बुधवार, 10 नवंबर 2010

दो नहीं तीन ब्‍लागरों का मिलन

मोबाइल फोन तो अपन पिछले तीन साल से उपयोग कर रहे हैं। पर उसकी एसएमएस सेवा से बहुत ज्‍यादा लगाव नहीं रहा है। सो बस मतलब के लिए देख लेते हैं। अक्‍टूबर में तारीख तो याद नहीं, पर किसी एक दिन सुबह-सुबह एक नंबर और नाम एसएमएस के जरिए आया। नाम भी परिचित नहीं था और खैर नंबर पहचाने का तो सवाल ही नहीं। सोचा होगा कोई।

दफ्तर सुबह साढ़े आठ बजे शुरू होता है। फोन कंपनी हर दिन साढ़े आठ बजे ही एक संदेश भेजती है कि आपका बिल कितना हो गया है। और उसके बाद ऐसे ही एक-दो और संदेश। सो कई बार इन्‍हें खोलकर देखता भी नहीं हूं। पर कई बार इस चक्‍कर में काम के संदेश भी छूट जाते हैं। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। पहले संदेश पूरा नहीं आया था और दुबारा आया तो मैंने देखा नहीं। जब देखने में आया तो पता चला कि दिल्‍ली से एक मित्र के मित्र बंगलौर में आए हैं और बात करना चाहते हैं। नंबर था तो तुरंत उन्‍हें फोन लगाया। मित्र रामेश्‍वर काम्‍बोज ‘हिमांशु’ हैं और उनके मित्र बलराम अग्रवाल। हिमांशु जी से भी दोस्‍ती ब्‍लाग की दुनिया में ही हुई है। बात निकली तो फिर निकलती चली गई। केवल बलराम के नाम से मशहूर एक और लेखक हैं। वे सारिका में हुआ करते थे। लघुकथा आंदोलन के दौर में उन्‍हें पढ़ते रहे हैं। सो पूछ लिया कि कहीं आप वही तो नहीं। बहुत आराम से उन्‍होंने कहा जी नहीं मैं वो नहीं हूं, पर हूं मैं भी बलराम ही। और वे बलराम भी मेरे मित्र ही हैं। खैर जैसा मैंने कहा कि बात निकलती है तो फिर निकलती चली जाती है। बलराम अग्रवाल जी जाने-माने कहानीकार और लघुकथाकार हैं। 

बलराम जी बेटे आदित्‍य के साथ
बलराम अग्रवाल जी के बड़े बेटे आकाश बंगलौर में नौकरी करते हैं। मोटरसाइकिल की एक दुघर्टना में उनकी कालरबोन में फैक्चर हो गया। बस उनकी देखभाल के लिए वे बंगलौर चले आए। काम्‍बोज जी से उन्‍होंने पूछा कि कोई हिन्‍दी पढ़ने लिखने वाले परिचित हों तो बताएं। तो उन्‍होंने मेरा नंबर दे दिया। बलराम जी रंगमंच से भी जुडे़ हैं। इन दिनों वे एक ईपत्रिका के लिए रंगकर्मियों के साक्षात्‍कार कर रहे हैं, उनके बारे में लिख रहे हैं। मुझसे भी वे इस बारे में जानकारी चाहते थे। मैंने कुछ सम्‍पर्क उन्‍हें दिए। पर बात यहां खत्‍म नहीं हुई,शुरू हुई। फोन पर तो हम बतिया लिए। वे हमारे ब्‍लाग और हम उनके ब्‍लाग  'जनगाथा', 'कथायात्रा' एवं 'लघुकथा-वार्ता' 'अपना दौर'  पर घूम आए। 

वे बंगलौर में पुराने एयरपोर्ट के पास कग्‍गादासपुरा(निकट सीवी रमन नगर) में थे। और हम सरजापुर रोड पर बिलकुल बाहर विप्रो गेट के सामने से मोरी गेट से होते हुए राममंदिर के पास हल्‍लनायकनहल्‍ली गांव में। हमने कहा कि हम आते हैं आपके घर। बोले आइए। पर मैं भी बंगलौर घूमना चाहता हूं तो पहले मैं निकलता हूं घर से। हमने कहा ठीक। उन्‍हें पता समझा दिया। हमने सोचा आज तो बात हुई है। आज तो वे आने से रहे। फिर कभी आएंगे।  

