सोमवार, 8 सितंबर 2014

रायपुर डायरी


।।एक।।
दो साल के बाद रायपुर में था। 3 सितम्‍बर की रात को पहुंचकर 4 की सुबह धमतरी चला गया था। 6 की सुबह होते-होते हेमंत (जैन) भाई मुझे घेर लिया था। अंतत: तय हुआ कि हम रविवार को मिलेंगे। रायपुर यात्रा के मेरे पहले स्‍टेटस को देखकर ही उन्‍होंने मुझे अपना नंबर भेज दिया था। मेरे पास उनका नंबर पहले से था। फिर 6 की शाम जब उनका फोन आया तब मैं मगरलोड में था। उन्‍होंने बताया कि अचानक उनके दफ्तर का कुछ काम निकल आया है इसलिए वे रविवार को थोड़े व्‍यस्‍त रहेंगे, पर मिलेंगे जरूर।

हेमंत भाई से 25 साल पुराना परिचय है, जब वे मध्‍यप्रदेश के अलीराजपुर और शाजापुर में हुआ करते थे। लगभग हर दो-तीन महीने में उनका भोपाल आना होता। अपनी हर यात्रा में वे समय निकालकर एकलव्‍य जरूर आते। अपने मित्रों और उनके बच्‍चों को चकमक की सदस्‍यता दिलवाना उनका प्रिय काम था। किताबें और लकड़ी के खिलौने भी वे बच्‍चों को जन्‍मदिन पर भेंट करने के लिए ले जाया करते थे।

सुबह लगभग दस बजे हेमंत भाई छत्‍तीसगढ़ शिक्षा स्रोत केंद्र के गेस्‍टहाउस में मौजूद थे। हम दोनों लगभग 10-12 साल बाद रूबरू मिल रहे थे। पर फेसबुक पर होती रही मुलाकातों ने यह महसूस ही नहीं होने दिया कि वास्‍तव में इतना अंतराल आ गया है। हमने पुरानी यादों को ताजा किया। उस समय के विभिन्‍न व्‍यक्तियों को याद किया। लगभग आधा घंटे की चर्चा के बाद तय हुआ कि यह मुलाकात काफी नहीं है। हम शाम को एक बार फिर मिलेंगे। जब मिले तो वे अकेले नहीं थे, साथ थीं उनकी धर्मपत्‍नी छाया जी और दो नवजवान दम्‍पति अंकित-निकिता और वृषा-विवेक ने। बातों बातों में ही उन्‍होंने एक रेस्‍टोरेंट में भोजन का कार्यक्रम बना लिया था।

शुक्रिया Hemant भाई रायपुर में आज की सुबह और शाम को यादगार बनाने के लिए।

 ।।दो ।।
जब धमतरी यात्रा का कार्यक्रम बना, तो मैंने तय किया कि इस बार दो लोगों से जरूर मिलना है Kunwar Ravindra और Rahul Singh जी। मैंने दोनों को इनबॉक्‍स में संदेश भेजा, कि मैं 6 और 7 को रायपुर में रहूंगा, कृपया बताएं कि आप से भेंट कब हो सकती है। रवीन्‍द्र जी का संदेश आया, स्‍वागत है, आइए।

रायपुर पहुंचकर मैं धमतरी चला गया और वहां से 6 की रात को लौटा। धमतरी में नेट कनेक्टिविटी की समस्‍या के कारण राहुल जी का संदेश नहीं देख पाया। उन्‍होंने अपने संदेश में स्‍वागत करते हुए लिखा था संस्‍कृति एवं पुरातत्‍व विभाग 6 से 14 सितम्‍बर तक संवाद एवं पुस्‍तक प्रदर्शनी का आयोजन कर रहा है। मैं भी उसमें शामिल होऊं। राहुल जी भी इसी विभाग में कार्यरत हैं। बहरहाल मैंने 6 की सुबह पहले रवीन्‍द्र जी को फोन किया। उन्‍होंने कहा कि वे 11 बजे तक बता पाएंगे कि मुलाकात कब संभव है। पौने ग्‍यारह बजे उनका फोन आया कि वे राजभवन के पास काफी हाउस पहुंच रहे हैं, मैं भी वहीं आ जाऊं।

भोपाल के एक और पुराने परिचित Rakesh Kumar Malviya से तय हुआ था कि हम उनके दुपहिया वाहन पर भटकेंगे। राकेश भास्‍कर के वेब संस्‍करण के प्रभारी हैं। उन्‍हें फोन लगाया तो बोले अखबार का कुछ काम आ गया है, उन्‍हें आधा घंटा लगेगा। उधर रवीन्‍द्र जी घर से निकल चुके थे। मैंने राकेश से कहा कि वे अपना काम निपटाकर काफी हाउस आ जाएं, मैं निकलता हूं।

रायपुर के भूगोल से मैं ज्‍यादा परिचित नहीं हूं। कुंवर सिंह ने मुझे बताया कि वहां तक पहुंचने के लिए पहले मुझे घड़ी चौक जाना होगा। मैं घड़ी चौक पहुंचा, तब तक रवीन्‍द्र जी काफी हाउस पहुंच चुके थे। थोड़ी देर बार राकेश फोन आ गया, वे काफी हाउस पहुंच चुके थे, मुझे वहां न पाकर,फोन लगाया था। तब तक में बिलबिचयाया सोच रहा था कि क्‍या करूं। मैंने राकेश से अनुरोध किया कि मुझे घड़ी चौक ले लें। अभी फोन बंद किया ही था कि रवीन्‍द्र जी का फोन आ गया। मैंने उन्‍हें माजरा बताया। उन्‍होंने कहा कि वे वहीं आ रहे हैं।


फोटो : राकेश मालवीय
पता चला कि सर्किट हाउस के सभागार में काफी मुख्‍यमंत्री की वेबसाइट का लोकापर्ण का कार्यक्रम था, जिसकी वजह से काफी हाउस उस समय मुलाकात के लिए उपलब्‍ध नहीं था। रवीन्‍द्र जी हमें अपने घर ले गए। रवीन्‍द्र जी और मैं लगभग 25 साल बाद मिल रहे थे। वे जब भोपाल में थे, तो एकलव्‍य आया करते थे। चकमक के लिए चित्र बनाते थे। फेसबुक पर हो रही रोज की नियमित मुलाकातों ने यह अहसास लगभग समाप्‍त कर दिया कि हम इतने लंबे अंतराल के बाद मिल रहे हैं। लगभग एक-डेढ़ घंटे की चर्चा चकमक, भोपाल, भोपाल के पुराने साथी, फेसबुक की बहस, संवाद,वाद-विवाद, धड़े और घड़े, फेसबुक पर रवीन्‍द्र जी के चित्र, रायपुर में साहित्यिक और कला वातावरण की स्थिति, बच्‍चे और कला आदि के इर्द-गिर्द घूमती रही।

