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सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

दो दिन की दिल्‍ली



अपने काम के सिलसिले में पिछले कुछ दिनों में जब भी दिल्‍ली से गुजरता फेसबुक या जीमेल का स्‍टेटस देखकर मित्र लोग कहते, अरे यार कभी दिल्‍ली में भी रुक जाया करो...हमसे भी मिल लिया करो। पर हर बार यात्रा का कार्यक्रम कुछ इस तरह होता था कि रुकने का समय ही नहीं होता। 

इस बार बंगलौर से उदयपुर के लिए निकला तो यह कहकर निकला था कि फरवरी के बाद लौटूंगा। इस बीच भोपाल तथा जबलपुर में बेटे के पास रहकर काम करुंगा। लेकिन जनवरी का आधा महीना तो उदयपुर में ही गुजर गया। भोपाल में एक हफ्ता रहने के बाद जनवरी का आखिरी हफ्ता उधमसिंहनगर के नाम था। वहां एक कार्यशाला थी। लौटकर भोपाल ही आना था। बीच कार्यशाला के अंत में शनिवार, इतवार थे और बीच में दिल्‍ली। सो ऐसा कार्यक्रम बन सकता था कि दिल्‍ली में दो दिन तो गुजारे ही जा सकते थे। 

अब सवाल था एक रात के बसेरे का। दिल्‍ली निवासी मित्र बलराम अग्रवाल जी से इस बात का जिक्र किया, उस समय वे बंगलौर में थे। सुनते ही बोले, अरे यह तो बहुत अच्‍छी बात है आइए, स्‍वागत है आपका दिल्‍ली में। मैं तब तक दिल्‍ली पहुंच जाऊंगा।  
इतना ही नहीं उन्‍होंने अगले ही दिन फेसबुक पर यह स्‍टेटस डाल दिया, दिल्ली के बालसाहित्यकारों के लिए एक सूचना है। कवि एवं संपादक भाई राजेश उत्साही 2 फरवरी 2014 को दिल्ली में होंगे। उनसे मिलने के लिए कनॉट प्लेस में हनुमान मंदिर के सामने स्थित 'कॉफी होम' को तय किया है। दिल्ली के जो मित्र भेंट करना चाहें समय सुझा सकते हैं। यों अभी तक हमने दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक का समय निश्चित किया है। इच्छुक मित्र उनके या मेरे मो॰ नं॰ 8826499115 पर संपर्क कर सकते हैं।
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1 फरवरी को उधमसिंह नगर से लौटते हुए दोपहर साढे़ तीन बजे मैं पुरानी दिल्‍ली रेल्‍वे स्‍टेशन पर उतरा। बलराम जी से फोन पर बात हो चुकी थी। चांदनी चौक से मेट्रो पकड़कर, कश्‍मीरी गेट होते हुए शाहदरा पहुंचा। स्‍टेशन के बाहर बलराम जी अपनी कायनेटिक स्‍कूटर के साथ मौजूद थे।

नवीन शाहदरा की गलियों से होते हुए लगभग पन्‍द्रह मिनट बाद मैं उनके निवास 70 एम नवीन शाहदरा के सामने था। लोहे का किलानुमा फाटक उन्‍होंने चाबी लगाकर खोला। मैंने अंदाजा लगाया कि संभवत: बलराम जी आज अकेले ही हैं, इसलिए ताला लगाकर मुझे लेने स्‍टेशन आए थे। लेकिन अगले ही क्षण मेरा अंदाजा गलत साबित हो गया। दरवाजे के दूसरी ओर मीरा जी स्‍वागत के लिए तैयार थीं। असल में दरवाजे में आटोमैटिक लॉक है, जो दरवाजा बंद करते ही लग जाता है और उसे अंदर या बाहर दोनों तरफ से खोला जा सकता है।

बलराम जी का निवास कहने को वन बीएचके से भी छोटा है, पर उसमें तीन मंजिल होने से पर्याप्‍त जगह है। बैठक में पांच मिनट गुजरते गुजरते मीरा जी ने पूछा, चाय लेंगे या फिर भोजन करेंगे। साढ़े चार बज रहे थे। खाने का समय निकल चुका था। इस समय भोजन का मतलब था, रात का खाना खराब करना। इसलिए मैंने सोचा कि इस समय तो चाय ही बेहतर विकल्‍प है।

