संग्रह की एक प्रति सौजन्‍य में ही भेंट कर दूंगा। पर न जाने क्‍या हुआ कि जैसे ही उमर ने संग्रह के बारे में पूछा, तो मेरे मुंह से निकला, ‘सौ रूपए निकालो।’ उमर ने एक क्षण की भी देर नहीं की। और अगले ही क्षण यह भी जोड़ा कि, ‘भैया आपका संग्रह तो हम खरीदकर ही पढ़ेंगे। बस एक शर्त है कि इस पर आप हम सबका नाम लिखें और इसे हमें देते हुए एक फोटो खिंचवाएं।’ मैं निरुत्‍तर था।
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एक और विमोचन उमर और अमान के हाथों 
जब ऐसे चाहने वाले हों तो दुनिया और भी हसीन लगने लगती है। और सचमुच उनके घर की खिड़की से पीछे फतेह सागर में झिलमिलाती रोशनी का नजारा ऐसा ही कुछ कह रहा था।
                                0 राजेश उत्‍साही

7 टिप्‍पणियां:

  1. किताब के प्रति आपके उत्साह और कमिटमेंट को देख प्रकाशक से अधिक कौन खुश होगा. असीम शुभकामनाएं...

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  2. Mohd Umar ने लिखा: "Amaan, Umar aur Rukhsana ki taraf se bahut shukriya. kavita sangrah mein noor mohammed ka ghoda aur chokra dil ko choo gaye hain, isi tarah kabbo ka rajesh aur neema ko jhagadtey huye dekh kar kahna ki ' aap log gandey ho' mere anubhavon ke bahut kareeb hai. amaan bhi mujhko aur apni maa ko zara si tez aavaj me baat karte dekh jor se chillata hai aur kehta hai " gandey sab log". maa baap ko samajhna chahiye ki unke jhagadney ka bachchon per kya asar padta hai......hamara saubhagya raha ki yeh pustak hame aapke haathon prapt hui.......behtareen kavita sangrah ke liye ek baar fir badhaai...aise hi likhte rahiye."

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  3. आपके हाथ से पुस्तक प्राप्त करने का आनंद ही कुछ और है।

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  4. @राजेश रुत्‍साही :)
    बहुत सुन्दर! एक उत्साही का उत्साह इस आलेख के हर अक्षर में दिख रहा है।

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