रायपुर में बिताए इस रविवार की चढ़ती दोपहर को रवीन्‍द्र जी ने अपने रंगों से भर दिया। और ये रंग उनके चित्रों के रंग की तरह ही अंतस तक पैठ जाने वाले हैं।
शुक्रिया रवीन्‍द्र जी।
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रवीन्‍द्र जी से मुलाकात के बाद राकेश और हम राहुलसिंह जी से मुलाकात की आस में कलावीथिका गए जहां छत्‍तीसगढ़ शासन के संस्‍कृति विभाग और राजकमल प्रकाशन समूह के संयुक्‍त तत्‍वावधान में लेखक-पाठक संवाद एवं पुस्‍तक प्रदर्शनी का आयोजन हो रहा है। पर राहुल जी वहां नहीं मिले। राकेश ने उनका नंबर जुगाड़ा और फोन मिलाया तो पता चला कि वे शहर से बाहर हैं और सोमवार की शाम तक लौटेंगे। फोन के दूसरे छोर पर वे इस बात पर अफसोस जाहिर कर रहे थे, इस बार हमारी मुलाकात नहीं हो सकेगी।
                                                                                                                       0 राजेश उत्‍साही

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

दो दिन की दिल्‍ली



अपने काम के सिलसिले में पिछले कुछ दिनों में जब भी दिल्‍ली से गुजरता फेसबुक या जीमेल का स्‍टेटस देखकर मित्र लोग कहते, अरे यार कभी दिल्‍ली में भी रुक जाया करो...हमसे भी मिल लिया करो। पर हर बार यात्रा का कार्यक्रम कुछ इस तरह होता था कि रुकने का समय ही नहीं होता। 

इस बार बंगलौर से उदयपुर के लिए निकला तो यह कहकर निकला था कि फरवरी के बाद लौटूंगा। इस बीच भोपाल तथा जबलपुर में बेटे के पास रहकर काम करुंगा। लेकिन जनवरी का आधा महीना तो उदयपुर में ही गुजर गया। भोपाल में एक हफ्ता रहने के बाद जनवरी का आखिरी हफ्ता उधमसिंहनगर के नाम था। वहां एक कार्यशाला थी। लौटकर भोपाल ही आना था। बीच कार्यशाला के अंत में शनिवार, इतवार थे और बीच में दिल्‍ली। सो ऐसा कार्यक्रम बन सकता था कि दिल्‍ली में दो दिन तो गुजारे ही जा सकते थे। 

अब सवाल था एक रात के बसेरे का। दिल्‍ली निवासी मित्र बलराम अग्रवाल जी से इस बात का जिक्र किया, उस समय वे बंगलौर में थे। सुनते ही बोले, अरे यह तो बहुत अच्‍छी बात है आइए, स्‍वागत है आपका दिल्‍ली में। मैं तब तक दिल्‍ली पहुंच जाऊंगा।  
इतना ही नहीं उन्‍होंने अगले ही दिन फेसबुक पर यह स्‍टेटस डाल दिया, दिल्ली के बालसाहित्यकारों के लिए एक सूचना है। कवि एवं संपादक भाई राजेश उत्साही 2 फरवरी 2014 को दिल्ली में होंगे। उनसे मिलने के लिए कनॉट प्लेस में हनुमान मंदिर के सामने स्थित 'कॉफी होम' को तय किया है। दिल्ली के जो मित्र भेंट करना चाहें समय सुझा सकते हैं। यों अभी तक हमने दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक का समय निश्चित किया है। इच्छुक मित्र उनके या मेरे मो॰ नं॰ 8826499115 पर संपर्क कर सकते हैं।
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1 फरवरी को उधमसिंह नगर से लौटते हुए दोपहर साढे़ तीन बजे मैं पुरानी दिल्‍ली रेल्‍वे स्‍टेशन पर उतरा। बलराम जी से फोन पर बात हो चुकी थी। चांदनी चौक से मेट्रो पकड़कर, कश्‍मीरी गेट होते हुए शाहदरा पहुंचा। स्‍टेशन के बाहर बलराम जी अपनी कायनेटिक स्‍कूटर के साथ मौजूद थे।

नवीन शाहदरा की गलियों से होते हुए लगभग पन्‍द्रह मिनट बाद मैं उनके निवास 70 एम नवीन शाहदरा के सामने था। लोहे का किलानुमा फाटक उन्‍होंने चाबी लगाकर खोला। मैंने अंदाजा लगाया कि संभवत: बलराम जी आज अकेले ही हैं, इसलिए ताला लगाकर मुझे लेने स्‍टेशन आए थे। लेकिन अगले ही क्षण मेरा अंदाजा गलत साबित हो गया। दरवाजे के दूसरी ओर मीरा जी स्‍वागत के लिए तैयार थीं। असल में दरवाजे में आटोमैटिक लॉक है, जो दरवाजा बंद करते ही लग जाता है और उसे अंदर या बाहर दोनों तरफ से खोला जा सकता है।

बलराम जी का निवास कहने को वन बीएचके से भी छोटा है, पर उसमें तीन मंजिल होने से पर्याप्‍त जगह है। बैठक में पांच मिनट गुजरते गुजरते मीरा जी ने पूछा, चाय लेंगे या फिर भोजन करेंगे। साढ़े चार बज रहे थे। खाने का समय निकल चुका था। इस समय भोजन का मतलब था, रात का खाना खराब करना। इसलिए मैंने सोचा कि इस समय तो चाय ही बेहतर विकल्‍प है।

चाय पीकर हम निवास की सबसे ऊपरी मंजिल पर पहुंच गए। हालनुमा बड़े कमरे में बिछे गद्दे हमारा इंतजार कर रहे थे। छह बजे हमारी चर्चाएं शुरू हुईं और, बीच में रात के भोजन का आधा घंटा छोड़कर, रात के एक बजे तक जारी रहीं। बीच बीच में बलराम जी मित्रों को फोन करके मेरे आने तथा अगले दिन के मुलाकात के कार्यक्रम की जानकारी देते रहे। इस बीच कुछ मित्रों की सलाह पर उन्‍होंने दिलशाद गार्डन के डीयर पार्क में सुबह मिलने का कार्यक्रम भी बना लिया और कॉफी होम के कार्यक्रम का समय दोपहर दो से चार कर दिया।

