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शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

मिलना दो बालाओं ऊर्फ बलाओं से




मुलाकात तो छोटी-सी ही थी पर हुई तो ऐसी कि यादगार बन गई। 30 सितंबर की रात को दिल्‍ली से निशु का फोन आया कि,
-    चार-पांच दिन की छुट्टियां हैं, कहीं कोई वर्कशाप वगैरा हो रही हो तो बताइए।
-    अरे अब ये छुट्टियां तो त्‍यौहारों की है, लोग त्‍यौहार मनाएंगे कि वर्कशाप करेंगे!
-    हां ये बात तो है। तो आप क्‍या कर रहे हैं।
-    मैं तो भोपाल जा रहा हूं।
-    अरे वाह! कब !
-    2 को व्‍हाया तुम्‍हारी दिल्‍ली होते हुए। तीन घंटे दिल्‍ली एयरपोर्ट पर रहूंगा, समय मिले और संभव हो तो आ जाओ मिलने।
-    अरे, ये तो बहुत बढि़या है। चलो एक छुट्टी को ठिकाने लगाने का इंतजाम हो गया। आती हूं और ईशा को भी पकड़ लाऊंगी।

बहरहाल तय हुआ कि दिल्‍ली के इंदिरागांधी अंतरराष्‍ट्रीय हवाई अड्डे के यात्री प्रतीक्षालय में मुलाकात होगी।

निशु से परिचय फेसबुक के जरिए ही हुआ था। हां यह अलग बात है कि वह एकलव्‍य और चकमक से बहुत अच्‍छे से परिचित है। जब चकमक से परिचय है तो हमसे होना ही ठहरा। इतना ही नहीं वह जिस निजी स्‍कूल में पढ़ाती है, उसकी एक पाठ्यपुस्‍तक में आलू मिर्ची चाय जी भी शामिल है। तो बीच-बीच में निशु से दो-तीन बार फोन पर लंबी गपशप भी हुई। फेसबुक पर भी उसके स्‍टेटस देखता रहा हूं। और ब्‍लाग भी पढ़ा है। उसकी बातें, तर्क, विचार, दुनिया को देखने का नजरिया सुन-जानकर मेरा मन हुआ कि इन मोहतरमा को केवल सुनना ही नहीं मिलना भी चाहिए। 

ईशा और निशु सहपाठी और सहकर्मी हैं। पर ईशा से बस फेसबुक का परिचय ही था, कभी बात नहीं हुई थी। हां वह कबीर की अच्‍छी मित्र हैं। निशु की तरह वह भी एकलव्‍य और चकमक से परिचित हैं। असल में दोनों मिरांडा हाउस में बीएलएड की छात्राएं रही हैं। पिछले कुछ सालों में बीएलएड की छात्राएं शैक्षिक भ्रमण पर एकलव्‍य आती रही हैं। 

बंगलौर से दिल्‍ली की उड़ान दस मिनट लेट चली थी, पर वह टाइम पर यानी पौने  चार बजे पहुंच गई। वहां उतरकर जब फोन को साइलेंट मोड से बाहर निकाला तो पहला संदेश मिला कि दिल्‍ली से भोपाल की उड़ान साढे छह की बजाय अब आठ बजे जाएगी। उड़ान के लेट होने की सूचना से आमतौर पर खुशी देने वाली नहीं होती। पर आज खुशी ही हुई कि चलो मुलाकात के लिए थोड़ा और वक्‍त मिल जाएगा। निशु को फोन लगाया तो पता चला कि वे लोग अभी एयरपोर्ट एक्‍सप्रेस-  वे यानी मेट्रो में हैं। मैं बाहर निकलकर उनकी प्रतीक्षा करने लगा।

थोड़ी ही देर में दोनों हाजिर थीं। मैंने उन्‍हें उड़ान के लेट होने की शुभ सूचना दी तो वे भी खुशी से उछल पड़ीं। तय किया गया कि अब हम यात्री प्रतीक्षालय में ही नहीं बैठे रहेंगे। अगली उड़ान में इतना वक्‍त है कि कहीं बाहर जाकर वापस आया जा सकता है। निशु ने अपनी किसी अन्‍य मित्र से बात की और जानकारी ली। तय हुआ कि द्वारका सबसे नजदीक है, वहां रेस्‍टोरेंट हैं। 

