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शनिवार, 30 मार्च 2013

यह मुंह और मसूरी की सैर


19 जनवरी, 2013 की सुबह पांच बजे काठगोदाम एक्‍सप्रेस जब देहरादून स्‍टेशन पहुंची तो सारा शहर गहरे कोहरे में ढका हुआ था। ठंड पसरी हुई थी। हमें लेने गाड़ी आई थी, जाहिर है कि वह भी ठिठुर ही रही होगी। उसका ड्रायवर शायद मन ही मन हमें कोस रहा होगा, कि इन्‍हें भी आज ही आना था। मौसम ये तेवर पिछले दो दिनों में ही बदले थे। हम भी क्‍या कर सकते थे, हम तो अपनी डयूटी पर थे।
स्‍टेशन से होटल बहुत अधिक नहीं केवल चार किलोमीटर दूर था। कोहरे की वजह से दस मीटर से ज्‍यादा दूर का रास्‍ता नजर ही नहीं आ रहा था। कार ऐसे चल रही थी जैसे कोई साइकिल रिक्‍शा हो।
रूदपुर से ट्रेन रात लगभग साढ़े नौ बजे चली थी। मेरी बर्थ थर्ड एसी कोच के बीच में ऊपर की थी, सो मैं तो आराम से सोकर आया। पर मेरी सहकर्मी प्रिया को जो बर्थ मिली थी वह साइड की और दरवाजे के पास थी। मुझे मालूम था कि वहां रात भर आने-जाने वालों का तांता लगा रहेगा। भोपाल से दिल्‍ली आते हुए राजधानी एक्‍सप्रेस में मैं ऐसी एक रात भुगत चुका हूं। पहले मैंने सोचा था कि उनसे कहूं कि हम बर्थ बदल लेते हैं। फिर मैंने देखा कि मेरे सामने वाली बर्थ पर एक साहब थे जो अपने लैपटॉप पर कोई फिल्‍म देखने में मशगूल थे। उनका सोने का कोई इरादा दिख नहीं रहा था। इसलिए मैंने इरादा बदल दिया था। जाहिर है सो वे ठीक से नहीं सो सकीं थीं। होटल सिटी स्‍टार पहुंचते ही उन्‍होंने ऐलान किया कि वे देर तक सोएंगी। हम अपने- अपने कमरों में समा गए। मेरी नींद हो चुकी थी। होटल की खिड़की के बाहर भी कोहरा पसरा हुआ था। मैंने अपने कैमरे में उसे कैद
करने का असफल प्रयत्‍न किया। फिर खुद की एक तस्‍वीर खींची। लैपटॉप खोला और फेसबुक के सहारे यह खबर फैला दी कि देहरादून में क्‍या हाल है।

आठ बजते-बजते सूरज महाशय निकल आए थे। होटल की छत से जहां तक नजर जाती थी, सड़कों पर पानी भरा नजर आ रहा था। जो इस बात का सूचक था कि कल रात यहां बारिश भी हुई है। मसूरी भी नजर आ रही थी। उसकी चोटियों पर रूई की तरह जमी बर्फ धूप में चमक रही थी। हमारा मन किया हाथ बढ़ाकर उन चोटियों को छू लें। नींद तो हो गई थी, पर हफ्ते भर की थकान शरीर पर हावी थी। पिछले चार सालों से पांच दिन के हफ्ते में काम करने के बाद अब मन के साथ साथ शरीर भी शनिवार को आराम की मांग करता है। रोज की दिनचर्या भी ऐसी है कि पांच दिन पूरे होते-होते मन और तन दोनों टूटने लगते हैं। रोज सुबह साढ़े आठ से शाम के छह बजे तक का दफ्तर। आने-जाने का समय अलग। तय किया कि आज दिन भर आराम किया जाए। अगले दिन इतवार को मसूरी की पहाडि़यों पर जमी बर्फ से मुलाकात की जाए।

ये वादियां बुला रही हैं..हमें...
इतवार की सुबह हम मसूरी जाने के लिए निकले। होटल वाले को इस बात की सूचना दी तो उसने पूछा गाड़ी बुलवा दूं। हमने कहा नहीं, हम बस से ही जाएंगे। बस स्‍टैंड पहुंचे तो बस के लिए लगी लम्‍बी लाइन देखकर लगा कि आधा दिन तो यहीं टिकट लेने में बीत जाएगा। केवल मसूरी जाना नहीं था, वहां घूमना भी था और लौटना भी। मसूरी के लिए साझा टैक्‍सी भी थी। एक टैक्‍सी वाले से बात की। प्रति सवारी एकसौ पच्‍चीस रुपए। हमने कहा ठीक है। उसने अपनी टैक्‍सी की तरफ इशारा किया और कहा जाएं, बैठ जाएं। हम उसमें बैठे तो नहीं, पर उसके पास जाकर खड़े हो गए। पन्‍द्रह मिनट से ज्‍यादा समय गुजर गया। उसे और दो सवारियां चाहिए थीं। तभी हमारी नजर प्रीपैड टैक्‍सी बूथ पर पड़ी। व्‍यवस्‍था यहां भी वही थी। एक टैक्‍सी चार सवारियां लेकर जाएगी। प्रति सवारी एकसौ पचपन रुपए। हमने दो सवारियों की परची कटवाई और दो और का इंतजार करने लगे। पांच मिनट बीतते-बीतते दो सवारियां आखिर आ ही गईं। प्रिया आगे ड्राइवर के साथ वाली सीट पर बैठ गईं और हम तीनों पीछे ।

उनमें से एक ने सवाल किया, आप देहरादून से हैं या बाहर से आए हैं। हमने अपना परिचय दिया और बताया कि यहां अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में आए हैं। वे बोले, मैं यहीं देहरादून में रहता हूं, आपके दफ्तर के बिलकुल पास बलबीर रोड पर। ये मेरे रिश्‍तेदार हैं, जमशेदपुर से आए हैं। इन्‍हें मसूरी घुमाने ले जा रहा हूं। बातों-बातों में पता चला कि जनाब बीएचईएल में नौकरी करते थे। भोपाल में भी रहे हैं। कोई दस बरस पहले हरिद्वार,बीएचईएल से सेवानिवृत हुए हैं और अब देहरादून में ही निवास कर रहे हैं।

वे रास्‍ते भर पुराने देहरादून की याद करते रहे। पुराना इतिहास बताते रहे। हमारी नजरें बाहर के नजारों पर लगी हुई थीं और कान उनकी सूचनाओं पर। उनकी संगत में देहरादून से मसूरी का लगभग घंटे भर का रास्‍ता अच्‍छी तरह से कट गया। मसूरी पहुंचकर हमारे रास्‍ते जुदा-जुदा हो गए।