2 फरवरी की सुबह हम मीरा जी के हाथ से बने पोहे का नाश्‍ता कर रहे थे और बलराम जी याद कर रहे थे देवास के पोहे। एक बार फिर कायनेटिक पर सवार थे हम दोनों। जीवन में यह पहला मौका था, जब मैंने हेलमेट तो पहना था, पर स्‍कूटर नहीं चला रहा था। हां जी, दिल्‍ली में तो पीछे बैठने वाले को भी हेलमेट पहनना होता है। बाहर सुहानी धूप खिली हुई थी। गंतव्‍य था डीयरपार्क। श्‍यामलाल कॉलेज पार करते करते पूरा इलाका घने कोहरे से ढका नजर आ रहा था। बहरहाल जब निकल ही पड़े थे, तो लौटने का सवाल नहीं था। 

पार्क में पहुंचे तो कोहरे के कारण बहुत कम लोग नजर आ रहे थे। पार्क के बाहर चाय की दुकान के पास बलराम जी ने स्‍कूटर खड़ा किया और एक हेलमेट स्‍कूटर की डिक्‍की के हवाले किया और दूसरा चाय दुकान मालिक के।

डीयर पार्क में तीन 'डियर' : भारतेन्‍दु मिश्र, रमेश आजाद और बलराम अग्रवाल
पार्क में घुसते हुए उन्‍होंने नजर दौड़ाई और बोले दो लोग तो नजर आ रहे हैं। एक हैं भारतेन्‍दु मिश्र और दूसरे रमेश आजाद। भारतेन्‍दु जी से मैं पहली बार मिल रहा था, पर नाम सुना हुआ लगा रहा था। बातों बातों में पता चला कि वे चकमक के पाठक रहे हैं। मुझे तुरंत याद आ गया। अब कुछ ऐसा रहा है कि जब तक मैं चकमक में काम कर रहा था तो जो चकमक के ग्राहक थे उनके नाम पते मेरी नजर से गुजरते रहते थे, भारतेन्‍दु जी का नाम भी उनमें था। रमेश जी से मैं एक पुस्‍तक मेले में मिला था और उन्‍होंने अपनी बाल कविताओं का संग्रह मुझे भेंट किया था। उन्‍होंने याद दिलाया कि वे लखनऊ में आयोजित बालसाहित्‍य कार्यशाला में भी मुझसे मिले थे। रमेश जी पक्षाघात के कारण स्‍पष्‍ट बोल नहीं पाते हैं, पर जो बोलते हैं वह समझ आता है।

डीयर पार्क में रमेश आजाद, राजेश उत्‍साही, डॉ.विश्‍वनाथ त्रिपाठी और भारतेन्‍दु मिश्र
बलराम जी ने बताया लगभग हर रविवार को वे लोग इस पार्क में एकत्रित होते ही हैं। सो नियमित रूप से आने वाले अन्‍य साथियों को उन्‍होंने फोन लगाया। पर कुछ ऐसा संयोग था कि आज के दिन किसी ने बढ़ई को बुलाया था, कोई बिजली का मीटर ठीक करवा रहा था, तो कोई यात्रा पर था, किसी को सरदी ने दबोचा था तो कोई कोहरे की चपेट में था। जब फोन पहुंचा तो डॉ विश्‍वनाथ त्रिपाठी रजाई में दुबके थे, लेकिन उन्‍होंने कहा कि वे आ रहे हैं। लगभग पन्‍द्रह मिनट बाद वे अपनी छड़ी टेकते हुए पार्क में नजर आए। उनके आने के पहले तक हम चार लोग वर्तमान राजनीतिक परिदृश्‍य पर एक दूसरे का सिर माथा खा रहे थे। उनके आते ही माहौल बदल गया। चर्चा एक दिन पहले संपन्‍न हुए एक कविता संग्रह लोकापर्ण कार्यक्रम की ओर मुड़ गई। त्रिपाठी जी उसमें मुख्‍य अतिथि थे और बलराम जी संचालक। कुछ समय चर्चा फिर राजनीति पर आ गई। 84 साल के त्रिपाठी जी का उत्‍साह देखते ही बनता है। लगभग घंटे भर की चर्चा और चाय के साथ यह मुलाकात सम्‍पन्‍न हुई। रमेश जी ने अपने घर चलने का आग्रह किया। उनसे वादा किया कि अगली बार उनके घर भी चलेंगे। भारतेन्‍दु जी, बलरामजी और मैंने त्रिपाठी को जी सायकिल रिक्‍शे पर सवार कराकर विदा किया। उसके बाद भारतेन्‍दु जी ने अपनी चिरपरिचित पान की दुकान से एक बीड़ा मुंह में दबाया। हमसे भी पान,बीड़ी,सिगरेट,गुटखा आदि का आग्रह किया। लेकिन बलराम जी और मैं दोनों ही इनसे दूर रहने वाले प्राणी ठहरे, सो हमने एक-एक इलायची लेकर उनके आग्रह की लाज रखी।

भारतेन्‍दु मिश्र, बलराम अग्रवाल और डा.विश्‍वनाथ त्रिपाठी
भारतेन्‍दु जी ने आग्रह किया कि अगली बार आऊं तो उनके निवास पर ठहरूं। मैंने इसे सधन्‍यवाद स्‍वीकार किया। फोन नम्‍बर का आदान-प्रदान हुआ। इस प्रकार आज की पहली मुलाकात सभा सम्‍पन्‍न हुई। 

बलरामजी और मैं दोपहर के भोजन के लिए घर वापस लौटे। भोजन करके हम निकल पड़े हम कनॉट प्‍लेस के कॉफी होम के लिए। बलराम जी ने शाहदरा मेट्रो स्‍टेशन पर स्‍कूटर पार्क किया और आगे की यात्रा हमने मेट्रो से की। बलराम जी के मेट्रो पास होने के कारण टिकट की लंबी लाइन में लगने से बच गए।
अनुप्रिया वहां पहुंच चुकीं थीं, बलराम जी ने देखा कि उनके मोबाइल पर उनके चार मिसकॉल हैं। ओमप्रकाश कश्‍यप जी भी पहुंच चुके थे। पर वे एक-दूसरे को पहले से नहीं जानते थे। इसलिए दोनों को ही हमारा इंतजार था।