मेट्रो लेकर हम द्वारका पहुंचे। दिल्‍ली से अपरिचित। आटो वाले से,साइकिल रिक्‍शा वाले से जिससे भी बात करनी हो निशु आगे बढ़कर बेधड़क, बेझिझक बात कर रही थी। उसका यह आत्‍मविश्‍वास देखकर अच्‍छा लग रहा था। वह अपनी बातचीत में,विचारों में जैसी है वैसी ही व्‍यवहार में। ऐसा बहुत कम होता है। बनस्बित ईशा कुछ शांत और थोड़ा-सा कम बोलने वाली लगी। (अब यह मेरा भ्रम भी हो सकता है) लेकिन आत्‍मविश्‍वास उसके चेहरे से झलकता है। मैंने उसे किसी मित्र को फोन पर कहते सुना...अरे तू फिकर मतकर अपन निपट लेंगे उससे। मतलब  यह  कि मैं दिल्‍ली की दो बालाओं के साथ था। 

हमें द्वारका के सेक्‍टर 12 में जाना था। पर किसी ऑटो वाले से बात नहीं बनी। अंतत: एक साइकिल रिक्‍शा वाले की सलाह पर उसके ही रिक्‍शे ही सवार होकर हम स्‍टेशन के पास ही दिख रहे एक बाजार की ओर रवाना हुए। बाजार में दोपहर के खत्‍म होते अवकाश जैसा माहौल था और कुछ शायद गांधी जयंती (यानी ड्राय-डे)  का असर। दुकानें उनींदी सी थीं। हम लोगों ने एक सिरे से दूसरे सिरे तक एक चक्‍कर लगाया। दुकानों में या उनके सामने जो लोग अलसाए से बैठे थे, उन्‍होंने हमें ऐसे देखा, जैसे हम चिडि़याघर से भागकर आए हैं। निशु लगभग हर दुकान में जाकर यह पूछ रही थी कि यहां कोई ऐसी दुकान है, जहां बैठकर जीमा जा सके। आखिरकार  तय हुआ कि खाना पैक करवा लिया जाए और सामने दिख रहे पार्क में उसे जीमा जाए। हमारे इस विचार से दुकान वाला सहमत नहीं दिखा। उसने हमें ऐसा न करने की सलाह दी। अलबत्‍ता उसने वैकल्पिक सुझाव दिया कि उस पार्क के बाजू में दिख रहे एक उजाड़ पार्क में हम अपने भोज का आयोजन कर सकते हैं। 

खाने का आर्डर देकर हम पार्क में चले गए। दुकानदार ने कहा कि वह खाना वहीं दे देगा।
पार्क में शाम की सैर करने वाले लोग आ चुके थे। बहरहाल हम घास पर बैठकर अपनी गपशप में लग गए। घर, परिवार, पढ़ाई आदि की बातें होने लगीं। किस के घर में कौन है...क्‍या कर रहा है आदि आदि। जब ये बातें खत्‍म हो गईं तो फिर शुरू हुआ, किस्‍सों का सिलसिला। जाहिर है वे दोनों मुझसे एकलव्‍य,चकमक और मेरे आजकल के कामधाम के बारे में जानना चाहती थीं। पिछले कुछ सालों में अपन ने यह महसूस किया है कि अपन एक अच्‍छे किस्‍सागो हैं। हां यह अलग बात है कि अपने किस्‍से में इतनी पगडंडियां आती हैं कि मुख्‍य सड़क से बार-बार नीचे उतरना पड़ता है। पर अपन ने अब इसका भी ध्‍यान रखना सीख लिया है। अपन जल्‍द ही मुख्‍य किस्‍से पर लौट आते हैं। किस्‍सों के बीच हमने अपने भोज के लिए उपयुक्‍त जगह ढूंढने का अभियान भी चलाया और इस चक्‍कर में अपनी दुनिया में मशगूल एक जोड़े को डिस्‍टर्ब भी किया। खाने का मीनू तो हमने तय किया था, पर कहना भूल गए थे कि उसमें मिर्च-मसाला और तेल कम रखना। निशु और ईशा तो सी..सी करने लगीं। बहरहाल जैसे-तैसे खाया। दाल तड़का और मिक्‍स वेज आखिरकार बच ही गई। उसे हमने संभाल लिया और तय किया कि किसी जरूरतमंद को दे देंगे।

