मैं उस जमाने का हूं जब रेलगाड़ी भी ज्यादातर लोगों के लिए एक अजूबा थी। बेशक हमारे ही देश के कई इलाकों में अब भी लोग केवल इसके बारे में सुनते भर हैं। मेरी पत्नी निर्मला ने अपनी शादी तक रेलगाड़ी नहीं देखी थी। वह कालेज में हिन्दी की अध्यापिका थी।
मुझे याद है मैं पहली में था। मध्यप्रदेश में होशंगाबाद और इटारसी के बीच एक रेल्वे स्टेशन है पवारखेड़ा। वहां स्टेशन के पास ही रहता था। रोज सुबह लगभग नौ बजे जनता एक्सप्रेस दिल्ली की ओर से आती थी। यह उसका रोज का क्रम था। उसमें चपटे मुंह का कोयले वाला इंजन लगता था। जिसे हम चपटा इंजन ही कहते थे। लेकिन एक दिन वह हम सबके लिए खासकर बच्चों के लिए विशेष हो गई। उसमें गोल और नुकीले मुंह का इंजन लगकर आया। जैसे इंजन में किसी ने नाक लगा दी हो। इस इंजन को खूब सजा-धजाकर गाड़ी में लगाया जाता था। हम बच्चों ने चपटे इंजन का नाम अब नकटा इंजन रख दिया था। और इस नए इंजन को नाम दिया था-नाक वाला इंजन। हमें हर सुबह जिस चीज का इंतजार सबसे ज्यादा रहता वह यह इंजन ही था।
अब आप सोच सकते हैं कि जब इंजन को लेकर हम इतने दीवाने थे, तो चीलगाड़ी यानी हवाई जहाज को देखकर हमारी क्या हालत होती होगी। जब भी हवाई जहाज की आवाज सुनाई पड़ती तो सब कुछ छोड़कर उसे खोजने निकल पड़ते। एक बार नजर भर आ जाता तो फिर जब तक वह दूर बादलों में खो नहीं जाता तब तक उसका पीछा करते रहते। कभी भूले से कोई हवाई जहाज बहुत नीचे उड़ान भरता हुआ चला जाता,तब तो बस आंखें बाहर ही नहीं आतीं बाकी सब कोशिश कर लेते। धीरे-धीरे नाक वाला इंजन, फिर डीजल इंजन और फिर हवाई जहाज रोजमर्रा की बात हो गई। वो रोमांच नहीं रहा।
उम्र ज्यों ज्यों बढ़ती है, रोमांच के विषय या दायरे बदलते जाते हैं। हवाई जहाज के बारे में रोमांच का दायरा इतना ही बड़ा कि एक दिन भोपाल के हवाई अड्डे पर जाकर हवाई जहाज को उतरते और रनवे से उड़ते हुए देख लिया। अगला दायरा था हवाई जहाज में बैठकर कैसा लगता होगा। हम कभी हवाई जहाज में बैठेंगे यह तो सोच ही नहीं सकते थे।