कश्‍यप जी और बलराम जी एक-दूसरे से परिचित थे। मैं दोनों से पहली बार मिल रहा था। आरंभिक परिचय के बाद शुरू हुआ, साहित्‍य की चर्चाओं का दौर। अनु अपनी ताजा बाल कविताएं लाईं थीं, मुझे दिखाने और उन पर राय जानने के लिए। अब ऐसे काम के लिए अपन हमेशा तत्‍पर रहते हैं। संभवत 10 कविताएं रही होंगी। लगभग दस-पन्‍द्रह मिनट लगाकर मैंने उन्‍हें दो-तीन बार पढ़ डाला। और फिर बलराम जी और ओमप्रकाश की अनुमति लेकर उन पर अपनी राय से अनुप्रिया को विस्‍तार से अवगत कराया।

अनु जी कविताओं के विषय नवीन लगे। कहने का ढ़ंग भी नवीन लगा। लेकिन जो दोष नजर आया वह यह कि लगभग हर कविता के अंत तक आते आते वह कविता एक तरह के नारे में तब्‍दील हो जाती है या फिर शिक्षा देने लगती है। चर्चा में अनु जी ने इस बात को माना और इस ओर ध्‍यान देने का आश्‍वासन दिया। इस तरह की कुछ और बातों पर उनसे चर्चा हुई।

बाएं से : राजेश उत्‍साही,अनुप्रिया,बलराम अग्रवाल और ओमप्रकाश कश्‍यप  कॉफी होम  में वटवृक्ष के नीचे
लगभग दो घंटे चली हमारी इस गोष्‍ठी में हम कुल चार लोग थे। इसे गोष्‍ठी कहना भी उचित नहीं होगा। संज्ञा उपाध्‍याय और नरेन्‍द्र मौर्य ने आने का वादा किया था। लेकिन दोनों ही नहीं पहुंचे। संज्ञा ने बाद में संदेश भेजा कि उनकी आने की पूरी तैयारी थी, लेकिन ऐन वक्‍त पर उनके घर ही अतिथि आ गए। और नरेन्‍द्र ऑफिस में उलझ गए। सांभर वड़ा, चाय और केसरी हलवे के साथ इसका मुलाकात का समापन हुआ।

फिर वही मेट्रो से राजीव चौक से कश्‍मीरी गेट और फिर वहां से शाहदरा होते हुए हम घर पहुंचे। घर पहुंचते ही मीरा जी ने पूछा, अब क्‍या इरादा है भोजन करेंगे या..साथ ले जाएंगे..इस बार भी मुझे दूसरा विकल्‍प ज्‍यादा उपयुक्‍त लगा।

हजरत निजामुद्दीन से नौ बजे भोपाल एक्‍सप्रेस में सवार होना था। बलराम जी स्‍कूटर से मुख्‍य सड़क तक छोड़ने आए। आटो किया। आटो वाले ने डेढ़ सौ बताए..जब बलराम जी उससे मोलभाव करने लगे तो उसने कहा, साब मीटर के पैसे ही मांग रहा हूं। मीटर से भी इतने ही बनते हैं। हम भी उसकी बात मानकर बैठ गए.. जाना तो था ही।

अब असलियत यह है कि काले खां सराय स्‍टेशन के दरवाजे पर पहुंचकर भी मीटर की घड़ी 97:00 ही बता रही थी। पर जो तय हुआ था, वह तो देना ही था। उस पर बहस करना एक तरह से अनुचित था।

दो दिन की दिल्‍ली में बलराम जी, मीरा जी का आतिथ्‍य हमेशा याद रहने वाला है। पर जो नहीं भूलने वाला है वह यह कि अधिकांश मित्र केवल फेसबुक पर ही मिलने का वादा करते हैं...और जब सचमुच फेस दर फेस मिलने का मौका आता है तो उन्‍हें अपना वादा याद भी नहीं रहता। 
                                                  0 राजेश उत्‍साही

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

तीन तिलंगे


अगस्‍त,2013 में तीन बच्‍चों से मुलाकात हुई। तीनों एक से बढ़कर एक। अमूमन बच्‍चे हमारी शक्‍ल देखकर ही घबरा जाते हैं। पर ये तीनों बिलकुल नहीं घबराए। हमें भी संतोष हुआ कि कोई तो है जो हम से नहीं डरता। वैसे बड़े हों या छोटे एक बार पटरी बैठ गई, तो सामने वाले को भी अपने से बात करने में मजा आता है और अपने को भी। यकीन न हो तो आजमाकर देख लीजिए। चलिए फिलहाल इन तीन तिलंगों से मिलते हैं।  

ये हैं जनाब मोहम्‍मद इकान। विद्याभवन सोसायटी,उदयपुर के झाला गेस्‍टहाऊस में था मैं। ईद का दिन था, सो वहीं 'खोजें और जानें' के सम्‍पादन के काम में मशरूफ था। अचानक दरवाजे पर दस्‍तक हुई और विद्याभवन की साथी संगम इकान के साथ नमूदर हुईं, ईद मुबारक कहती हुईं।

इकान साहेब, अपने कुरते पाजामे में जम रहे थे। जमना शायद उनकी फितरत में था,
इसलिए लैपटॉप देखते ही पास की कुर्सी पर जम गए। उनका पूरा नाम उन्‍होंने ही बताया। शुरू हो गई बातचीत। ये क्‍या है, वो क्‍या है। मैंने उन पर काबू पाने के लिए  लैपटॉप में अपना फोटो संग्रह दिखाना शुरू किया। बंगलौर के बनरगट्टा नेशनल पार्क और मैसूर चिडि़याघर के बहुत से जानवरों की तस्‍वीरें उसमें हैं। लगभग तीन-चार साल के इकान सब जानवरों के नाम जानते थे। हाथी,शेर,बिल्‍ली,घोड़ा,बन्‍दर,जिराफ यहां तक कि जेब्रा भी। पर वे दो तस्‍वीरें नहीं पहचान सके। एक थी भालू महाशय की और दूसरी 'मेरी'।