अपना कोई एजेंडा नहीं था। प्रिया को मसूरी में बनने वाली एक खास तरह की सेंडिल खरीदनी थी। इस सैंडिल की खासयित है कि इसमें आगे से लेकर पीछे तक एक लम्‍बी बद्दी को इस तरह लगाया जाता है आप उसे खींचकर पैर के हिसाब से ढीला या टाइट कर सकते हैं। प्रिया ने कभी बरसों पहले यहां से ये सेंडिल खरीदी थी। तो चलिए हमें एक लक्ष्‍य मिल गया था। एक दुकान में घुसकर पूछा। उन्‍हें कुछ पता नहीं था। प्रिया का कहना था, इन चप्‍पलों को स्‍थानीय कारीगर ही बनाते हैं। तो मुझे लगा कि किसी छोटी दुकान या फुटपाथ पर बैठने वालों से ही सही जानकारी मिलेगी। मिली भी। पर टुकड़ों-टुकड़ों में। जैसा कि हर जगह हो रहा है, बाहर से बनकर आने वाले रेडीमेड माल ने बाजार पर कब्‍जा कर लिया है, सो स्‍थानीय कारीगर और स्‍थानीय माल हाशिये पर चले गए हैं। लोग उनके बारे में भूलने लगे हैं। किसी ने कहा आगे जाकर भारतीय स्‍टेट बैंक की शाखा है, वहां से थोड़ा आगे जाएंगे वहां आपको एक दुकान मिलेगी। तो हम चल दिए बैंक खोजने । साथ के साथ मसूरी का नजारा भी करते जा रहे थे।

गलियां और सड़कों के किनारे पर और कहीं-कहीं तो पूरी सड़क पर बर्फ ही बर्फ जमा थी। जैसे बर्फ का कीचड़। पैदल चलते हुए भी हमें संभालकर पैर रखने पड़ रहे थे। एक जगह ऐसी आई जहां से दूर पहाड़ों पर जमा बर्फ का नजारा किया जा सकता था। मेरे हाथ में कैमरा था। प्रिया ने कहा लाइए मैं आपकी फोटो उतारती हूं। वहां एक नीचे ढलान पर उतरती हुई पक्‍की सड़क थी। हमारे आगे तीन लड़कियां थीं, जो एक-दूसरे की फोटो उतार रही थीं। मैं इस सड़क के ऊंचे वाले सिरे पर खड़ा था। मेरे पीछे मसूरी की वादी नजर आ रही थी। प्रिया फोटो लेने के लिए ढलान पर उतर रहीं थीं। वे लड़कियों से कह रहीं थीं, संभलकर कहीं फिसल न जाना। और ये कहते..कहते वे खुद ही फिसल गईं। जिस हाथ में कैमरा था वह नीचे और वे उसके ऊपर। तीनों लड़कियों ने सहारा देकर उन्‍हें उठाया। गिरने से उनका एक गाल बर्फ से रगड़ा गया था। बाकी सब ठीक था। कैमरा भी सही सलामत था। हालांकि बाद में पता चला कि बैटरी को पकड़कर रखने वाला लीवर धराशायी हो गया था। पर शुक्र है कि कैमरा काम कर रहा था।

इसके बाद तो प्रिया के अंदर फिसलने का डर ही बैठ गया। अब वे हर कदम संभालकर रख रहीं थीं। हमारे आगे पीछे तमाम युवा थे, जो मसूरी की इस बर्फ का आनंद उठा रहे थे। वे उस पर दौड़ रहे थे, फिसल रहे थे, एक-दूसरे पर बर्फ फेंक रहे थे। और हम दोनों थे कि संभल-संभलकर आगे बढ़ रहे थे..उम्र का तकाजा जो था।

हम कैमल बैक हिल की सड़क पर थे। कैमल बैक हिल के नाम से मशहूर यह पहाड़ी दूर से ऐसी लगती है कि जैसे कोई ऊंठ बैठा हो। इसी सड़क के एक किनारे एक शेड बना हुआ था जहां से खड़े होकर सामने फैली पहाडि़यों का देखा जा सकता था। कोने में चाय की एक छोटी सी दुकान भी थी। ऐसे मौसम में चाय..वह भी अदरक वाली..मिले तो क्‍या कहने। चाय की दुकान में एक महिला थी। हमने भी दो गिलास चाय मांगी। शेड पर जमा बर्फ धूप से पिघलकर पानी बनकर नीचे गिर रही थी। शेड के चारों तरफ ऐसा नजारा था, जैसे बारिश हो रही हो।
बाईं तरफ नीचे घर थे। जिनकी छत पर बर्फ जमा थी। देखने से ऐसा लगता था, जैसे किसी ने बर्फ का प्‍लास्‍टर कर दिया हो। एक घर की छत पर एक कोने में एक जनाब कोई किताब पढ़ रहे थे। वहीं छत पर जाने वाली सीढि़यों पर बैठी एक महिला आलू छील रही थी। एक दूसरे घर की छत पर एक कुत्‍ता चहलकदमी कर रहा था। ध्‍यान से देखने पर समझ आया कि वह छत से नीचे आने का रास्‍ता ढूंढ रहा है, पर रास्‍ता बंद है। शायद जानबूझकर उसे वहां कैद किया गया था। थोड़ा और नीचे नजर घुमाने पर
बच्‍चों का एक समूह बर्फ के गोलों को फुटबॉल की तरह पैरों से नीचे लुढ़‍काता नजर आया। जो नजारा हमारे लिए कुछ खास था, वही यहां के लोगों का जीवन था। हमने चाय पीते- पीते यह सब देखा।
अब तक हमें स्‍टेट बैंक नहीं मिला था। चाय वाली महिला से इस बारे में दरियाफ्त की। उसने कहा अभी यहां से कम से कम आपको 2 किलोमीटर और आगे जाना होगा। प्रिया और हम एक दूसरे को देखकर मुस्‍कराए और चल दिए आगे की तरफ। वैसे भी हमारे पास कोई और काम तो था नहीं। खोजते-खोजते आखिर बैंक मिल ही गया। सचमुच बैंक के पास चप्‍पल जूतों की एक  एक दुकान थी। पर बंद थी। आसपड़ोस में पूछने पर पता चला कि दुकान मालिक तो देहरादून में रहते हैं। अब क्‍या करें।

फिर एक फुटपाथ के दुकानदार से बात की। उसे बताया कि हम खास तरह की सेंडिल खोज रहे हैं। उसने बताया कि वह तो आपको लण्‍ढौर में मिलेंगी। हमने पूछा कितनी दूर है। हाथ के इशारे से दिशा बताई और जवाब मिला यही कोई आधा घण्‍टा। यानी कि आधा घण्‍टा लगेगा।