चाय पीकर हम निवास की सबसे ऊपरी मंजिल पर पहुंच गए। हालनुमा बड़े कमरे में बिछे गद्दे हमारा इंतजार कर रहे थे। छह बजे हमारी चर्चाएं शुरू हुईं और, बीच में रात के भोजन का आधा घंटा छोड़कर, रात के एक बजे तक जारी रहीं। बीच बीच में बलराम जी मित्रों को फोन करके मेरे आने तथा अगले दिन के मुलाकात के कार्यक्रम की जानकारी देते रहे। इस बीच कुछ मित्रों की सलाह पर उन्‍होंने दिलशाद गार्डन के डीयर पार्क में सुबह मिलने का कार्यक्रम भी बना लिया और कॉफी होम के कार्यक्रम का समय दोपहर दो से चार कर दिया।

2 फरवरी की सुबह हम मीरा जी के हाथ से बने पोहे का नाश्‍ता कर रहे थे और बलराम जी याद कर रहे थे देवास के पोहे। एक बार फिर कायनेटिक पर सवार थे हम दोनों। जीवन में यह पहला मौका था, जब मैंने हेलमेट तो पहना था, पर स्‍कूटर नहीं चला रहा था। हां जी, दिल्‍ली में तो पीछे बैठने वाले को भी हेलमेट पहनना होता है। बाहर सुहानी धूप खिली हुई थी। गंतव्‍य था डीयरपार्क। श्‍यामलाल कॉलेज पार करते करते पूरा इलाका घने कोहरे से ढका नजर आ रहा था। बहरहाल जब निकल ही पड़े थे, तो लौटने का सवाल नहीं था। 

पार्क में पहुंचे तो कोहरे के कारण बहुत कम लोग नजर आ रहे थे। पार्क के बाहर चाय की दुकान के पास बलराम जी ने स्‍कूटर खड़ा किया और एक हेलमेट स्‍कूटर की डिक्‍की के हवाले किया और दूसरा चाय दुकान मालिक के।

डीयर पार्क में तीन 'डियर' : भारतेन्‍दु मिश्र, रमेश आजाद और बलराम अग्रवाल
पार्क में घुसते हुए उन्‍होंने नजर दौड़ाई और बोले दो लोग तो नजर आ रहे हैं। एक हैं भारतेन्‍दु मिश्र और दूसरे रमेश आजाद। भारतेन्‍दु जी से मैं पहली बार मिल रहा था, पर नाम सुना हुआ लगा रहा था। बातों बातों में पता चला कि वे चकमक के पाठक रहे हैं। मुझे तुरंत याद आ गया। अब कुछ ऐसा रहा है कि जब तक मैं चकमक में काम कर रहा था तो जो चकमक के ग्राहक थे उनके नाम पते मेरी नजर से गुजरते रहते थे, भारतेन्‍दु जी का नाम भी उनमें था। रमेश जी से मैं एक पुस्‍तक मेले में मिला था और उन्‍होंने अपनी बाल कविताओं का संग्रह मुझे भेंट किया था। उन्‍होंने याद दिलाया कि वे लखनऊ में आयोजित बालसाहित्‍य कार्यशाला में भी मुझसे मिले थे। रमेश जी पक्षाघात के कारण स्‍पष्‍ट बोल नहीं पाते हैं, पर जो बोलते हैं वह समझ आता है।