मजे की बात यह कि तस्‍वीरें मेरे लैपटॉप में थीं, पर उनकी कहानियां इकान के पास। जैसे ही कोई तस्‍वीर सामने आती वे धाराप्रवाह शुरू हो जाते। जैसे कि हमारे घर पर भी एक शेर है...एक दिन शेर की बिल्‍ली से लड़ाई हो गई...या कि हमारे अंकल के पास तो बहुत बड़ी बंदूक है या कि एक दिन क्‍या हुआ..हम बाइक पर जा रहे थे...। मुझे समझ आ गया था कि ये जनाब बड़े होकर अच्‍छे कथावाचक बनेगें ।  

बहुत देर उनसे बातें हुईं। पहले उन्‍होंने चाय पी, फिर वे कटोरी में चिप्‍स लिए खाते रहे और हम यूं ही चबाते रहे। जब जाने लगे तो संगम ने लगभग दो मिनट के अंतराल के बाद तीन बार 'बाय' कहा। दो बार तो उन्‍होंने जवाब दिया, पर फिर तीसरी बार नाराज हो गए...बोले कह तो दिया एक बार 'बाय'। हमने भी धीरे से कहा...ईद मुबारक हो इकान। आज फिर कहते हैं .... ईद मुबारक।  

ये जनाब हैं उदयपुर के शौर्यप्रताप सिंह। बहुत हैरान-परेशान रहते हैं और उनसे ज्‍यादा उनकी मम्‍मी जया राठौड़ उनसे परेशान रहती हैं। अभी प्री स्‍कूल में हैं। उनके इतने सवाल होते हैं कि मम्‍मी के सारे जवाब खत्‍म हो जाते हैं। केवल सवाल ही नही सुझाव भी होते हैं, जिन पर अमल करने का दबाव भी होता है, वरना भूख हड़ताल शुरू हो जाती है। अब कोई बताए कि इस सवाल का क्‍या जवाब दिया जाए कि, 'आखिर रात सोकर ही क्‍यों काटनी या गुजारनी होती है।'

जिस युग के वे हैं, उस युग के तौर तरीकों का पालन करते हुए कम्‍प्‍यूटर पर गेम्‍स खेलना, पेटिंग करना और कार्टून देखना उनका शगल नहीं, बल्कि कर्तव्‍य है। एक दिन वे अपने कर्तव्‍य पालन में लगे थे। जया को कुछ काम करना था, पर शौर्य जी का काम पूरा नहीं हुआ था, सो वे देने के लिए तैयार नहीं थे। अंतत: ऐसी स्थिति बनी कि उन्‍होंने दो चपत लगाकर अपना लैपटॉप वापस लेना पड़ा।

शौर्य जी भी कम नहीं। उन्‍होंने कहीं से एक पुरानी फाइल की जुगाड़ की। दादी (दादी के लाड़ले जो ठहरे) के एक पेटीकोट का नाड़ा निकाला, उसका एक सिरा फाइल में बांधा और दूसरा बिजली के स्विच बोर्ड के पास ले जाकर उसमें अटका दिया। फिर अपनी एक छोटी हॉटव्‍हील कार ढूंढी उसमें भी एक धागा बांधा और उसके दूसरे सिरे को फाइल में बांधा। यह उनका माऊस था। फाइल कवर का एक हिस्‍सा उनके लैपटॉप का कीबोर्ड था और दूसरा स्‍क्रीन। अब कल्‍पना की तो कोई कमी ही नहीं है उनके पास। सो वे घंटों अपने उस लैपटॉप पर जो चाह रहे थे, वो करते रहे। 
एक बार स्‍कूल की कॉपी में उन्‍होंने लिखने की बजाय, कुछ गूदा गादी कर दी। अब उन्‍होंने तो चित्र बनाया था, टीचर को वह गूदा गादी नजर आई। डायरी में शिकायत दर्ज हो गई। घर में मम्‍मी ने पूछा, तो जवाब मिला,' हां गलती हो गई। अब ये बताइए कि करना क्‍या है।' और फिर अगले दिन एक कागज पर सॉरी लिखकर ले गए। 

पर आप इस धोखे में न रहें कि हर बार सॉरी बुलवा सकते हैं उनसे। टीचर-पैरेंटस मीटिंग में उनके सामने ही उनकी टीचर मम्‍मी से शिकायत कर रही थीं, कि इन्‍हें कुछ नहीं आता। ये किसी सवाल का जवाब नहीं देते हैं। जया यह सुनकर आश्‍चर्यचकित थीं। क्‍योंकि शौर्य घर में तो सारे सवालों का जवाब देता है, और वह सब जानता है, जिसके बारे में टीचर कह रही हैं। जया ने वहीं शौर्य से पूछा, कि ये क्‍या कह रही हैं। वे बोले, 'अगर टीचर डांटकर पूछेंगी, तो मैं कुछ भी नहीं बताऊंगा।' 
एक दिन उनके स्‍कूल में छुट्टी थी, सो मम्‍मी के साथ ऑफिस पहुंच गए। हम उनकी शौर्य गाथाएं सुनते ही रहते हैं, फिर भला वे हमारे कैमरे की जद में आए बिना कैसे बचते।

टेसू, हां यही नाम है इनका। पर ये मेरा टेसू यहीं अड़ा वाले टेसू नहीं हैं। ये जंगल में दहकने वाले टेसू यानी कि पलाश हैं। इनका वास्‍तविक नाम पलाश ही है। पर हां, इनकी सारी गतिविधियां मेरा टेसू यहीं अड़ा वाली ही हैं। भोपाल में अपने नाना यानी कि मदन सोनी जी के घर को इन्‍होंने दहका रखा है। लगभग डेढ़ साल के टेसू के पास खिलौनों की कमी नहीं है। पर एक खांटी बच्‍चे की तरह उन्‍हें भी खिलौने छोड़कर घर की बाकी सब चीजों से खेलने में मजा आता है। कुर्सी से लेकर वांशिग मशीन तक उनकी पहुंच से बाहर नहीं है। पूरे समय उनके नाना, नानी रैफरी और लाइनमेन की तरह फाउल-फाउल कहते सर्तक करते रहते हैं। लाल,पीले कार्ड नुमा आंखों का उन पर कोई असर नहीं होता। वास्‍तव में टेसू के रंग की भांति उन्‍होंने सबको अपने रंग में रंगा हुआ है। किसी भी चीज को छुपाकर वे दोनों हाथ हिलाते हुए कहते हैं यहां-वहां। यह उनका प्रिय आप्‍त वचन है। हर मम्‍मी की तरह उनकी मम्‍मी पारुल सोनी भी फिलहाल इस बात से हैरान-परेशान हैं कि जब वे घर में होती हैं, तो महाशय पूरे समय उनकी गोदी में ही लदे रहना चाहते हैं।
बहरहाल हमने इनको भी अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश की। 
                                                  0 राजेश उत्‍साही