छुट्टी का दिन था तो हम भी आराम से बैठे थे। हफ्ते भरके कपड़े एक दिन धोने ही होते हैं। शनिवार को धोओ या फिर रविवार को। शनिवार को धो लो तो आराम रहता है। सोचा कि कपड़े भी धो ही डाले जाएं। कपड़े भिगो दिए। छ़ुट्टी के दिन खाना भी घर में बनाना होता है। सो गैस पर दाल चढ़ा दी। बस तभी बलराम जी का फोन आ गया कि वे अपने छोटे बेटे आदित्‍य के साथ मोटर साइकिल से आ रहे हैं। हमने सोचा अब क्‍या करें। दोपहर हो रही थी तो काम को बाद के लिए टालना भी संभव नहीं था। हमने अपनी एनसीसी की ट्रेनिंग को याद किया और जल्‍दी जल्‍दी सारा काम निपटाया। और जैसे काम से निपटे कि बलराम जी हाजिर थे।

अब आप समझ ही सकते है कि जब दो लिखने-पढ़ने वाले मिलते हैं तो क्‍या बात करते हैं। तो यहां तो एक और विशेषता थी कि दोनों ब्‍लागर भी थे। तो लगभग डेढ़-दो घंटे चर्चा हुई और उसके साथ चाय भी। हम दोनों ही मध्‍यमवर्गीय परिवार से आते हैं। जब अपनी कहानी कही और सुनी तो लगा कितनी बातें हैं,जिनमें एक तरह का साम्‍य नजर आता है। यह साम्‍य ही जो वैचारिक रूप से दो व्‍यक्तियों को पास पास लाता है। हम दोनों को ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं। लगा जैसे हमेशा एक-दूसरे को जानते थे। बस पहचानते नहीं थे।

इसीलिए उन्‍होंने वापस जाकर गुल्‍लक पर मेरी एक पोस्‍ट दास्‍तान दाढ़ी की पढ़ते हुए यह टिप्‍पणी की, ‘उत्साही जी, मैंने तो आपको सबसे पहले फोटो में ही देखा था, वही दाढ़ीवाले फोटो में। इसलिए जब आप राम मन्दिर के पास क्लीन-शेव्ड खड़े दिखे तो आपने नोट किया होगा कि पहले हाथ हिलाने का मौका मैंने आपको ही दिया था। हुआ यूँ कि मेन रोड से जब आपके 'मोरी गेट' की ओर मुड़ रहे थे तो एक क्लीन-शेव्ड सज्जन किसी को बिल्कुल वैसे ही हाथ लहराकर अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे। बेटे ने कहा--यही तो नहीं हैं? यही होते तो दो-ढाई किलोमीटर अन्दर आने का निर्देश क्यों देते? मैंने कहा। उस गली में घुस जाने और पीछे मुड़कर देखने पर पता चला कि वह सज्जन किसी महिला को रिसीव करने उस मोड़ पर खड़े थे। आप हाथ न हिलाकर अनजान बने रहने का दाँव खेलते तो मैं काफी हद तक चकमे में आ जाता। मैं तो वास्तव में दाढ़ीवाले उत्साही से ही मिलने गया था।‘ दरअसल फेसबुक पर मेरी प्रोफाइल में दाढ़ी वाली फोटो ही है। बलराम जी ने वही देख रखी थी। 

