बंगलौर आए तीन महीने हो गए हैं। ऐसा लगता नहीं है कि भोपाल छोड़कर बंगलौर में हूं। इसका बहुत कुछ श्रेय शायद मोबाइल फोन को जाता है। लगभग हर रोज नीमा,गोलू,मोलू से बातचीत हो ही जाती है। और किसी न किसी दोस्त या परिचित से भी।
फिर भी बंगलौर में ऐसा बहुत कुछ है जो मुझे अलग लगता है।
घर। हां, जहां हम रहते हैं उसे ही तो हम घर कहते हैं। मेरी सुबह ये रातें,जो बंगलौर में बीत रहीं हैं,अब कभी वापस नहीं आएंगी। इन्हें जिस छत के नीचे मैं बिता रहा हूं, उसे अगर घर न कहूं तो क्या हूं। असल में यह उस जगह का,उस जमीन का अपमान होगा, अनादर होगा। क्या घर केवल सामान से बनता है। शायद नहीं। अगर सामान परिभाषा है तो इस घर में मेरे पास सामान के नाम पर दो बैग,सात जोड़ी कपड़े, एक कंबल, दो ओढ़ने की चादर,दो बिछाने की और दो चटाईयां हैं। लेकिन फिर भी मैं वहां रहता हूं। और उसी को घर कहता हूं। केवल मैं ही नहीं हम तीन लोग रहते हैं। बाकी दो के पास तो और भी कम सामान है।