हमारे दो बेटे हैं। पत्नी निर्मला अक्सर कहतीं रहीं कि काश एक बिटिया भी घर में होती। मैं जब भी कारण पूछता तो वे कहतीं हैं, ‘अरे कम से कम एक कप चाय तो बनाकर पिलाती। ये बेटे तो बस दिन भर चाय बनवाते ही रहते हैं। लड़की होती तो घर के काम में मेरा हाथ बंटाती।‘ मैं जानता हूं कि बात इससे कहीं गहरी है। शायद एक महिला अपनी बहुत-सी बातें बेटी के साथ जितनी बांट सकती है उतनी बेटों या पति के साथ नहीं। बहरहाल मैंने इसे नियति का फैसला ही माना कि हमारे अपने घर में बिटिया नहीं है।