पुनश्‍च: लो जी यह नई जानकारी मिली कि आदित्‍य भी ब्‍लागिंग करते हैं। पर मजे की बात यह है कि वे जब बलराम जी को मोटरसाइकिल पर लेकर आए थे तो पूरे समय हम लोगों के साथ ही रहे। पर उन्‍होंने न तो हमारी बातचीत में भागीदारी की और न ही इस बात का परिचय दिया कि वे भी एक ब्‍लागर हैं। निश्चित ही यह उनका संकोच रहा होगा कि जब दो लेखक बतिया रहे हैं तो उनके बीच उनका क्‍या काम। वे एक अच्‍छे बच्‍चे की तरह चुपचाप बैठे रहे। हां बीच में मैंने चकमक पत्रिका के बाउंड वाल्‍यूम दिए तो वे उसे पलटते-पढ़ते रहे। बलराम जी को भी दाद देनी पड़ेगी(और साधुवाद भी) कि जब आज के जमाने में लोग अपने परिवार के सदस्‍यों के बारे में मौका मिलते ही बढ़-चढ़कर बोलने लगते हैं वहां बलराम जी ने इस बात की भनक तक नहीं लगने दी। आदित्‍य ने एनीमेशन की पढ़ाई की है। सो उनके ब्‍लाग का नाम भी एनीमेटर है। पहले मैंने इस पोस्‍ट को शीर्षक दिया था दो ब्‍लागरों का मिलन। लेकिन जब पता चला कि आदित्‍य भी ब्‍लागर हैं तो शीर्षक बदल दिया। बदलना ही चाहिए न क्‍योंकि उस दिन वास्‍तव में हम तीन ब्‍लागर मिले थे।  
  (बलराम जी दोनों फोटो में मौजूद हैं। जाहिर है कि एक फोटो आदित्‍य ने लिया है और एक मैंने।)     
                                        0 राजेश उत्‍साही 

11 टिप्‍पणियां:

  1. पढकर अच्‍छा लगा .. ब्‍लोगरों के मध्‍य ऐसा ही स्‍नेह बना रहे .. शुभकामनाएं !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. aadarniy sir,
    aapne bilkul sahi likha hai .kabhi -kabhi itne phone aate hai ki log pareshan hokarphone ko andekha ansuna kar dete hai jisase bahut si jaroori baaten ya s .m.s rah jaate hain.
    blog jagat ke jariye aapko aaphi ki tarah aachhe-achhe sahitykaro se sapark v nimantran mila,so iske liye aapko bahut bahut badhai.
    hota yahi hai ki jab apni hi vicharo ka vyakti mil jaata hai to samay ki koi seema nahi rah jaati hai.mere yahan bhi kuchh aisa hi mahoul rahta hai .bhaii, yah bhi to ek lekhak ka ghar hai .mere shrimaan ji lehkak jo thahare,so is isthiti se main purntaya avgat hun.
    roman me tippani likh rahi hu.xama kijiyega..
    poonam

    उत्तर देंहटाएं
  3. ब्‍लोगरों के मध्‍य ऐसा ही स्‍नेह बना रहे .

    उत्तर देंहटाएं
  4. उत्साही जी, आपका आभार कि आपने इस भेंट को स्थाई बना दिया। आपसे मिलकर मुझे या आदित्य को लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं। आपकी वजह से ही 'रंग शंकर' जाने की प्रेरणा मिली। अभी 20-22 दिन और बंगलौर में हूँ, मुलाकातें जरूर होंगी।

    उत्तर देंहटाएं
  5. ये बातें, ये मुलाकातें यूँ ही चलती रहें।

    उत्तर देंहटाएं
  6. ब्लॉग ने लोगों को बीच एक नया रिश्ता बना दिया है |

    उत्तर देंहटाएं
  7. ब्लोगिंग ने कितने नए रिश्ते जोड़ दिए हैं .... बहुत अच्छी लगी ये पोस्ट ..

    उत्तर देंहटाएं
  8. Sach mein blogging se anjaan rishte kab apne ban jaate hain pata hi nahi chalta.. ek paariwarik mahaul sa ban jaata hai... bahut sundar prastuti..aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  9. बाऊ जी,
    नमस्ते!
    स्वाद आया.
    वैसे अगर हमसे भी सर्दियों में कोई मिलने आये तो पहचान नहीं पायेगा..... दाढ़ी जो रखते हैं!
    वैसे दाढ़ी हो या बे-दाढ़ी, बस उत्साह कम नहीं होना चाहिए!
    आशीष

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत रोचक वर्णन...आप या तो परमानेंट दाढ़ी रखें या हटा दें रखने और हटाने से सीधे साधे ब्लोगर कन्फ्यूज हो जाते हैं...:-)

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं