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गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

अपना घर और भोपाल


यहां बंगलौर में आज पृथ्‍वी दिवस पर मुझे भोपाल और अपना घर बहुत याद आ रहा है। इस कदर कि लगता है सब कुछ छोड़कर वापस चला जाऊं। शायद इसलिए भी कि पेड़ की तरह मनुष्‍य की अपनी पृथ्‍वी वही होती है जहां वह विकसित होता है। शरद बिल्‍लौरे की इस कविता में शायद मेरे मनोभाव भी हैं।