प्रिया ने पूछा, राजेश जी क्‍या इरादा है। थक तो नहीं गए। मैंने कहा, अपनी सोचिए। अपन तो दिन भर पैदल घूम सकते हैं। हम लोग अब तक लगभग पांच किलोमीटर तो चल चुके थे। लग रहा था कि प्रिया थक गई हैं। पर सेंडिल का मोह उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था। तो हम फिर चल दिए। आगे का रास्‍ता चढ़ाई वाला था। सामने से आने वाली गाडि़यों को भी जगह देनी थी और पीछे से आने वालियों को भी। ऊपर की तरफ जाने वाले गाडि़यां कहीं-कहीं बर्फ की फिसलन के कारण चढ़ने में दिक्‍कत महसूस कर रही थीं। ऐसे में उनके पीछे आने वाली गाडि़यों को एक निश्चित दूरी बनाकर चलना पड़ रहा था।

अब तक भूख लगने लगी थी। लेकिन कहीं कोई खाने की दुकान नजर नहीं आ रही थी। जो नजर आती थीं, वे होटलें थीं,जिनमें ठहरने का इंतजाम था। ठहरो तो खाना भी मिलेगा। पतली गलियों में दोनों तरफ दुकानें थीं। आसमान साफ था लेकिन दुकानों की छतों से पानी सड़क पर गिर रहा था, जैसे बारिश हो रही हो। यह छतों पर जमा बर्फ का पानी था। आखिरकार हम खाने की एक ठीक ठाक दुकान खोजने में सफल हो गए। यहां गरम पकोड़े और गाजर का हलवा खाने को मिला। उसके बाद हमने दो गिलास चाय पी और फिर निकल पड़े सेंडिलों की खोज में।

आखिरकार हम लण्‍ढौर पहुंच ही गए। उन खास सेंडिलों की दो दुकानें हमें मिल भी गईं। आठ बाई आठ की दुकान में चार कारीगर बैठकर खास और आम चप्‍पलें, जूते बना रहे थे। ठंड से बचने के लिए दुकान के बीचों बीच अलाव भी जल रहा था। प्रिया ने दोनों दुकानों से एक-एक जोड़ी खरीदी। क्‍योंकि दोनों दुकानों में इस तरह की सेंडिल का स्‍टॉक नहीं था। दुकानदार का कहना था कि अब इनकी बहुत मांग नहीं है। जब कोई कहता है तो हम बनाकर दे देते हैं। उसकी दुकान में एक फोटो लगी थी, जिसमें वह फिल्‍म एक्‍टर अरशद वारसी के साथ नजर आ रहा था। पूछने पर बताया कि अरशद वापसी किसी फिल्‍म की शूटिंग के सिलसिले में मसूरी आए थे, और वे तब हमारी दुकान में आए थे। तो अब हमारा अभियान खत्‍म हो गया था। दुकानदार ने ही हमें बस स्‍टैंड का रास्‍ता बताया। यह रास्‍ता मसूरी के मशहूर माल रोड से आकर मिलता था और फिर वहां से बस स्‍टैंड पर।
यह भी मसूरी ही है ..
लौटने के लिए भी टैक्‍सी लेनी थी। प्रीपेड टैक्‍सी काउंटर पर हमने दो टिकटें लीं और दो और सवारियों का इंतजार लगे। तभी आठ लड़कों का एक झुंड आया। काउंटर वाले ने उन्‍हें सुझाया कि आप अपने साथ इन्‍हें शामिल कर लें और दो गाडि़यां कर लें। उन्‍होंने हमसे पूछा और कहा कि एक गाड़ी में हमारे साथ वे तीन लोग होंगे। सुबह हम जिस टैक्‍सी में आए थे उसमें इतनी जगह थी कि पांच लोग बैठ सकते थे। इसलिए हमने हामी भर दी। लेकिन जब गाड़ी सामने तो वह मारुति वैन थी। जिसमें आगे ड्रायवर के साथ एक ही व्‍यक्ति बैठ सकता था और पीछे ठसकर चार व्‍यक्ति। लड़कों में से एक ने लपक कर ड्रायवर के साथ वाली सीट हथिया ली।हमारे पास पीछे बैठने के अलावा और कोई विकल्‍प नहीं था।  

प्रिया, मैं और दो लड़के जिस तरह से बैठे, उसमें खासी परेशानी हो रही थी। पर लड़कों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, न वे परेशान हो रहे थे। अंतत: मैंने ड्रायवर के पीछे बने गियर बक्‍से पर बैठने का निर्णय लिया और ड्रायवर की तरफ पीठ करके बैठ गया। पर यह भी कोई आरादायक स्थिति नहीं थी। हां, प्रिया और वे दोनों लड़के अब आराम से बैठे थे। जब लगभग  आधा रास्‍ता पार हो गया तब मुझे लगा कि जैसे मेरा दम घुट रहा है। मुझे समझ आया कि मैं जिस तरह से बैठा हूं उसमें मेरा पेट दब रहा है और सारा खाया-पिया जैसे गले में चढ़ रहा है। मुझे महसूस हुआ कि मैं किसी भी समय जो कुछ मेरे पेट में है उसे सामने बैठे लोगों पर उगल दूंगा। मैंने ड्रायवर से गाड़ी रोकने के लिए कहा। गाड़ी रुकते ही मैं बाहर निकला और खुली हवा में राहत की सांस ली। मैंने ड्रायवर से कहा कि वह पीछे सामान रखने वाली जगह का दरवाजा खोल दे। वहां इतनी जगह थी कि मैं आराम से लेट सकता था। बहरहाल फिलहाल तो मुझे लेटने नहीं, बैठने की जगह चाहिए थी। सो मैं वहीं पैर फैलाकर बैठ गया। मैं सोच रहा था कि सुबह जाते हुए जो दो लोग मिले थे, जो हम उम्र थे। जो हर दस मिनट में पूछते थे कि आपको बैठने में कोई दिक्‍कत तो नहीं हो रही। और एक ये नौजवान हैं जिन्‍हें अपने सिवाय किसी और की कोई परवाह ही नहीं है। 
पुरानी (एंटिक्र) वस्‍तुओं की एक दुकान माल रोड पर

माल रोड पर मसूरी नगरपालिका द्वारा बनवाई गया म्‍यूरल
यहां उन सैंडिलों की कोई तस्‍वीर नहीं है, जिनके बारे में आप पढ़ते रहे हैं। साथ की तस्‍वीरें  भी बहुत अच्‍छी नहीं हैं। पर यही मसूरी के बारे में वह सारी बात आपको बताएंगी, जिनका मैंने यहां कोई जिक्र नहीं किया है। पहले मुझे लगता रहा कि गिरने से कैमरे के लैंस को कोई क्षति पहुंची है जिससे तस्‍वीरें अच्‍छी नहीं आई हैं। पर बाद में समझ आया कि वातावरण में धूप के कारण लगातार बर्फ से उठती हुई पानी की नमी छाई हुई थी, जिससे तस्‍वीरें धुंधली आई हैं। बाद में  प्रिया से बात करते हुए यह भी पता चला कि कैमरे में बर्फीले मौसम में फोटो खींचने के लिए सैंटिंग करने की व्‍यवस्‍था होती है। अब अपना तो जीवन में इतनी बर्फ एक साथ देखने का यह पहला मौका था। सो यह ज्ञान भी अपने को नहीं था। इसीलिए तो हमने कहा कि, यह मुंह और मसूरी की सैर।                              0 राजेश उत्‍साही