डीयर पार्क में रमेश आजाद, राजेश उत्‍साही, डॉ.विश्‍वनाथ त्रिपाठी और भारतेन्‍दु मिश्र
बलराम जी ने बताया लगभग हर रविवार को वे लोग इस पार्क में एकत्रित होते ही हैं। सो नियमित रूप से आने वाले अन्‍य साथियों को उन्‍होंने फोन लगाया। पर कुछ ऐसा संयोग था कि आज के दिन किसी ने बढ़ई को बुलाया था, कोई बिजली का मीटर ठीक करवा रहा था, तो कोई यात्रा पर था, किसी को सरदी ने दबोचा था तो कोई कोहरे की चपेट में था। जब फोन पहुंचा तो डॉ विश्‍वनाथ त्रिपाठी रजाई में दुबके थे, लेकिन उन्‍होंने कहा कि वे आ रहे हैं। लगभग पन्‍द्रह मिनट बाद वे अपनी छड़ी टेकते हुए पार्क में नजर आए। उनके आने के पहले तक हम चार लोग वर्तमान राजनीतिक परिदृश्‍य पर एक दूसरे का सिर माथा खा रहे थे। उनके आते ही माहौल बदल गया। चर्चा एक दिन पहले संपन्‍न हुए एक कविता संग्रह लोकापर्ण कार्यक्रम की ओर मुड़ गई। त्रिपाठी जी उसमें मुख्‍य अतिथि थे और बलराम जी संचालक। कुछ समय चर्चा फिर राजनीति पर आ गई। 84 साल के त्रिपाठी जी का उत्‍साह देखते ही बनता है। लगभग घंटे भर की चर्चा और चाय के साथ यह मुलाकात सम्‍पन्‍न हुई। रमेश जी ने अपने घर चलने का आग्रह किया। उनसे वादा किया कि अगली बार उनके घर भी चलेंगे। भारतेन्‍दु जी, बलरामजी और मैंने त्रिपाठी को जी सायकिल रिक्‍शे पर सवार कराकर विदा किया। उसके बाद भारतेन्‍दु जी ने अपनी चिरपरिचित पान की दुकान से एक बीड़ा मुंह में दबाया। हमसे भी पान,बीड़ी,सिगरेट,गुटखा आदि का आग्रह किया। लेकिन बलराम जी और मैं दोनों ही इनसे दूर रहने वाले प्राणी ठहरे, सो हमने एक-एक इलायची लेकर उनके आग्रह की लाज रखी।

भारतेन्‍दु मिश्र, बलराम अग्रवाल और डा.विश्‍वनाथ त्रिपाठी
भारतेन्‍दु जी ने आग्रह किया कि अगली बार आऊं तो उनके निवास पर ठहरूं। मैंने इसे सधन्‍यवाद स्‍वीकार किया। फोन नम्‍बर का आदान-प्रदान हुआ। इस प्रकार आज की पहली मुलाकात सभा सम्‍पन्‍न हुई। 

बलरामजी और मैं दोपहर के भोजन के लिए घर वापस लौटे। भोजन करके हम निकल पड़े हम कनॉट प्‍लेस के कॉफी होम के लिए। बलराम जी ने शाहदरा मेट्रो स्‍टेशन पर स्‍कूटर पार्क किया और आगे की यात्रा हमने मेट्रो से की। बलराम जी के मेट्रो पास होने के कारण टिकट की लंबी लाइन में लगने से बच गए।
अनुप्रिया वहां पहुंच चुकीं थीं, बलराम जी ने देखा कि उनके मोबाइल पर उनके चार मिसकॉल हैं। ओमप्रकाश कश्‍यप जी भी पहुंच चुके थे। पर वे एक-दूसरे को पहले से नहीं जानते थे। इसलिए दोनों को ही हमारा इंतजार था।

कश्‍यप जी और बलराम जी एक-दूसरे से परिचित थे। मैं दोनों से पहली बार मिल रहा था। आरंभिक परिचय के बाद शुरू हुआ, साहित्‍य की चर्चाओं का दौर। अनु अपनी ताजा बाल कविताएं लाईं थीं, मुझे दिखाने और उन पर राय जानने के लिए। अब ऐसे काम के लिए अपन हमेशा तत्‍पर रहते हैं। संभवत 10 कविताएं रही होंगी। लगभग दस-पन्‍द्रह मिनट लगाकर मैंने उन्‍हें दो-तीन बार पढ़ डाला। और फिर बलराम जी और ओमप्रकाश की अनुमति लेकर उन पर अपनी राय से अनुप्रिया को विस्‍तार से अवगत कराया।