शनिवार, 30 मार्च 2013

यह मुंह और मसूरी की सैर


19 जनवरी, 2013 की सुबह पांच बजे काठगोदाम एक्‍सप्रेस जब देहरादून स्‍टेशन पहुंची तो सारा शहर गहरे कोहरे में ढका हुआ था। ठंड पसरी हुई थी। हमें लेने गाड़ी आई थी, जाहिर है कि वह भी ठिठुर ही रही होगी। उसका ड्रायवर शायद मन ही मन हमें कोस रहा होगा, कि इन्‍हें भी आज ही आना था। मौसम ये तेवर पिछले दो दिनों में ही बदले थे। हम भी क्‍या कर सकते थे, हम तो अपनी डयूटी पर थे।
स्‍टेशन से होटल बहुत अधिक नहीं केवल चार किलोमीटर दूर था। कोहरे की वजह से दस मीटर से ज्‍यादा दूर का रास्‍ता नजर ही नहीं आ रहा था। कार ऐसे चल रही थी जैसे कोई साइकिल रिक्‍शा हो।
रूदपुर से ट्रेन रात लगभग साढ़े नौ बजे चली थी। मेरी बर्थ थर्ड एसी कोच के बीच में ऊपर की थी, सो मैं तो आराम से सोकर आया। पर मेरी सहकर्मी प्रिया को जो बर्थ मिली थी वह साइड की और दरवाजे के पास थी। मुझे मालूम था कि वहां रात भर आने-जाने वालों का तांता लगा रहेगा। भोपाल से दिल्‍ली आते हुए राजधानी एक्‍सप्रेस में मैं ऐसी एक रात भुगत चुका हूं। पहले मैंने सोचा था कि उनसे कहूं कि हम बर्थ बदल लेते हैं। फिर मैंने देखा कि मेरे सामने वाली बर्थ पर एक साहब थे जो अपने लैपटॉप पर कोई फिल्‍म देखने में मशगूल थे। उनका सोने का कोई इरादा दिख नहीं रहा था। इसलिए मैंने इरादा बदल दिया था। जाहिर है सो वे ठीक से नहीं सो सकीं थीं। होटल सिटी स्‍टार पहुंचते ही उन्‍होंने ऐलान किया कि वे देर तक सोएंगी। हम अपने- अपने कमरों में समा गए। मेरी नींद हो चुकी थी। होटल की खिड़की के बाहर भी कोहरा पसरा हुआ था। मैंने अपने कैमरे में उसे कैद
करने का असफल प्रयत्‍न किया। फिर खुद की एक तस्‍वीर खींची। लैपटॉप खोला और फेसबुक के सहारे यह खबर फैला दी कि देहरादून में क्‍या हाल है।

आठ बजते-बजते सूरज महाशय निकल आए थे। होटल की छत से जहां तक नजर जाती थी, सड़कों पर पानी भरा नजर आ रहा था। जो इस बात का सूचक था कि कल रात यहां बारिश भी हुई है। मसूरी भी नजर आ रही थी। उसकी चोटियों पर रूई की तरह जमी बर्फ धूप में चमक रही थी। हमारा मन किया हाथ बढ़ाकर उन चोटियों को छू लें। नींद तो हो गई थी, पर हफ्ते भर की थकान शरीर पर हावी थी। पिछले चार सालों से पांच दिन के हफ्ते में काम करने के बाद अब मन के साथ साथ शरीर भी शनिवार को आराम की मांग करता है। रोज की दिनचर्या भी ऐसी है कि पांच दिन पूरे होते-होते मन और तन दोनों टूटने लगते हैं। रोज सुबह साढ़े आठ से शाम के छह बजे तक का दफ्तर। आने-जाने का समय अलग। तय किया कि आज दिन भर आराम किया जाए। अगले दिन इतवार को मसूरी की पहाडि़यों पर जमी बर्फ से मुलाकात की जाए।

ये वादियां बुला रही हैं..हमें...
इतवार की सुबह हम मसूरी जाने के लिए निकले। होटल वाले को इस बात की सूचना दी तो उसने पूछा गाड़ी बुलवा दूं। हमने कहा नहीं, हम बस से ही जाएंगे। बस स्‍टैंड पहुंचे तो बस के लिए लगी लम्‍बी लाइन देखकर लगा कि आधा दिन तो यहीं टिकट लेने में बीत जाएगा। केवल मसूरी जाना नहीं था, वहां घूमना भी था और लौटना भी। मसूरी के लिए साझा टैक्‍सी भी थी। एक टैक्‍सी वाले से बात की। प्रति सवारी एकसौ पच्‍चीस रुपए। हमने कहा ठीक है। उसने अपनी टैक्‍सी की तरफ इशारा किया और कहा जाएं, बैठ जाएं। हम उसमें बैठे तो नहीं, पर उसके पास जाकर खड़े हो गए। पन्‍द्रह मिनट से ज्‍यादा समय गुजर गया। उसे और दो सवारियां चाहिए थीं। तभी हमारी नजर प्रीपैड टैक्‍सी बूथ पर पड़ी। व्‍यवस्‍था यहां भी वही थी। एक टैक्‍सी चार सवारियां लेकर जाएगी। प्रति सवारी एकसौ पचपन रुपए। हमने दो सवारियों की परची कटवाई और दो और का इंतजार करने लगे। पांच मिनट बीतते-बीतते दो सवारियां आखिर आ ही गईं। प्रिया आगे ड्राइवर के साथ वाली सीट पर बैठ गईं और हम तीनों पीछे ।

उनमें से एक ने सवाल किया, आप देहरादून से हैं या बाहर से आए हैं। हमने अपना परिचय दिया और बताया कि यहां अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में आए हैं। वे बोले, मैं यहीं देहरादून में रहता हूं, आपके दफ्तर के बिलकुल पास बलबीर रोड पर। ये मेरे रिश्‍तेदार हैं, जमशेदपुर से आए हैं। इन्‍हें मसूरी घुमाने ले जा रहा हूं। बातों-बातों में पता चला कि जनाब बीएचईएल में नौकरी करते थे। भोपाल में भी रहे हैं। कोई दस बरस पहले हरिद्वार,बीएचईएल से सेवानिवृत हुए हैं और अब देहरादून में ही निवास कर रहे हैं।