रविवार, 4 नवंबर 2012

नैनों में नैनीताल

उधमसिंह नगर में पांच दिन काम करने के बाद शनिवार का दिन अवकाश का था। यह 20 अक्‍टूबर,2012 की तारीख थी। रविवार को वापस बंगलौर के दड़बे में वापिसी थी। मुजाहिद, नितिन भी साथ थे। पहले सोचा था कि कार्बेट नेशनल पार्क जाएंगे। पर यहां आकर पता चला कि वह तो आम दर्शकों के लिए 15 नवंबर तक के लिए बंद है। स्‍थानीय साथियों ने सलाह दी भीमताल,नैनीताल,हरिद्वार कहीं भी चले जाओ।
दो साल पहले की अपनी यात्रा में मैं भीमताल तक हो आया था। सो तय किया कि नैनीताल की सैर की जाए। स्‍थानीय साथियों ने उधमसिंह नगर से टैक्‍सी करने की सलाह दी। पर मेरे युवा साथियों ने इसमें ज्‍यादा रूचि नहीं ली। इसके दो कारण थे, पहला तो पक्‍के रूप से पैसे की बात थी और दूसरी वे यहां की लोकल बस में बैठकर मनोरम दृश्‍यों का आंनद लेना चाहते थे।

नैनीताल अधिक नहीं बस 70 किलोमीटर दूर था। यानी बस से लगभग दो घंटे का सफर करना था। सुबह साढ़े छह बजे हम सड़क किनारे बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। तय किया था कि जो पहली बस आएगी उसमें सवार हो जाएंगे। जो बस आई वह हल्‍द्वानी तक जा रही थी। हम उसी में सवार हो गए। बाहर सूरज महाशय भी हमारा साथ देने के लिए बस के साथ साथ ही चल रहा थे। साढ़े सात के लगभग हम हल्‍द्वानी के बस स्‍टेंड पर थे। वहां से लगी लगी नैतीलाल के लिए बस मिल गई। हल्‍द्वानी निकलते ही कोसी नदी नजर आई। और फिर शुरू हुआ पहाड़ी चक्‍करदार रास्‍ता। बरसों तक ऐसे एक ही रास्‍ते का अनुभव होता रहा था। वह था मध्‍यप्रदेश में पचमढ़ी जाते हुए। लेकिन पिछले तीन बरसों में भीमताल से काठगोदाम, राजस्‍थान में माऊंट आबू, मैसूर में चामुंडी हिल, ऊंटी में डोडाबेट्टा जाते हुए ऐसा ही अनुभव हुआ।

पहाड़ी रास्‍ते से ऊपर जाते हुए बस की खिड़की से दूर दूर तक फैली वादियों को निहारते हैं, तब तक अचानक ही बस मुड़ जाती है और नजरों के सामने पहाड़ की दीवार आ जाती है। मैं और नितिन अपने कैमरे हाथों में लिए थे और दृश्‍यों को कैद करने की कोशिश कर रहे थे। रास्‍ते में दोगांव मोड़ पर बस रुकी। ड्रायवर ने चायपानी की घोषणा की। ढाबानुमा छोटी सी दुकान में चाय और पकोड़े आदि उपलब्‍ध थे।

हम लगभग नौ बजे नैनीताल की मुख्‍य झील के सामने थे। मुख्‍य झील के एक सिरे पर ही बस अड्डा है। सबसे पहले हमने पेट में कुछ डालने के बारे में सोचा। सामने गली में पराठे और दही का बोर्ड देखकर हम वहीं समा गए। पेट पूजा करके निकले तो झील के किनारे जा खड़े हुए। झील के किनारे शिक्षकों का एक धरना भी चल रहा था।

नैनी झील कभी आम की तरह लगती है तो कभी.....
देखते ही देखते दो तीन लोगों ने हमें घेर लिया और नैनीताल की सैर के अपने लोकलुभावने ऑफर प्रस्‍तुत करने लगे। उन्‍होंने अपनी जेब से छपी हुई रेटलिस्‍ट निकाल लीं। वास्‍तव में वे कम्‍प्‍यूटर प्रिंट रहे होंगे। पर ये छपे हुए अक्षरों का अपने ऊपर इतना आतंक है कि उसे अपन अंतिम सत्‍य मान लेते हैं। बहरहाल अपने को पढ़ने के लिए चश्‍मा लगता है। चश्‍मा कंधे पर टंगे झोले में था। हाथ में कैमरा था। तो चश्‍मा निकालने की जहमत कौन करे। नितिन कन्‍नड़ भाषी होने के कारण वैसे ही हिन्‍दी बोलने में बहुत सुविधा महसूस नहीं करते सो स्‍वाभाविक रूप से रेटलिस्‍ट देखने की जिम्‍मेदारी मुजाहिद को सौंप दी। वही उनसे बात भी करने लगा। दो ऑफर थे। सात सौ में चार पाइंट, चौदह सौ में आठ पाइंट। उनके अनुसार इस राशि में टोलटैक्‍स के दो सौ रूपए भी शामिल थे। हालांकि टैक्‍सी को लगभग पच्‍चीस किलोमीटर का ही सफर तय करना था। हां समय जरूर लगभग चार घंटे लगने वाला था।  

जो बंदा था वह भी मुजाहिद का हमउम्र ही था। वह लगातार पूरे ऑफर के बारे में होटल के किसी सधे हुए वेटर की तरह फटफट सब जगहों के नाम गिनाने में लगा हुआ था। मुझे उसे कहना पड़ा कि भाई, आराम से बोल। ट्रेन तो नहीं छूट रही है। बोला, साहब ट्रेन नहीं समय निकल रहा है। ज्‍यादा देर करेंगे तो फिर आपको हिमालय दर्शन नहीं हो पाएंगे। नितिन और मैं फोटो लेने में व्‍यस्‍त हो गए और मुजाहिद ऑफर समझने में।

लगभग दस मिनिट की खिचखिच के बाद बंदा हजार रूपए में तैयार हुआ। टैक्‍सी में बैठते-बैठते हमें समझ आ गया कि हम ठगे जा रहे हैं। मुजाहिद आगे बैठा था। मैं और नितिन पीछे। और न ठगे जाएं इसलिए बंदे से मैंने कहा, हम केवल हजार रूपए ही देंगे, उसके अलावा और कुछ नहीं। उसने सामने लगे शीशे में मुझे ऐसी नजरों से घूरा जैसे में नैनीताल के जू से भागकर आया कोई प्राणी होऊं। फिर बोला, हां जी कुछ नहीं देना है। मैंने राहत की बची-खुची सांस ली।