इस बीच जेट एयरवेज ने एक और शुभ सूचना भेज दी थी कि आठ बजे की फ्लाइट अब साढ़े नौ बजे जाएगी। शाम गहराने लगी थी। हमने स्‍टेशन का रुख किया। रास्‍ते में हमें बचे हुए खाने का एक सुपात्र नजर आया। जब ईशा ने उसे देने का प्रयास किया तो उसने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि आज तो जगह-जगह भंडारे में इतना खाया है कि अब पेट के भंडार में जगह नहीं है। हम वापसी की यात्रा पैदल ही कर रहे थे। अंतत: सड़क के किनारे की एक बस्‍ती में वह खाना हमने एक बच्‍चे को सौंपा। द्वारका स्‍टेशन पहुंचते-पहुंचते सात बज चुके थे।

ईशा के पिताजी का फोन आ रहा था, उन्‍हें शायद दिल्‍ली से बाहर जाना था। मेरी फ्लाइट जाने में अब भी ढाई घंटे बाकी थे। मैंने दोनों से कहा कि अब वे लौट जाएं, मैं भी एयरपोर्ट की तरफ निकलता हूं। पर वे नहीं मानीं और एयरपोर्ट तक छोड़ने साथ आईं। वे चाहती थीं कि जितना अधिक समय मेरे साथ रह सकें..उतना अच्‍छा। चाहते तो हम भी यही थे। पर सब कुछ चाहने से तो नहीं होता। जैसे ईशा ने चाहा था कि अपन एयरपोर्ट पहुंचकर एक-एक कप कॉफी पियेंगे। पर फिर यह चाहत रह ही गई...शायद अगली मुलाकात के लिए।
***  
अब 28 को बंगलौर वापसी भी दिल्‍ली होकर ही है...तीन घंटे का पड़ाव एयरपोर्ट पर है..वादा तो किया है निशु ने मिलने का।




सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

दो दिन की दिल्‍ली



अपने काम के सिलसिले में पिछले कुछ दिनों में जब भी दिल्‍ली से गुजरता फेसबुक या जीमेल का स्‍टेटस देखकर मित्र लोग कहते, अरे यार कभी दिल्‍ली में भी रुक जाया करो...हमसे भी मिल लिया करो। पर हर बार यात्रा का कार्यक्रम कुछ इस तरह होता था कि रुकने का समय ही नहीं होता। 

इस बार बंगलौर से उदयपुर के लिए निकला तो यह कहकर निकला था कि फरवरी के बाद लौटूंगा। इस बीच भोपाल तथा जबलपुर में बेटे के पास रहकर काम करुंगा। लेकिन जनवरी का आधा महीना तो उदयपुर में ही गुजर गया। भोपाल में एक हफ्ता रहने के बाद जनवरी का आखिरी हफ्ता उधमसिंहनगर के नाम था। वहां एक कार्यशाला थी। लौटकर भोपाल ही आना था। बीच कार्यशाला के अंत में शनिवार, इतवार थे और बीच में दिल्‍ली। सो ऐसा कार्यक्रम बन सकता था कि दिल्‍ली में दो दिन तो गुजारे ही जा सकते थे। 

अब सवाल था एक रात के बसेरे का। दिल्‍ली निवासी मित्र बलराम अग्रवाल जी से इस बात का जिक्र किया, उस समय वे बंगलौर में थे। सुनते ही बोले, अरे यह तो बहुत अच्‍छी बात है आइए, स्‍वागत है आपका दिल्‍ली में। मैं तब तक दिल्‍ली पहुंच जाऊंगा।  
इतना ही नहीं उन्‍होंने अगले ही दिन फेसबुक पर यह स्‍टेटस डाल दिया, दिल्ली के बालसाहित्यकारों के लिए एक सूचना है। कवि एवं संपादक भाई राजेश उत्साही 2 फरवरी 2014 को दिल्ली में होंगे। उनसे मिलने के लिए कनॉट प्लेस में हनुमान मंदिर के सामने स्थित 'कॉफी होम' को तय किया है। दिल्ली के जो मित्र भेंट करना चाहें समय सुझा सकते हैं। यों अभी तक हमने दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक का समय निश्चित किया है। इच्छुक मित्र उनके या मेरे मो॰ नं॰ 8826499115 पर संपर्क कर सकते हैं।
*** 
1 फरवरी को उधमसिंह नगर से लौटते हुए दोपहर साढे़ तीन बजे मैं पुरानी दिल्‍ली रेल्‍वे स्‍टेशन पर उतरा। बलराम जी से फोन पर बात हो चुकी थी। चांदनी चौक से मेट्रो पकड़कर, कश्‍मीरी गेट होते हुए शाहदरा पहुंचा। स्‍टेशन के बाहर बलराम जी अपनी कायनेटिक स्‍कूटर के साथ मौजूद थे।