अनु जी कविताओं के विषय नवीन लगे। कहने का ढ़ंग भी नवीन लगा। लेकिन जो दोष नजर आया वह यह कि लगभग हर कविता के अंत तक आते आते वह कविता एक तरह के नारे में तब्‍दील हो जाती है या फिर शिक्षा देने लगती है। चर्चा में अनु जी ने इस बात को माना और इस ओर ध्‍यान देने का आश्‍वासन दिया। इस तरह की कुछ और बातों पर उनसे चर्चा हुई।

बाएं से : राजेश उत्‍साही,अनुप्रिया,बलराम अग्रवाल और ओमप्रकाश कश्‍यप  कॉफी होम  में वटवृक्ष के नीचे
लगभग दो घंटे चली हमारी इस गोष्‍ठी में हम कुल चार लोग थे। इसे गोष्‍ठी कहना भी उचित नहीं होगा। संज्ञा उपाध्‍याय और नरेन्‍द्र मौर्य ने आने का वादा किया था। लेकिन दोनों ही नहीं पहुंचे। संज्ञा ने बाद में संदेश भेजा कि उनकी आने की पूरी तैयारी थी, लेकिन ऐन वक्‍त पर उनके घर ही अतिथि आ गए। और नरेन्‍द्र ऑफिस में उलझ गए। सांभर वड़ा, चाय और केसरी हलवे के साथ इसका मुलाकात का समापन हुआ।

फिर वही मेट्रो से राजीव चौक से कश्‍मीरी गेट और फिर वहां से शाहदरा होते हुए हम घर पहुंचे। घर पहुंचते ही मीरा जी ने पूछा, अब क्‍या इरादा है भोजन करेंगे या..साथ ले जाएंगे..इस बार भी मुझे दूसरा विकल्‍प ज्‍यादा उपयुक्‍त लगा।

हजरत निजामुद्दीन से नौ बजे भोपाल एक्‍सप्रेस में सवार होना था। बलराम जी स्‍कूटर से मुख्‍य सड़क तक छोड़ने आए। आटो किया। आटो वाले ने डेढ़ सौ बताए..जब बलराम जी उससे मोलभाव करने लगे तो उसने कहा, साब मीटर के पैसे ही मांग रहा हूं। मीटर से भी इतने ही बनते हैं। हम भी उसकी बात मानकर बैठ गए.. जाना तो था ही।

अब असलियत यह है कि काले खां सराय स्‍टेशन के दरवाजे पर पहुंचकर भी मीटर की घड़ी 97:00 ही बता रही थी। पर जो तय हुआ था, वह तो देना ही था। उस पर बहस करना एक तरह से अनुचित था।

दो दिन की दिल्‍ली में बलराम जी, मीरा जी का आतिथ्‍य हमेशा याद रहने वाला है। पर जो नहीं भूलने वाला है वह यह कि अधिकांश मित्र केवल फेसबुक पर ही मिलने का वादा करते हैं...और जब सचमुच फेस दर फेस मिलने का मौका आता है तो उन्‍हें अपना वादा याद भी नहीं रहता। 
                                                  0 राजेश उत्‍साही

बुधवार, 10 नवंबर 2010

दो नहीं तीन ब्‍लागरों का मिलन

मोबाइल फोन तो अपन पिछले तीन साल से उपयोग कर रहे हैं। पर उसकी एसएमएस सेवा से बहुत ज्‍यादा लगाव नहीं रहा है। सो बस मतलब के लिए देख लेते हैं। अक्‍टूबर में तारीख तो याद नहीं, पर किसी एक दिन सुबह-सुबह एक नंबर और नाम एसएमएस के जरिए आया। नाम भी परिचित नहीं था और खैर नंबर पहचाने का तो सवाल ही नहीं। सोचा होगा कोई।