प्‍लान के मुताबिक वह हमें सबसे पहले हनुमान गढ़ी ले गया। हनुमान गढ़ी यानी नैनीताल का एक धार्मिक स्‍थल। जैसा कि आमतौर पर होता है मंदिर के लम्‍बे परिसर में हनुमान जी के साथ सारे देवी-देवता मौजूद थे। हमने परिसर का एक चक्‍कर लगाया और वापस आ गए।

जन्‍नत है या जहन्‍नुम पता नहीं : मनोहारी हिमालय दर्शन 
लगभग बीस मिनट के सफर के बाद हम समुद्र तल से लगभग 2600 मीटर की ऊंचाई पर नैना पीक यानी चाइना पीक पर थे। यह नैनीताल की सबसे ऊंची चोटी है। सामने हिमालय पवर्तमाला की बर्फ से ढकी 6 चोटियां नजर आ रही थीं, बताया जा रहा था कि इनके पीछे नंदादेवी चोटी है। इनमें कंचन जंघा भी है। दिन के लगभग सवा दस बज रहे थे। यह दृश्‍य यूं तो फिल्‍मों में और किताबों में अक्‍सर देखा था पर अपनी आंखों से रूबरू देखने का पहला अवसर था। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि दृश्‍य सचमुच मनोहारी था।

यहां भी बाजार मौजूद था। बीस रूपए में दूरबीन से चोटियों के दर्शन करवाए जा रहे थे। मन नहीं माना तो बीस रूपए खर्च करके दूरबीन को आंखों के आगे लगा लिया। पर नंगी आंखों से देखने में और दूरबीन से देखने में कोई बहुत ज्‍यादा अंतर मुझे तो महसूस नहीं हुआ।
किसी ने कहा, वहीं है जन्‍नत। मैंने नीचे वादी में नजर डाली और फिकरा कसा, जन्‍नत वहां नहीं यहां नीचे कूदने पर मिलेगी। सचमुच वादी ऐसी है कि अगर कोई कूदे तो सीधा जन्‍नत में ही जाएगा। भई अगर जन्‍नत नहीं तो जहन्‍नुम तो पहुंच ही जाएगा। बहरहाल अपना फिलहाल ऐसा कोई इरादा नहीं था।

बंदे ने कहा चलिए जी हो गए हिमालय दर्शन हमें आगे जाना है। हालांकि बंदे ने ऑफर देते समय बारबार यह कहा था कि आप हर पड़ाव पर अपने हिसाब से समय बिताएंगे। जब आप कहेंगे तब ही हम अगले पड़ाव पर जाएंगे। पर अब बंदा अपने असली रूप में आ चुका था। बहरहाल हिमालय दर्शन तो हो ही चुके थे। सो हमने भी आगे की राह पकड़ना बेहतर समझा।

कार अब ऊपर से नीचे की तरफ जा रही थी। रास्‍ते से नैनी झील नजर आ रही थी। बंदे ने कहा कि देखिए जी यह है मैंगों शेप में नैनी झील। एक जगह रूककर हमने झील को निहारा,फोटो लिए और फिर आगे के लिए रवाना हुए।

नितिन,मुजाहिद : लवर पाइंट पर दो मिनट का मौन 
अगला पड़ाव था लवर पाइंट या सुसाइड पाइंट। अब हर ऊंची जगह पर यह पाइंट भी पक्‍का बन ही गया है। पता नहीं कितने प्रेमियों ने यहां प्रेमगति (वीरगति की तर्ज पर) प्राप्‍त की है, पर नाम तो पड़ ही गया है। पचमढ़ी में हांडीखोह और ऊंटी में डोडाबैट्टा में भी ऐसे पाइंट प्रसिद्धी पा चुके हैं। हम तीनों ही शादीशुदा हैं सो आपस में मजाक में कह रहे थे यह तो अपने काम का ही नहीं है। अपन तो प्रेम-व्रेम के बाद शादी करके वैसे ही सुसाइड कर चुके हैं। बहरहाल ऑफर प्‍लान में था सो थोड़ा वक्‍त तो यहां बिताना ही था और जिन्‍होंने यहां प्रेमगति प्राप्‍त की उनकी याद में दो मिनट का मौन भी तो रखना था।

इसी पाइंट पर कुछ नहीं तो लगभग सौ घोड़े सवारी के लिए सजे-धजे तैयार थे। पता चला कि पांच सौ रूपए में नीचे जंगल के अंदर लगभग घंटे भर की सैर करवाई जाती है।

अगला पड़ाव था वॉटर फॉल । हमारी कार लगातार नीचे की तरफ जा रही थी। हम सोच रहे थे कि बंदा ले तो जा रहा वॉटर फॉल दिखाने पर लगातार नीचे जा रहा है। रास्‍ते में एक जगह चलती कार के अंदर से इशारा करते हुए बंदे ने बताया यह है लालपत्‍थर। यहां ट्रेकिंग आदि के प्रशि‍क्षण के लिए बच्‍चे आते हैं।

वॉटर फॉल के बीचों बीच : फोटो-मुजाहिद
जब वॉटर फॉल के पास पहुंचे तो यह कहने का मन हुआ कि यह वॉटर फॉल है या उसके नाम पर कलंक। बस कोई पचास मीटर की ऊंचाई से पहाड़ का पानी झरने के रूप में गिर रहा था। उसके पास जाने के लिए भी पांच रूपए की टिकट थी। नितिन ने टिकट के विरोध में झरने के पास नहीं जाने का फैसला किया। पर मुजाहिद और मैंने झरने के बीच जाकर फिल्‍मी हीरो की तरह ए‍क-दूसरे की तस्‍वीरें लीं और अपने को ठगे जाने के अहसास से थोड़ा मुक्‍त करने की कोशिश की। आठ में से पांच पाइंट हो गए थे। दूर के ढोल सुहावने होते हैं कहावत चरितार्थ होते हम देख रहे थे।

अगला पाइंट था प्राकृतिक गुफाएं। गुफाओं के करीब पहुंचने को थे कि बंदे ने घोषणा की कि साहब आगे शायद पुलिस चेकिंग है। अगर पूछेंगे तो कहियेगा कि हम सब रिश्‍तेदार हैं और पुलिस लाइन में रहते हैं। मैंने कहा, यह तो आप भी कह सकते हैं। बंदा बोला, नहीं जी मुझे तो लोग जानते हैं न। इसलिए आपको ही कहना होगा कि आप मेरे रिश्‍तेदार हैं और घूमने आए हैं। मैंने कहा, भई हम तो तुम्‍हारा नाम भी नहीं जानते। बोला, मेरा नाम है तन्‍नु। हमारे पास उसकी बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं था। हमें यह समझ आया कि तन्‍नु मियां बिना परमिट की गाड़ी में हमें घुमा रहे थे। उनके पास टैक्‍सी का परमिट नहीं था। पर अच्‍छी या कि बुरी बात यह हुई कि पुलिस चेकिंग के लिए हाजिर ही नहीं थी। हमने राहत की सांस ली कि हमें उल्‍टा सीधा कुछ बोलना नहीं पड़ा। वरना पता नहीं क्‍या पूछते और अपन क्‍या बोलते।  