नवीन शाहदरा की गलियों से होते हुए लगभग पन्‍द्रह मिनट बाद मैं उनके निवास 70 एम नवीन शाहदरा के सामने था। लोहे का किलानुमा फाटक उन्‍होंने चाबी लगाकर खोला। मैंने अंदाजा लगाया कि संभवत: बलराम जी आज अकेले ही हैं, इसलिए ताला लगाकर मुझे लेने स्‍टेशन आए थे। लेकिन अगले ही क्षण मेरा अंदाजा गलत साबित हो गया। दरवाजे के दूसरी ओर मीरा जी स्‍वागत के लिए तैयार थीं। असल में दरवाजे में आटोमैटिक लॉक है, जो दरवाजा बंद करते ही लग जाता है और उसे अंदर या बाहर दोनों तरफ से खोला जा सकता है।

बलराम जी का निवास कहने को वन बीएचके से भी छोटा है, पर उसमें तीन मंजिल होने से पर्याप्‍त जगह है। बैठक में पांच मिनट गुजरते गुजरते मीरा जी ने पूछा, चाय लेंगे या फिर भोजन करेंगे। साढ़े चार बज रहे थे। खाने का समय निकल चुका था। इस समय भोजन का मतलब था, रात का खाना खराब करना। इसलिए मैंने सोचा कि इस समय तो चाय ही बेहतर विकल्‍प है।

चाय पीकर हम निवास की सबसे ऊपरी मंजिल पर पहुंच गए। हालनुमा बड़े कमरे में बिछे गद्दे हमारा इंतजार कर रहे थे। छह बजे हमारी चर्चाएं शुरू हुईं और, बीच में रात के भोजन का आधा घंटा छोड़कर, रात के एक बजे तक जारी रहीं। बीच बीच में बलराम जी मित्रों को फोन करके मेरे आने तथा अगले दिन के मुलाकात के कार्यक्रम की जानकारी देते रहे। इस बीच कुछ मित्रों की सलाह पर उन्‍होंने दिलशाद गार्डन के डीयर पार्क में सुबह मिलने का कार्यक्रम भी बना लिया और कॉफी होम के कार्यक्रम का समय दोपहर दो से चार कर दिया।

2 फरवरी की सुबह हम मीरा जी के हाथ से बने पोहे का नाश्‍ता कर रहे थे और बलराम जी याद कर रहे थे देवास के पोहे। एक बार फिर कायनेटिक पर सवार थे हम दोनों। जीवन में यह पहला मौका था, जब मैंने हेलमेट तो पहना था, पर स्‍कूटर नहीं चला रहा था। हां जी, दिल्‍ली में तो पीछे बैठने वाले को भी हेलमेट पहनना होता है। बाहर सुहानी धूप खिली हुई थी। गंतव्‍य था डीयरपार्क। श्‍यामलाल कॉलेज पार करते करते पूरा इलाका घने कोहरे से ढका नजर आ रहा था। बहरहाल जब निकल ही पड़े थे, तो लौटने का सवाल नहीं था। 

पार्क में पहुंचे तो कोहरे के कारण बहुत कम लोग नजर आ रहे थे। पार्क के बाहर चाय की दुकान के पास बलराम जी ने स्‍कूटर खड़ा किया और एक हेलमेट स्‍कूटर की डिक्‍की के हवाले किया और दूसरा चाय दुकान मालिक के।