वे रास्‍ते भर पुराने देहरादून की याद करते रहे। पुराना इतिहास बताते रहे। हमारी नजरें बाहर के नजारों पर लगी हुई थीं और कान उनकी सूचनाओं पर। उनकी संगत में देहरादून से मसूरी का लगभग घंटे भर का रास्‍ता अच्‍छी तरह से कट गया। मसूरी पहुंचकर हमारे रास्‍ते जुदा-जुदा हो गए।


अपना कोई एजेंडा नहीं था। प्रिया को मसूरी में बनने वाली एक खास तरह की सेंडिल खरीदनी थी। इस सैंडिल की खासयित है कि इसमें आगे से लेकर पीछे तक एक लम्‍बी बद्दी को इस तरह लगाया जाता है आप उसे खींचकर पैर के हिसाब से ढीला या टाइट कर सकते हैं। प्रिया ने कभी बरसों पहले यहां से ये सेंडिल खरीदी थी। तो चलिए हमें एक लक्ष्‍य मिल गया था। एक दुकान में घुसकर पूछा। उन्‍हें कुछ पता नहीं था। प्रिया का कहना था, इन चप्‍पलों को स्‍थानीय कारीगर ही बनाते हैं। तो मुझे लगा कि किसी छोटी दुकान या फुटपाथ पर बैठने वालों से ही सही जानकारी मिलेगी। मिली भी। पर टुकड़ों-टुकड़ों में। जैसा कि हर जगह हो रहा है, बाहर से बनकर आने वाले रेडीमेड माल ने बाजार पर कब्‍जा कर लिया है, सो स्‍थानीय कारीगर और स्‍थानीय माल हाशिये पर चले गए हैं। लोग उनके बारे में भूलने लगे हैं। किसी ने कहा आगे जाकर भारतीय स्‍टेट बैंक की शाखा है, वहां से थोड़ा आगे जाएंगे वहां आपको एक दुकान मिलेगी। तो हम चल दिए बैंक खोजने । साथ के साथ मसूरी का नजारा भी करते जा रहे थे।

गलियां और सड़कों के किनारे पर और कहीं-कहीं तो पूरी सड़क पर बर्फ ही बर्फ जमा थी। जैसे बर्फ का कीचड़। पैदल चलते हुए भी हमें संभालकर पैर रखने पड़ रहे थे। एक जगह ऐसी आई जहां से दूर पहाड़ों पर जमा बर्फ का नजारा किया जा सकता था। मेरे हाथ में कैमरा था। प्रिया ने कहा लाइए मैं आपकी फोटो उतारती हूं। वहां एक नीचे ढलान पर उतरती हुई पक्‍की सड़क थी। हमारे आगे तीन लड़कियां थीं, जो एक-दूसरे की फोटो उतार रही थीं। मैं इस सड़क के ऊंचे वाले सिरे पर खड़ा था। मेरे पीछे मसूरी की वादी नजर आ रही थी। प्रिया फोटो लेने के लिए ढलान पर उतर रहीं थीं। वे लड़कियों से कह रहीं थीं, संभलकर कहीं फिसल न जाना। और ये कहते..कहते वे खुद ही फिसल गईं। जिस हाथ में कैमरा था वह नीचे और वे उसके ऊपर। तीनों लड़कियों ने सहारा देकर उन्‍हें उठाया। गिरने से उनका एक गाल बर्फ से रगड़ा गया था। बाकी सब ठीक था। कैमरा भी सही सलामत था। हालांकि बाद में पता चला कि बैटरी को पकड़कर रखने वाला लीवर धराशायी हो गया था। पर शुक्र है कि कैमरा काम कर रहा था।

इसके बाद तो प्रिया के अंदर फिसलने का डर ही बैठ गया। अब वे हर कदम संभालकर रख रहीं थीं। हमारे आगे पीछे तमाम युवा थे, जो मसूरी की इस बर्फ का आनंद उठा रहे थे। वे उस पर दौड़ रहे थे, फिसल रहे थे, एक-दूसरे पर बर्फ फेंक रहे थे। और हम दोनों थे कि संभल-संभलकर आगे बढ़ रहे थे..उम्र का तकाजा जो था।

हम कैमल बैक हिल की सड़क पर थे। कैमल बैक हिल के नाम से मशहूर यह पहाड़ी दूर से ऐसी लगती है कि जैसे कोई ऊंठ बैठा हो। इसी सड़क के एक किनारे एक शेड बना हुआ था जहां से खड़े होकर सामने फैली पहाडि़यों का देखा जा सकता था। कोने में चाय की एक छोटी सी दुकान भी थी। ऐसे मौसम में चाय..वह भी अदरक वाली..मिले तो क्‍या कहने। चाय की दुकान में एक महिला थी। हमने भी दो गिलास चाय मांगी। शेड पर जमा बर्फ धूप से पिघलकर पानी बनकर नीचे गिर रही थी। शेड के चारों तरफ ऐसा नजारा था, जैसे बारिश हो रही हो।
बाईं तरफ नीचे घर थे। जिनकी छत पर बर्फ जमा थी। देखने से ऐसा लगता था, जैसे किसी ने बर्फ का प्‍लास्‍टर कर दिया हो। एक घर की छत पर एक कोने में एक जनाब कोई किताब पढ़ रहे थे। वहीं छत पर जाने वाली सीढि़यों पर बैठी एक महिला आलू छील रही थी। एक दूसरे घर की छत पर एक कुत्‍ता चहलकदमी कर रहा था। ध्‍यान से देखने पर समझ आया कि वह छत से नीचे आने का रास्‍ता ढूंढ रहा है, पर रास्‍ता बंद है। शायद जानबूझकर उसे वहां कैद किया गया था। थोड़ा और नीचे नजर घुमाने पर
बच्‍चों का एक समूह बर्फ के गोलों को फुटबॉल की तरह पैरों से नीचे लुढ़‍काता नजर आया। जो नजारा हमारे लिए कुछ खास था, वही यहां के लोगों का जीवन था। हमने चाय पीते- पीते यह सब देखा।
अब तक हमें स्‍टेट बैंक नहीं मिला था। चाय वाली महिला से इस बारे में दरियाफ्त की। उसने कहा अभी यहां से कम से कम आपको 2 किलोमीटर और आगे जाना होगा। प्रिया और हम एक दूसरे को देखकर मुस्‍कराए और चल दिए आगे की तरफ। वैसे भी हमारे पास कोई और काम तो था नहीं। खोजते-खोजते आखिर बैंक मिल ही गया। सचमुच बैंक के पास चप्‍पल जूतों की एक  एक दुकान थी। पर बंद थी। आसपड़ोस में पूछने पर पता चला कि दुकान मालिक तो देहरादून में रहते हैं। अब क्‍या करें।