प्राकृतिक गुफा में मुजाहिद 
बहुत हसरत से पैंतीस-पैतीस रुपए की टिकट लेकर गुफाओं के अंदर गए। वहां जाकर निराशा ही हुई। वास्‍तव में ये गुफाएं पहाड़ों के बीच बन गई दरारें थीं, जिनमें ऊपर पत्‍थर अटक जाने से नीचे खाली जगह बन गई थी। पर्यटन की दृष्टि से इनमें थोड़ी सीढि़यां आदि बनाकर गुफा का रूप दे दिया गया है। ये गुफाएं शहर के बीचों बीच ही कुमाऊं विश्‍वविद्यालय के परिसर से लगी हुई हैं। इसलिए लोगों के लिए अवकाश के दिनों में समय बिताने का स्‍थान बन गई हैं। हालांकि इन दरारों के बीच में घुसकर निकलना एक अनुभव तो था ही। कई जगह घुप्‍प अंधेरा भी था।

हमने तन्‍नू जी से निवेदन किया कि वे हमें अगले पाइंट राजभवन दिखाने की बजाय रोपवे स्‍टेशन पर छोड़ दें। रोपवे उनके प्‍लान में नहीं था। वे मान गए और हमें झील से कोई दो किलोमीटर दूर रोपवे स्‍टेशन जाने वाली गली के मुहाने पर छोड़कर विदा ले गए।

अंजना, अदिति, अंजली और सपना 
रोपवे के रास्‍ते में स्‍कूल से लौटती कुछ बच्चियों से मुलाकात हो गई। वे एक पुलिया पर बैठकर सुस्‍ता रही थीं। हम भी उनसे बात करने लगे। वे सब पांचवीं की छात्राएं थीं। मुझे अचानक याद आया कि उत्‍तराखंड की पांचवीं की पर्यावरण विज्ञान की पाठ्यपुस्‍तक में मेरी कविता आलू,मिर्ची,चाय जी है (हालांकि किताब बनाने वाले वहां मेरा नाम देना भूल गए हैं)। मैंने उनसे पूछ लिया। कविता उन्‍होंने पढ़ी थी। मैंने कहा अपने बस्‍ते में से किताब निकालकर दिखाओ। वे बोलीं, किताब नहीं है क्‍योंकि परीक्षाएं चल रही हैं। मैं आगे कुछ बोलता उसके पहले ही नितिन ने मेरा परिचय उनसे उस कविता के लेखक के रूप में करवाया। पता नहीं इस बात का उनके लिए क्‍या मतलब था। पर मेरे लिए तो था। मैंने उनके चेहरे और आंखों में एक तरह की खुशी देखी थी। और यह बात थोड़ी ही देर बाद सच साबित होती दिखाई दी। हम उनसे अधिक से अधिक पांच मिनट ही बतियाए होंगे।

हम स्‍नो पीक पाइंट पर जाने के लिए रोपवे स्‍टेशन में ट्राली का इंतजार कर रहे थे। और इधर-उधर देख रहे थे। नजर आया कि वे सब बच्चियां दूर ऊपर की ओर जाती हुईं हमें हाथ हिला रही हैं। हमने भी उन्‍हें हाथ हिलाकर जवाब दिया। थोड़ी ही देर में ट्राली आ गई। रोपवे की ट्राली एक बार में दस लोगों को ही ले जाती है। ट्राली में सवार होकर चले तो देखा कि वे अभी थोड़ा और ऊपर चली गई हैं, और अभी भी हमें हाथ हिलाकर विदा कर रही हैं। मैं पक्‍के तौर पर कह सकता हूं जितनी खुशी उन्‍हें हो रही थी, उतनी ही हमें भी।

ऊपर से नीचे की ओर आती रोपवे ट्राली
रोपवे से एक बार फिर नैनी झील का नजारा किया। स्‍नो पीक पाइंट से भी हिमालय दर्शन होता है, लेकिन अब तक हिमालय की पर्वतमालाओं पर बादल छा चुके थे। यहां बाजार वाली दूरबीन तो नहीं थी, पर पर्यटन विभाग की तरफ से एक स्‍थायी दूरबीन लगवाई गई है। पांच रूपए देकर आप इसका लाभ उठा सकते हैं। यहां भी हमने पांच रुपए खर्च किए। पर बादलों के अलावा कुछ नहीं दिखाई दिया। हां कोसी जरूर नजर आई। रोपवे का किराया डेढ़सौ रुपए प्रति व्‍यक्ति था। और स्‍नो पाइंट पर लगभग एक सवा घंटे रूकने की अनुमति होती है। उसके बाद आपको वापस लौटना होता है।

साइकिल रिक्‍शे भी कतार में हैं..
लगभग तीन बज चुके थे। हमें सलाह दी गई थी कि अंधेरा घिरने के पहले हल्‍द्वानी पहुंच जाएं तो बेहतर है। क्‍योंकि अंधेरे में बस से ऊपर से नीचे आना थोड़ा जोखिम वाला मामला होता है।
रोपवे की यात्रा के बाद हम पैदल ही नैनी झील के किनारे माल रोड पर चलने लगे। यह झील के किनारे से थोड़ा ऊपर वनवे था। झील के किनारे से लगा दूसरी दिशा में जाने वाला रास्‍ता था। झील के किनारे साइकिल रिक्‍शा फर्राटे भर रहे थे। यहां साइकिल रिक्‍शा की भी प्रीपेड बुकिंग होती है।  

माल रोड पर हर तरह के होटल नजर आ रहे थे। खाने के भी और रहने के भी। दुकानें थीं, कपड़ों की, क्राफ्ट की और अन्‍य जैसी की होती हैं। दुकानें फुटपाथ पर भी थीं। हम लोग चलते-चलते यहां-वहां रूक ही रहे थे। एक दुकान में टोपियां बिक रही थीं। नितिन का कैमरा मुजाहिद के हाथों में था। नितिन ने एक हैट उठाकर सिर पर रख लिया। वह किसी दक्षिणी भारतीय हीरो की तरह  लग रहा था। मुजाहिद ने उसकी फोटो लेने के लिए एंगल बनाया। दुकानदार ने तुरंत कहा दस रुपए लगेंगे। मुजाहिद ने कैमरा नीचे किया और नितिन ने टोपी ।