दफ्तर सुबह साढ़े आठ बजे शुरू होता है। फोन कंपनी हर दिन साढ़े आठ बजे ही एक संदेश भेजती है कि आपका बिल कितना हो गया है। और उसके बाद ऐसे ही एक-दो और संदेश। सो कई बार इन्‍हें खोलकर देखता भी नहीं हूं। पर कई बार इस चक्‍कर में काम के संदेश भी छूट जाते हैं। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। पहले संदेश पूरा नहीं आया था और दुबारा आया तो मैंने देखा नहीं। जब देखने में आया तो पता चला कि दिल्‍ली से एक मित्र के मित्र बंगलौर में आए हैं और बात करना चाहते हैं। नंबर था तो तुरंत उन्‍हें फोन लगाया। मित्र रामेश्‍वर काम्‍बोज ‘हिमांशु’ हैं और उनके मित्र बलराम अग्रवाल। हिमांशु जी से भी दोस्‍ती ब्‍लाग की दुनिया में ही हुई है। बात निकली तो फिर निकलती चली गई। केवल बलराम के नाम से मशहूर एक और लेखक हैं। वे सारिका में हुआ करते थे। लघुकथा आंदोलन के दौर में उन्‍हें पढ़ते रहे हैं। सो पूछ लिया कि कहीं आप वही तो नहीं। बहुत आराम से उन्‍होंने कहा जी नहीं मैं वो नहीं हूं, पर हूं मैं भी बलराम ही। और वे बलराम भी मेरे मित्र ही हैं। खैर जैसा मैंने कहा कि बात निकलती है तो फिर निकलती चली जाती है। बलराम अग्रवाल जी जाने-माने कहानीकार और लघुकथाकार हैं। 

बलराम जी बेटे आदित्‍य के साथ
बलराम अग्रवाल जी के बड़े बेटे आकाश बंगलौर में नौकरी करते हैं। मोटरसाइकिल की एक दुघर्टना में उनकी कालरबोन में फैक्चर हो गया। बस उनकी देखभाल के लिए वे बंगलौर चले आए। काम्‍बोज जी से उन्‍होंने पूछा कि कोई हिन्‍दी पढ़ने लिखने वाले परिचित हों तो बताएं। तो उन्‍होंने मेरा नंबर दे दिया। बलराम जी रंगमंच से भी जुडे़ हैं। इन दिनों वे एक ईपत्रिका के लिए रंगकर्मियों के साक्षात्‍कार कर रहे हैं, उनके बारे में लिख रहे हैं। मुझसे भी वे इस बारे में जानकारी चाहते थे। मैंने कुछ सम्‍पर्क उन्‍हें दिए। पर बात यहां खत्‍म नहीं हुई,शुरू हुई। फोन पर तो हम बतिया लिए। वे हमारे ब्‍लाग और हम उनके ब्‍लाग  'जनगाथा', 'कथायात्रा' एवं 'लघुकथा-वार्ता' 'अपना दौर'  पर घूम आए। 

वे बंगलौर में पुराने एयरपोर्ट के पास कग्‍गादासपुरा(निकट सीवी रमन नगर) में थे। और हम सरजापुर रोड पर बिलकुल बाहर विप्रो गेट के सामने से मोरी गेट से होते हुए राममंदिर के पास हल्‍लनायकनहल्‍ली गांव में। हमने कहा कि हम आते हैं आपके घर। बोले आइए। पर मैं भी बंगलौर घूमना चाहता हूं तो पहले मैं निकलता हूं घर से। हमने कहा ठीक। उन्‍हें पता समझा दिया। हमने सोचा आज तो बात हुई है। आज तो वे आने से रहे। फिर कभी आएंगे।  

छुट्टी का दिन था तो हम भी आराम से बैठे थे। हफ्ते भरके कपड़े एक दिन धोने ही होते हैं। शनिवार को धोओ या फिर रविवार को। शनिवार को धो लो तो आराम रहता है। सोचा कि कपड़े भी धो ही डाले जाएं। कपड़े भिगो दिए। छ़ुट्टी के दिन खाना भी घर में बनाना होता है। सो गैस पर दाल चढ़ा दी। बस तभी बलराम जी का फोन आ गया कि वे अपने छोटे बेटे आदित्‍य के साथ मोटर साइकिल से आ रहे हैं। हमने सोचा अब क्‍या करें। दोपहर हो रही थी तो काम को बाद के लिए टालना भी संभव नहीं था। हमने अपनी एनसीसी की ट्रेनिंग को याद किया और जल्‍दी जल्‍दी सारा काम निपटाया। और जैसे काम से निपटे कि बलराम जी हाजिर थे।

