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शनिवार, 14 अप्रैल 2012

ताकि सनद रहे....


इधर यायावरी पढ़ने बहुत कम लोग आते हैं। पर मन है कि मानता ही नहीं लिखने से। चलो अपना काम तो लिखना है, ताकि सनद रहे।

रोहतक से अगला पड़ाव जयपुर का था दिल्‍ली होते हुए। वहां अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के उत्‍तर क्षेत्र के सदस्‍यों का वार्षिक मिलन समारोह था 20-21 मार्च,2012 को। हमारी गिनती दक्षिणी क्षेत्र में होती है, पर उत्‍तर क्षेत्र के साथियों से मिलने के लिए मैंने यहां आना तय किया था।


सोमवार, 5 दिसंबर 2011

सम्‍पर्क क्रांति में सम्‍पर्क



इस बार जब भोपाल से बंगलौर के लिए रवाना हुआ तो कुछ संयोग होते चले गए। एक सज्‍जन इटारसी से भोपाल आए थे। साथ में उनकी पत्‍नी भी थीं। बंगलौर में लकड़ी का व्‍यवसाय करते हैं। मुझे इटारसी के अपने एक पुराने मित्र नटवर पटेल की याद हो आई। उसके घर में भी लकड़ी का व्‍यवसाय ही होता था। सज्‍जन कहने लगे कि, अरे वह तो हमारे पार्टनर ही थे, कुछ साल वे बंगलौर भी आकर रहे। मैंने उनके हालचाल जानने की कोशिश की। बात आई गई हो गई।

शनिवार, 12 नवंबर 2011

गुलज़ार जी से गपशप आकाश में

भोपाल में भारत भवन के खुले रंगमंच पर फूलों के आदान-प्रदान का यह लघु नाटक  मेरे और गुलज़ार जी के बीच 23 अक्‍टूबर की सुबह खेला गया। पीछे भोपाल का मशहूर तालाब नजर आ रहा है। 
फोटो आकाशवाणी भोपाल के एनाउंसर राजुरकर 'राज' ने लिया।
भोपाल जाने वाले हवाई जहाज में चढ़ने की उद्घोषणा होने लगी थी। छत्रपति शिवाजी हवाई अड्डे के गेट नम्‍बर 14 के सामने लोग कतारबद्ध हो रहे थे। हम भी शामिल होने के लिए आगे बढ़े। तब तक एक बुजुर्ग साहबान ने गुलज़ार जी को पहचान लिया था। अपनी छड़ी टेकते हुए वे पीछे पीछे आ रहे थे। दोनों के बीच दुआ सलाम हुई। गुलज़ार जी पीछे हट गए और उन्‍हें आगे कर दिया। मैं गुलज़ार जी के पीछे था। वे पलटे और मुझे भी आगे आने का इशारा किया। मैं झिझकता हुआ कतार में उनके आगे आ गया। अपनी स्‍ट्राली उन्‍होंने मुझ से वापस ले ली थी। गेट पार कर हम बाहर निकले बस सामने ही थी। लगभग 5 मिनट के सफर के बाद बस हवाई जहाज के पास पहुंची। बस से उतरे तो हवाई जहाज में चढ़ने के लिए फिर कतार थी। मैं कतार में उनके पीछे था दो और व्‍यक्तियों के पीछे। उन्‍होंने फिर पलटकर देखा और हाथ पकड़कर मुझे आगे खींच लिया। मैंने उनके हाथ से स्‍ट्राली लेने की कोशिश की। उन्‍होंने मना कर दिया। कहा,  इसमें वजन कहां है यह तो हल्‍की है।