तार की कलाकृतियां
आगे बढ़े तो फुटपाथ पर ऊन के मौजे बुनती एक औरत बैठी थी। नितिन और मुजाहिद मौजे उलटने-पलटने लगे। संकोच के साथ उन्‍होंने पूछा, एक फोटो ले सकते हैं। औरत ने खुशी-खुशी हामी भरी। बाद में उन्‍होंने मौजे भी खरीदे। पतले रंगीन तार से छोटी-छोटी सजावटी सा‍इकिलें और साइकिल रिक्‍शे बनाता एक युवक भी फुटपाथ पर था। उसकी साइकिलें भी उल्‍टी-पल्‍टी। उससे भी पूछा फोटो के लिए। वह बोला, भैया फोटो खींचने के तो पैसे नहीं लगते। हमारी नैनीताल यात्रा समाप्ति की ओर थी। या कहें कि समाप्‍त हो ही गई थी। अब तो बस हमें बस में बैठकर उधमसिंह नगर ही जाना था। लौटते हुए दोगांव में चाय पीनी थी और पकौड़े खाने थे। (सभी फोटो राजेश उत्‍साही) 
                                                  0 राजेश उत्‍साही
  

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

अजित गुप्‍ता जी के 'कोने' में

एक बार फिर उदयपुर जाना हुआ। 'खोजें और जानें' के दूसरे अंक के संपादन के लिए।1 से 6 अक्‍टूबर तक वहां रहना था। सोचा इस बार अजित गुप्‍ता जी से मुलाकात कर ही ली जाए। अपनी पिछली दो यात्राओं में समय की कमी के कारण मैंने उनसे संपर्क नहीं किया था।

इस बार उदयपुर पहुंचते ही मैंने उन्‍हें एक मेल कर दिया था।तुरंत ही उनका उत्‍तर भी आ गया कि मैं 5 अक्‍टूबर को दिल्‍ली जा रही हूं उसके पहले आप जब चाहें तब मिलने आ सकते हैं,आपका स्‍वागत है। मैंने 3 अक्‍टूबर की शाम उनसे मुलाकात करना तय किया।

विद्याभवन के अपने साथी पुष्‍पराज से मैंने अनुरोध किया वे मुझे उनके आवास तक पहुंचा दें।उदयपुर में अजित जी का निवास अरावली अस्‍पताल के पास है।पुष्‍पराज अपनी मोटर साइकिल पर मुझे उनके आवास पर छोड़कर चले आए।

अरावली अस्‍पताल से कुछ पचास कदम आगे सामने की तरफ अजित का आवास था। आवास में डॉ.चन्‍द्रकुमार गुप्‍ता का बोर्ड लगा हुआ था। अजित जी ने भी यही बताया था।

चहारदिवारी का गेट खोलकर मैं अंदर पहुंचा।घंटी बजाई।दरवाजा एक भ्रद पुरुष ने खोला। नमस्‍कार करके मैंने कहा,'अजित जी से मिलना है।' उन्‍होंने नमस्‍कार का उत्‍तर दिया और कहा,'आइए,अजित जी जरा व्‍यस्‍त हैं।'मैं समझ गया कि वे चन्‍द्र कुमार जी हैं अजित जी के पति।

जब तक बैठने का उपक्रम करता त‍ब तक अजित जी सामने थीं। वे जैसी तस्‍वीर में दिखती हैं,वैसी ही हैं।उनकी सौम्‍य मुस्‍कान और चश्‍मे के पीछे से झांकती उनकी आंखें उनके चेहरे से नजर हटने ही नहीं दे रही थीं।ब्‍लाग पर जितना परिचय है उसमें कुछ और इजाफा करते हुए मैंने अपना परिचय दिया।उदयपुर आने का अपना मंतव्‍य बताया।

अजित जी आयुर्वेद चिकित्‍सक हैं।वे आयुर्वेद महाविद्यालय,उदयपुर में चिकित्‍सा एवं अध्‍यापन कार्य करती रही हैं।1997 में स्‍वैच्छिक सेवानिवृति के बाद से पूरा समय लेखन एवं सामाजिक कार्यों में लगा रही हैं।लगभग तीन साल वे राजस्‍थान साहित्‍य अकादमी की अध्‍यक्ष एवं अकादमी की पत्रिका'मधुमति'की संपादक रही हैं।

यह तस्‍वीर चन्‍द्रकुमार जी ने ली है। उस दिन जाने कैमरे को  क्‍या हुआ था । 
एक भी तस्‍वीर ठीक से नहीं आई। यही सबसे बेहतर रही। 
फिर जैसा कि होता है जब दो ब्‍लागर मिलते हैं तो ब्‍लाग की बातें होती ही हैं। सो हमारे बीच भी हुईं।इन दिनों ब्‍लाग में चल रही गुटबाजी को लेकर वे भी खासी दुखी नजर आईं।चर्चा करते हुए यह महसूस हुआ कि ब्‍लाग को लेकर उनके और मेरे विचार लगभग एक जैसे ही हैं।वे भी विवादित ब्‍लागों पर जाना पसंद नहीं करती हैं।उन्‍हें भी लगता है कि ब्‍लाग अभिव्‍यक्ति का माध्‍यम हैं और वहां सबको अपनी बात कहने की स्‍वतंत्रता होनी चाहिए।चाहे आप सहमत हों या न हों।एक और समानता दिखी।वे भी सीधे हिन्‍दी की-बोर्ड से ही टाइप करती हैं और मैं भी।पर वे अब भी डेस्‍कटॉप को ही पसंद करती हैं,हालांकि लैपटॉप की आदत डाल रही हैं।

अजित जी बीच-बीच में उठकर आथित्‍य सत्‍कार की औपचारिकताओं में भी लगी रहीं। चन्‍द्रकुमार जी भी वहां मौजूद थे,पर वे हमारी बातचीत के केवल श्रोता थे, बातचीत में हिस्‍सा नहीं ले रहे थे। मैंने उनसे पूछा, 'आप भी...।' वे बोले, 'नहीं जी बस अपन तो पाठक और श्रोता ही हैं।बाकी अपना यह क्‍लीनिक है रोगियों की सेवा के लिए।' वे एलोपैथी चिकित्‍सक हैं। घर के एक हिस्‍से में छोटा-सा क्‍लीनिक है।

मैं अपना कविता संग्रह' वह जो शेष है' अजित जी के लिए ले गया था। मैंने उन्‍हें सादर भेंट किया।उन्‍होंने भी अपना सांस्‍कृतिक निबंध संग्रह 'बौर आए: बौराऊँ नहीं'भेंट किया।इसमें मधुमति में लिखे गए उनके 30 संपादकीय संग्रहित हैं।इन निबंधों में संस्‍कृति,साहित्‍य और समाज की चर्चा है। इनमें देश की बात है तो परदेश की भी।

'साहित्‍यकार और समाज के मंच'निबंध में वे लिखती हैं,'वर्तमान में साहित्‍यकार,लेखक,बुद्धिजीवी,चिंतक,मनीषी की समाज में क्‍या स्थिति है?इस पर हमें गम्‍भीरता से चिंतन करना चाहिए। वास्‍तविकता में वे केवल स्‍वयं के मंचों पर ही सम्‍मानित होते हैं,समाज के शेष वर्ग उन्‍हें केवल अपने बुद्धिविलास या शोभा के लिए उपयोग करता है या फिर उनकी रचनाओं से अपने आपको समाज के सम्‍मुख बुद्धिशाली प्रकट करता है।साहित्‍यकार का समाज में कोई स्‍थान नहीं, उसका स्‍थान तभी तक है जब तक राजनेता या धन-कुबेर उस मंच पर या उस घर में नहीं होता। उनके आने के बाद आप कब उनके मंचों और घरों से बेइज्‍जत कर दिए जाएं या फेंक दिए जाएं, इसकी खबर आपको नहीं लगती।'उनका हर निबंध एक नई दृष्टि देता है।