डीयर पार्क में तीन 'डियर' : भारतेन्‍दु मिश्र, रमेश आजाद और बलराम अग्रवाल
पार्क में घुसते हुए उन्‍होंने नजर दौड़ाई और बोले दो लोग तो नजर आ रहे हैं। एक हैं भारतेन्‍दु मिश्र और दूसरे रमेश आजाद। भारतेन्‍दु जी से मैं पहली बार मिल रहा था, पर नाम सुना हुआ लगा रहा था। बातों बातों में पता चला कि वे चकमक के पाठक रहे हैं। मुझे तुरंत याद आ गया। अब कुछ ऐसा रहा है कि जब तक मैं चकमक में काम कर रहा था तो जो चकमक के ग्राहक थे उनके नाम पते मेरी नजर से गुजरते रहते थे, भारतेन्‍दु जी का नाम भी उनमें था। रमेश जी से मैं एक पुस्‍तक मेले में मिला था और उन्‍होंने अपनी बाल कविताओं का संग्रह मुझे भेंट किया था। उन्‍होंने याद दिलाया कि वे लखनऊ में आयोजित बालसाहित्‍य कार्यशाला में भी मुझसे मिले थे। रमेश जी पक्षाघात के कारण स्‍पष्‍ट बोल नहीं पाते हैं, पर जो बोलते हैं वह समझ आता है।

डीयर पार्क में रमेश आजाद, राजेश उत्‍साही, डॉ.विश्‍वनाथ त्रिपाठी और भारतेन्‍दु मिश्र
बलराम जी ने बताया लगभग हर रविवार को वे लोग इस पार्क में एकत्रित होते ही हैं। सो नियमित रूप से आने वाले अन्‍य साथियों को उन्‍होंने फोन लगाया। पर कुछ ऐसा संयोग था कि आज के दिन किसी ने बढ़ई को बुलाया था, कोई बिजली का मीटर ठीक करवा रहा था, तो कोई यात्रा पर था, किसी को सरदी ने दबोचा था तो कोई कोहरे की चपेट में था। जब फोन पहुंचा तो डॉ विश्‍वनाथ त्रिपाठी रजाई में दुबके थे, लेकिन उन्‍होंने कहा कि वे आ रहे हैं। लगभग पन्‍द्रह मिनट बाद वे अपनी छड़ी टेकते हुए पार्क में नजर आए। उनके आने के पहले तक हम चार लोग वर्तमान राजनीतिक परिदृश्‍य पर एक दूसरे का सिर माथा खा रहे थे। उनके आते ही माहौल बदल गया। चर्चा एक दिन पहले संपन्‍न हुए एक कविता संग्रह लोकापर्ण कार्यक्रम की ओर मुड़ गई। त्रिपाठी जी उसमें मुख्‍य अतिथि थे और बलराम जी संचालक। कुछ समय चर्चा फिर राजनीति पर आ गई। 84 साल के त्रिपाठी जी का उत्‍साह देखते ही बनता है। लगभग घंटे भर की चर्चा और चाय के साथ यह मुलाकात सम्‍पन्‍न हुई। रमेश जी ने अपने घर चलने का आग्रह किया। उनसे वादा किया कि अगली बार उनके घर भी चलेंगे। भारतेन्‍दु जी, बलरामजी और मैंने त्रिपाठी को जी सायकिल रिक्‍शे पर सवार कराकर विदा किया। उसके बाद भारतेन्‍दु जी ने अपनी चिरपरिचित पान की दुकान से एक बीड़ा मुंह में दबाया। हमसे भी पान,बीड़ी,सिगरेट,गुटखा आदि का आग्रह किया। लेकिन बलराम जी और मैं दोनों ही इनसे दूर रहने वाले प्राणी ठहरे, सो हमने एक-एक इलायची लेकर उनके आग्रह की लाज रखी।

भारतेन्‍दु मिश्र, बलराम अग्रवाल और डा.विश्‍वनाथ त्रिपाठी
भारतेन्‍दु जी ने आग्रह किया कि अगली बार आऊं तो उनके निवास पर ठहरूं। मैंने इसे सधन्‍यवाद स्‍वीकार किया। फोन नम्‍बर का आदान-प्रदान हुआ। इस प्रकार आज की पहली मुलाकात सभा सम्‍पन्‍न हुई। 

बलरामजी और मैं दोपहर के भोजन के लिए घर वापस लौटे। भोजन करके हम निकल पड़े हम कनॉट प्‍लेस के कॉफी होम के लिए। बलराम जी ने शाहदरा मेट्रो स्‍टेशन पर स्‍कूटर पार्क किया और आगे की यात्रा हमने मेट्रो से की। बलराम जी के मेट्रो पास होने के कारण टिकट की लंबी लाइन में लगने से बच गए।
अनुप्रिया वहां पहुंच चुकीं थीं, बलराम जी ने देखा कि उनके मोबाइल पर उनके चार मिसकॉल हैं। ओमप्रकाश कश्‍यप जी भी पहुंच चुके थे। पर वे एक-दूसरे को पहले से नहीं जानते थे। इसलिए दोनों को ही हमारा इंतजार था।