अब आप समझ ही सकते है कि जब दो लिखने-पढ़ने वाले मिलते हैं तो क्‍या बात करते हैं। तो यहां तो एक और विशेषता थी कि दोनों ब्‍लागर भी थे। तो लगभग डेढ़-दो घंटे चर्चा हुई और उसके साथ चाय भी। हम दोनों ही मध्‍यमवर्गीय परिवार से आते हैं। जब अपनी कहानी कही और सुनी तो लगा कितनी बातें हैं,जिनमें एक तरह का साम्‍य नजर आता है। यह साम्‍य ही जो वैचारिक रूप से दो व्‍यक्तियों को पास पास लाता है। हम दोनों को ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं। लगा जैसे हमेशा एक-दूसरे को जानते थे। बस पहचानते नहीं थे।

इसीलिए उन्‍होंने वापस जाकर गुल्‍लक पर मेरी एक पोस्‍ट दास्‍तान दाढ़ी की पढ़ते हुए यह टिप्‍पणी की, ‘उत्साही जी, मैंने तो आपको सबसे पहले फोटो में ही देखा था, वही दाढ़ीवाले फोटो में। इसलिए जब आप राम मन्दिर के पास क्लीन-शेव्ड खड़े दिखे तो आपने नोट किया होगा कि पहले हाथ हिलाने का मौका मैंने आपको ही दिया था। हुआ यूँ कि मेन रोड से जब आपके 'मोरी गेट' की ओर मुड़ रहे थे तो एक क्लीन-शेव्ड सज्जन किसी को बिल्कुल वैसे ही हाथ लहराकर अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे। बेटे ने कहा--यही तो नहीं हैं? यही होते तो दो-ढाई किलोमीटर अन्दर आने का निर्देश क्यों देते? मैंने कहा। उस गली में घुस जाने और पीछे मुड़कर देखने पर पता चला कि वह सज्जन किसी महिला को रिसीव करने उस मोड़ पर खड़े थे। आप हाथ न हिलाकर अनजान बने रहने का दाँव खेलते तो मैं काफी हद तक चकमे में आ जाता। मैं तो वास्तव में दाढ़ीवाले उत्साही से ही मिलने गया था।‘ दरअसल फेसबुक पर मेरी प्रोफाइल में दाढ़ी वाली फोटो ही है। बलराम जी ने वही देख रखी थी। 

पुनश्‍च: लो जी यह नई जानकारी मिली कि आदित्‍य भी ब्‍लागिंग करते हैं। पर मजे की बात यह है कि वे जब बलराम जी को मोटरसाइकिल पर लेकर आए थे तो पूरे समय हम लोगों के साथ ही रहे। पर उन्‍होंने न तो हमारी बातचीत में भागीदारी की और न ही इस बात का परिचय दिया कि वे भी एक ब्‍लागर हैं। निश्चित ही यह उनका संकोच रहा होगा कि जब दो लेखक बतिया रहे हैं तो उनके बीच उनका क्‍या काम। वे एक अच्‍छे बच्‍चे की तरह चुपचाप बैठे रहे। हां बीच में मैंने चकमक पत्रिका के बाउंड वाल्‍यूम दिए तो वे उसे पलटते-पढ़ते रहे। बलराम जी को भी दाद देनी पड़ेगी(और साधुवाद भी) कि जब आज के जमाने में लोग अपने परिवार के सदस्‍यों के बारे में मौका मिलते ही बढ़-चढ़कर बोलने लगते हैं वहां बलराम जी ने इस बात की भनक तक नहीं लगने दी। आदित्‍य ने एनीमेशन की पढ़ाई की है। सो उनके ब्‍लाग का नाम भी एनीमेटर है। पहले मैंने इस पोस्‍ट को शीर्षक दिया था दो ब्‍लागरों का मिलन। लेकिन जब पता चला कि आदित्‍य भी ब्‍लागर हैं तो शीर्षक बदल दिया। बदलना ही चाहिए न क्‍योंकि उस दिन वास्‍तव में हम तीन ब्‍लागर मिले थे।  
  (बलराम जी दोनों फोटो में मौजूद हैं। जाहिर है कि एक फोटो आदित्‍य ने लिया है और एक मैंने।)     
                                        0 राजेश उत्‍साही