पिछले कुछ दिनों से वे विवेकानंद को पढ़ रही थीं। और उनके ब्‍लाग'अजित गुप्‍ता का कोना' में उन पर लिख भी रही थीं। सामने मेज पर नरेन्‍द्र कोहली का उपन्‍यास'तोड़ो कारा तोड़ो'भी रखा हुआ था। जो विवेकानंद के जीवन पर ही आधारित है।

य‍द्यपि हमारी यह मुलाकात लगभग एक घंटे की संक्षिप्‍त मुलाकात थी, लेकिन बहुत सारगर्भित रही।अजित जी तथा चन्‍द्रकुमार जी को अपने किसी परिचित से मिलने अस्‍पताल जाना था। वे उसी ओर जा रहे थे, जहां मेरा ठिकाना था। सो मैंने उनकी कार में ही शरण ली। अजित जी ने कहा कि अगली बार आएं तो समय निकालकर आएं ताकि हम केवल दिमागी भोजन ही नहीं,वास्‍तविक भोजन भी साथ कर सकें।

मैं भी अगली उदयपुर यात्रा का इंतजार कर रहा हूं ताकि एक बार फिर अजित जी से मुलाकात हो सके।   0 राजेश उत्‍साही 
       


रविवार, 23 सितंबर 2012

धमतरी के रास्‍ते में खिला फूल


पांच सितम्‍बर को टीचर्स ऑफ इण्डिया पोर्टल की नई डिजायन जारी होनी थी। तय हुआ था कि इसे अलग अलग जगहों पर जारी करेंगे। इनमें एक जगह में धमतरी भी थी।
कोई तीन साल पहले मैं धमतरी के पास भाटागांव तक तो गया था,धमतरी जाने का पहला अवसर था। धमतरी की दलित साहित्‍य अकादमी ने राज्‍य भर के 74 शिक्षकों को सम्‍मानित करने का आयोजन किया था । इसी आयोजन में टीचर्स ऑफ इण्डिया की नई डिजायन का विमोचन भी हुआ।
अगले दिन अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के कार्यालय में ही साथियों से मिलना था। वहां के प्रमुख सुनील शाह ने कहा, ‘मांझी अनंत से मिलना चाहेंगे।’ मैंने कहा क्‍यों नहीं।  उन्‍होंने तुरंत फोन लगाया। तय हुआ कि वे भी आएंगे।

                                                                            फोटो : ताहिर अली 
1982 में अमरकटंक में मप्र हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन और मध्‍यप्रदेश साहित्‍य परिषद के संयुक्‍त आयोजन में एक रचना शिविर आयोजित हुआ था। मप्र के लगभग 40 युवा रचनाकार उस शिविर में शामिल हुए थे। मैं भी था। उनमें मांझी अनंत भी थे। वहां उनसे परिचय हुआ था। बाद में जब मैं चकमक से जुड़ा तो उनसे परिचय का दायरा थोड़ा और बढ़ा। मुझे याद पड़ता है चकमक में उनकी कुछ कविताएं भी प्रकाशित हुई थीं। मांझी पेशे से पशु चिक्तिसक हैं। वे आजकल धमतरी में हैं।

सुनील भाई ने अपने अन्‍य साथियों से उनका परिचय कवि के रूप में कराया। मुझे याद पड़ता था कि वे कहानियां भी लिखते हैं,सो मैंने जोड़ा कि वे कहानीकार भी हैं। मांझी उस समय तो चुप रहे। बाद में बोले, ‘राजेश जी, मैंने तो बहुत कहानियां नहीं लिखीं है।’ मैं याद करता रहा। अचानक मुझे याद आया कि अमरकंटक शिविर में एक और साथी थे लोक बाबू। मैं लोकबाबू और मांझी अनंत को एक ही व्‍यक्ति समझने की भूल कर रहा हूं। जब मैंने यह बात मांझी को बताई तो बोले यही हो रहा है। लोकबाबू भी छत्‍तीसगढ़ में ही हैं। लोकबाबू भी चकमक से जुड़े रहे। उनकी कहानी मेमना मैंने ‘पहल’ से लेकर चकमक में प्रकाशित की थी। वे कहानीकार के तौर पर जाने जाते हैं। हम पुरानी यादें ताजा करते रहे। समय ज्‍यादा नहीं था बतियाने का। वादा किया कि अगली बार जब आऊंगा तो इत्‍मीनान से बात करेंगे। मैंने अपना सद्य प्रकाशित कविता संग्रह ‘वह जो शेष है’ उन्‍हें भेंट किया।

वे भी अपना कविता संग्रह ‘हमारे रास्‍ते में खिला फूल’ मेरे लिए लाए थे। उनका यह संग्रह 1997 में रामकृष्‍ण प्रकाशन,विदिशा से आया था। इसमें छोटी-बड़ी 64 कविताएं हैं। इसकी छोटी सी भूमिका में कवि राजेश जोशी ने लिखा है- ये कविताएं आसपास के जीवन और उसके अन्‍तस के अंधेर-उजालों को देखने-दिखाने की विनम्र कोशिश है। इन कविताओं में अपने लोक की अनुगूंजें ऐसी गुंथी बुनी हैं कि उन्‍हे अलग से ध्‍यान खींचने का उपक्रम नहीं करना पड़ता।

प्रस्‍तुत हैं कुछ कविताएं-
(1)
तुम्‍हारे
हाथों की धौल
जब
मेरी पीठ पर पड़ती है

मैं
जान जाता हूं
अच्‍छे बीत रहे हैं
तुम्‍हारे दिन।

(2)
मैं बहुत खुश था
पर मेरी खुशी,
खुशी नहीं थी

मां की आंखों में आंसू
पिता के चेहरे में उदासी
और भाई के मन में दुख था।

कितना दुखद है
नौकरी के लिए
सब छोड़कर जाना।

वह मेरी यात्रा नहीं
मां के आंसू
पिता की उदासी
और भाई के
दुख: की यात्रा थी।

(3)
मैंने उस दिन जाना
क्‍या होता है प्‍यार

उस दिन
न सुबह होती है
न ही शाम होती है
फ़कत
एक अंधेरा होता है।

और अंधेरे में
लौ की तरह
टिमटिमाता इन्‍तजार ।
(4)
भोर
से पहले
सूरज लाल होता है
रात यदि
सचमुच कष्‍टप्रद है

तो जरूरी है
हम सबके चेहरों का
लाल होना।

0 राजेश उत्‍साही