बुधवार, 19 अगस्त 2009

रायपुर-भोपाल-नागपुर-रायपुर


28 जुलाई,2009

सुबह तीन बजे बिस्‍तर छोड़ देना पड़ा क्‍योंकि रायपुर के लिए उड़ान साढ़े छह बजे सुबह थी। वह भी सीधी नहीं वाया हैदराबाद । बंगलौर से छोटा हवाई जहाज हमें लेकर उड़ा। मेरे साथ फाउंडेशन की धीरा भी थी। साढ़े़ सात बजे हम हैदराबाद के शमशाबाद हवाई अड्डे पर थे। मौसम साफ पर ठ़ंडा था। रायपुर जाने वाला हवाई जहाज जैसे हमारी प्रतीक्षा में ही था। यह भी छोटा ही था। इस बार मैंने खिड़की वाली सीट चुनी। आठ बजे हैदराबाद से उड़े और दस बजे रायपुर के माना हवाई अड्डे पर थे। हैदराबाद से रायपुर के बीच का दृश्‍य देखने लायक था। रायपुर से कुछ पहले नीचे एक बहुत चौड़े पाट वाली नदी के दर्शन हुए। संभवत: महानदी थी। सबसे सुखद बात यह थी कि इसमें पानी भी था। पिछले दिनों इधर बारिश हुई थी। अच्‍छी बारिश।

फाउंडेशन के कम्‍प्‍यूटर एडेड लर्निग प्रोग्राम के तहत शिक्षक विकास परिचर्चा कार्यशाला का आयोजन धमतरी जिले के कुरूद विकासखंड में था। धीरा और मुझे इस कार्यशाला में ही जाना था। कार्यशाला 30 से थी। मैं दो दिन रायपुर में रूकने वाला था। धीरा को सीधे कुरूद जाना था। उसे लेने टैक्‍सी आने वाली थी। हम उसके इंतजार में एयरपोर्ट पर बैठे रहे। लगभग ग्‍यारह बजे टैक्‍सी आई। उसने मुझे छत्‍तीसगढ़ शिक्षा स्रोत केन्‍द्र में छोड़ा। मैं दो दिन यहीं रहने वाला था। यह केन्‍द्र एकलव्‍य, विद्यामंदिर तथा दिगन्‍तर ने मिलकर बनाया है। एकलव्‍य के पुराने साथी संजय तिवारी इसके प्रभारी हैं। उनसे मिलने का भी लोभ था और उनके साथियों से भी। संजय और उनके साथियों से तो मुलाकात हुई। औपचारिक बातचीत हुई। टीचर्स पोर्टल के बारे में बात हुई।

शनिवार, 6 जून 2009

बंगलौर डायरी


‍बंगलौर आए तीन महीने हो गए हैं। ऐसा लगता नहीं है कि भोपाल छोड़कर बंगलौर में हूं। इसका बहुत कुछ श्रेय शायद मोबाइल फोन को जाता है। लगभग हर रोज नीमा,गोलू,मोलू से बातचीत हो ही जाती है। और किसी न किसी दोस्‍त या परिचित से भी।

फिर भी बंगलौर में ऐसा बहुत कुछ है जो मुझे अलग लगता है।
घर। हां, जहां हम रहते हैं उसे ही तो हम घर कहते हैं। मेरी सुबह ये रातें,जो बंगलौर में बीत रहीं हैं,अब कभी वापस नहीं आएंगी। इन्‍हें जिस छत के नीचे मैं बिता रहा हूं, उसे अगर घर न कहूं तो क्‍या हूं। असल में यह उस जगह का,उस जमीन का अपमान होगा, अनादर होगा। क्‍या घर केवल सामान से बनता है। शायद नहीं। अगर सामान परिभाषा है तो इस घर में मेरे पास सामान के नाम पर दो बैग,सात जोड़ी कपड़े, एक कंबल, दो ओढ़ने की चादर,दो बिछाने की और दो चटाईयां हैं। लेकिन फिर भी मैं वहां रहता हूं। और उसी को घर कहता हूं। केवल मैं ही नहीं हम तीन लोग रहते हैं। बाकी दो के पास तो और भी कम सामान है।