यहां बंगलौर में आज पृथ्वी दिवस पर मुझे भोपाल और अपना घर बहुत याद आ रहा है। इस कदर कि लगता है सब कुछ छोड़कर वापस चला जाऊं। शायद इसलिए भी कि पेड़ की तरह मनुष्य की अपनी पृथ्वी वही होती है जहां वह विकसित होता है। शरद बिल्लौरे की इस कविता में शायद मेरे मनोभाव भी हैं।