कश्‍यप जी और बलराम जी एक-दूसरे से परिचित थे। मैं दोनों से पहली बार मिल रहा था। आरंभिक परिचय के बाद शुरू हुआ, साहित्‍य की चर्चाओं का दौर। अनु अपनी ताजा बाल कविताएं लाईं थीं, मुझे दिखाने और उन पर राय जानने के लिए। अब ऐसे काम के लिए अपन हमेशा तत्‍पर रहते हैं। संभवत 10 कविताएं रही होंगी। लगभग दस-पन्‍द्रह मिनट लगाकर मैंने उन्‍हें दो-तीन बार पढ़ डाला। और फिर बलराम जी और ओमप्रकाश की अनुमति लेकर उन पर अपनी राय से अनुप्रिया को विस्‍तार से अवगत कराया।

अनु जी कविताओं के विषय नवीन लगे। कहने का ढ़ंग भी नवीन लगा। लेकिन जो दोष नजर आया वह यह कि लगभग हर कविता के अंत तक आते आते वह कविता एक तरह के नारे में तब्‍दील हो जाती है या फिर शिक्षा देने लगती है। चर्चा में अनु जी ने इस बात को माना और इस ओर ध्‍यान देने का आश्‍वासन दिया। इस तरह की कुछ और बातों पर उनसे चर्चा हुई।

बाएं से : राजेश उत्‍साही,अनुप्रिया,बलराम अग्रवाल और ओमप्रकाश कश्‍यप  कॉफी होम  में वटवृक्ष के नीचे
लगभग दो घंटे चली हमारी इस गोष्‍ठी में हम कुल चार लोग थे। इसे गोष्‍ठी कहना भी उचित नहीं होगा। संज्ञा उपाध्‍याय और नरेन्‍द्र मौर्य ने आने का वादा किया था। लेकिन दोनों ही नहीं पहुंचे। संज्ञा ने बाद में संदेश भेजा कि उनकी आने की पूरी तैयारी थी, लेकिन ऐन वक्‍त पर उनके घर ही अतिथि आ गए। और नरेन्‍द्र ऑफिस में उलझ गए। सांभर वड़ा, चाय और केसरी हलवे के साथ इसका मुलाकात का समापन हुआ।

फिर वही मेट्रो से राजीव चौक से कश्‍मीरी गेट और फिर वहां से शाहदरा होते हुए हम घर पहुंचे। घर पहुंचते ही मीरा जी ने पूछा, अब क्‍या इरादा है भोजन करेंगे या..साथ ले जाएंगे..इस बार भी मुझे दूसरा विकल्‍प ज्‍यादा उपयुक्‍त लगा।

हजरत निजामुद्दीन से नौ बजे भोपाल एक्‍सप्रेस में सवार होना था। बलराम जी स्‍कूटर से मुख्‍य सड़क तक छोड़ने आए। आटो किया। आटो वाले ने डेढ़ सौ बताए..जब बलराम जी उससे मोलभाव करने लगे तो उसने कहा, साब मीटर के पैसे ही मांग रहा हूं। मीटर से भी इतने ही बनते हैं। हम भी उसकी बात मानकर बैठ गए.. जाना तो था ही।

अब असलियत यह है कि काले खां सराय स्‍टेशन के दरवाजे पर पहुंचकर भी मीटर की घड़ी 97:00 ही बता रही थी। पर जो तय हुआ था, वह तो देना ही था। उस पर बहस करना एक तरह से अनुचित था।

दो दिन की दिल्‍ली में बलराम जी, मीरा जी का आतिथ्‍य हमेशा याद रहने वाला है। पर जो नहीं भूलने वाला है वह यह कि अधिकांश मित्र केवल फेसबुक पर ही मिलने का वादा करते हैं...और जब सचमुच फेस दर फेस मिलने का मौका आता है तो उन्‍हें अपना वादा याद भी नहीं रहता। 
                                                  0 राजेश उत्‍साही