| दूल्हे मिंयां जितेन्द्र ठाकुर |
इस बरस शादी की सालगिरह (23 जून,2011) पर भोपाल में था। कुछ संयोग ऐसा हुआ कि मेरे पुराने संस्थान एकलव्य के एक युवा साथी जितेन्द्र ठाकुर का विवाह भी इसी दिन था। जितेन्द्र चित्रकार हैं। उनके साथ मिलकर मैंने बच्चों की कई चित्रकथाओं की पुस्तकें तैयार की हैं। मेरी एक बालकहानी की किताब और एक बालकविता पोस्टर के चित्र भी उन्होंने ही बनाए हैं। सो उनसे एक और स्तर पर आत्मीय रिश्ता है। बहुत मना करने के बाद भी वे मुझे ‘सर’ कहकर संबोध्रित करते हैं। जब भी मुलाकात होती है तो वे अपने नए काम के बारे में बताते हैं और उस पर मेरी राय जानने के लिए आतुर रहते हैं।
आमतौर पर आजकल जो शादियां होती हैं उनमें शादी हो जाने के बाद प्रीतिभोज के लिए निमंत्रित किया जाता है। जिसमें दूल्हा-दुल्हन दोनों मौजूद होते हैं। पर जितेन्द्र की तरफ से प्रीति भोज का निमंत्रण दोपहर का था। उनकी बारात तो शाम को भोपाल के पास सीहोर के दोराहा में जाने वाली थी। हमने फैसला किया कि अपने विवाह की छब्बीसवीं सालगिरह उनके विवाह में शामिल होकर मनाई जाए।
| एकलव्य परिवार (बाएं से दाएं) सुशील जोशी,शाहिद,राजेश उत्साही,अम्बरीष सोनी,कमलेश यादव,कमलसिंह,अफसाना पठान और उनका बेटा,निर्मला वर्मा,पारुल सोनी,इंदु नायर और प्रीति शर्मा |
| प्रीति शर्मा और नीमा : मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है....... |
दूसरी बात यह कि इस मौके पर हमारी श्रीमती निर्मला यानी नीमा जी ढोलक लेकर गीत गाने बैठ गईं। छब्बीस सालों में पहली बार उनका यह हुनर देखने में आया था। हालांकि यह ढोलक वादन तीन-चार मिनट से अधिक नहीं चला, क्योंकि ढोलक की थाप पर नाचने के लिए कोई आगे नहीं आया। तीसरी सुखद बात यह थी कि भोजन व्यवस्था ठेठ भारतीय थी। हां पत्तल जरूर कागज की थीं। खाने में भी व्यंजनों की भीड़ की बजाय पूड़ी ,सब्जी, रायता, सेव तथा बूंदी परोसी गई थी। कम से कम अपन को तो इसमें आनंद आया। वरना समझ ही नहीं आता कि क्या खाएं और क्या नहीं। सबका स्वाद लेने के चक्कर में किसी का भी स्वाद नहीं ले पाते हैं। इस बहाने सुशील जोशी और हमने इस बात पर चर्चा कर डाली कि इस व्यवस्था का क्या फायदा है।
| पंगत में बैठकर भोजन करने का आनंद कुछ अलग ही है... |
वास्तव में भोजन करवाने का यह तरीका जहां परिवार और परिचितों को भोजन के लिए आए लोगों के प्रति आदर और स्नेह जताने का मौका देता है,वहीं परिवार के युवा लोगों को बहुत सारी बातें सीखने का मौका भी। बारी-बारी से परिवार के अलग अलग लोग आकर कुछ न कुछ परोसते हुए आपसे और खाने की प्रेम भरी मनुहार करते हैं। और आप उतने ही प्रेम से उन्हें मना करते हैं। भला यह आजकल के बफे सिस्टम में कहां संभव है। मेरा मानना है कि इस तरीके में खाने की बरबादी भी तुलनात्मक रूप से बहुत कम होती है।
और चौथी यह कि जब जितेन्द्र को शुभकामनाएं देकर सब निकलने लगे तो पता चला कि साथी मनोज निगम की नई की नई चप्पलें कोई साहबान पहनकर चले गए हैं। इतना ही नहीं अगले दिन पता चला कि शाहिद मियां अपना रेनकोट भी धर्मशाला के दरवाजे को पहना आए हैं। अब क्या कहें, शादी-ब्याह में तो यह सब होता ही है। कहीं दूल्हे के जूते चोरी होते हैं तो कहीं मेहमानों के। मजा इसी में है।
0 राजेश उत्साही