फिर एक फुटपाथ के दुकानदार से बात की। उसे बताया कि हम खास तरह की सेंडिल खोज रहे हैं। उसने बताया कि वह तो आपको लण्‍ढौर में मिलेंगी। हमने पूछा कितनी दूर है। हाथ के इशारे से दिशा बताई और जवाब मिला यही कोई आधा घण्‍टा। यानी कि आधा घण्‍टा लगेगा।

प्रिया ने पूछा, राजेश जी क्‍या इरादा है। थक तो नहीं गए। मैंने कहा, अपनी सोचिए। अपन तो दिन भर पैदल घूम सकते हैं। हम लोग अब तक लगभग पांच किलोमीटर तो चल चुके थे। लग रहा था कि प्रिया थक गई हैं। पर सेंडिल का मोह उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था। तो हम फिर चल दिए। आगे का रास्‍ता चढ़ाई वाला था। सामने से आने वाली गाडि़यों को भी जगह देनी थी और पीछे से आने वालियों को भी। ऊपर की तरफ जाने वाले गाडि़यां कहीं-कहीं बर्फ की फिसलन के कारण चढ़ने में दिक्‍कत महसूस कर रही थीं। ऐसे में उनके पीछे आने वाली गाडि़यों को एक निश्चित दूरी बनाकर चलना पड़ रहा था।

अब तक भूख लगने लगी थी। लेकिन कहीं कोई खाने की दुकान नजर नहीं आ रही थी। जो नजर आती थीं, वे होटलें थीं,जिनमें ठहरने का इंतजाम था। ठहरो तो खाना भी मिलेगा। पतली गलियों में दोनों तरफ दुकानें थीं। आसमान साफ था लेकिन दुकानों की छतों से पानी सड़क पर गिर रहा था, जैसे बारिश हो रही हो। यह छतों पर जमा बर्फ का पानी था। आखिरकार हम खाने की एक ठीक ठाक दुकान खोजने में सफल हो गए। यहां गरम पकोड़े और गाजर का हलवा खाने को मिला। उसके बाद हमने दो गिलास चाय पी और फिर निकल पड़े सेंडिलों की खोज में।

आखिरकार हम लण्‍ढौर पहुंच ही गए। उन खास सेंडिलों की दो दुकानें हमें मिल भी गईं। आठ बाई आठ की दुकान में चार कारीगर बैठकर खास और आम चप्‍पलें, जूते बना रहे थे। ठंड से बचने के लिए दुकान के बीचों बीच अलाव भी जल रहा था। प्रिया ने दोनों दुकानों से एक-एक जोड़ी खरीदी। क्‍योंकि दोनों दुकानों में इस तरह की सेंडिल का स्‍टॉक नहीं था। दुकानदार का कहना था कि अब इनकी बहुत मांग नहीं है। जब कोई कहता है तो हम बनाकर दे देते हैं। उसकी दुकान में एक फोटो लगी थी, जिसमें वह फिल्‍म एक्‍टर अरशद वारसी के साथ नजर आ रहा था। पूछने पर बताया कि अरशद वापसी किसी फिल्‍म की शूटिंग के सिलसिले में मसूरी आए थे, और वे तब हमारी दुकान में आए थे। तो अब हमारा अभियान खत्‍म हो गया था। दुकानदार ने ही हमें बस स्‍टैंड का रास्‍ता बताया। यह रास्‍ता मसूरी के मशहूर माल रोड से आकर मिलता था और फिर वहां से बस स्‍टैंड पर।
यह भी मसूरी ही है ..
लौटने के लिए भी टैक्‍सी लेनी थी। प्रीपेड टैक्‍सी काउंटर पर हमने दो टिकटें लीं और दो और सवारियों का इंतजार लगे। तभी आठ लड़कों का एक झुंड आया। काउंटर वाले ने उन्‍हें सुझाया कि आप अपने साथ इन्‍हें शामिल कर लें और दो गाडि़यां कर लें। उन्‍होंने हमसे पूछा और कहा कि एक गाड़ी में हमारे साथ वे तीन लोग होंगे। सुबह हम जिस टैक्‍सी में आए थे उसमें इतनी जगह थी कि पांच लोग बैठ सकते थे। इसलिए हमने हामी भर दी। लेकिन जब गाड़ी सामने तो वह मारुति वैन थी। जिसमें आगे ड्रायवर के साथ एक ही व्‍यक्ति बैठ सकता था और पीछे ठसकर चार व्‍यक्ति। लड़कों में से एक ने लपक कर ड्रायवर के साथ वाली सीट हथिया ली।हमारे पास पीछे बैठने के अलावा और कोई विकल्‍प नहीं था।  

प्रिया, मैं और दो लड़के जिस तरह से बैठे, उसमें खासी परेशानी हो रही थी। पर लड़कों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, न वे परेशान हो रहे थे। अंतत: मैंने ड्रायवर के पीछे बने गियर बक्‍से पर बैठने का निर्णय लिया और ड्रायवर की तरफ पीठ करके बैठ गया। पर यह भी कोई आरादायक स्थिति नहीं थी। हां, प्रिया और वे दोनों लड़के अब आराम से बैठे थे। जब लगभग  आधा रास्‍ता पार हो गया तब मुझे लगा कि जैसे मेरा दम घुट रहा है। मुझे समझ आया कि मैं जिस तरह से बैठा हूं उसमें मेरा पेट दब रहा है और सारा खाया-पिया जैसे गले में चढ़ रहा है। मुझे महसूस हुआ कि मैं किसी भी समय जो कुछ मेरे पेट में है उसे सामने बैठे लोगों पर उगल दूंगा। मैंने ड्रायवर से गाड़ी रोकने के लिए कहा। गाड़ी रुकते ही मैं बाहर निकला और खुली हवा में राहत की सांस ली। मैंने ड्रायवर से कहा कि वह पीछे सामान रखने वाली जगह का दरवाजा खोल दे। वहां इतनी जगह थी कि मैं आराम से लेट सकता था। बहरहाल फिलहाल तो मुझे लेटने नहीं, बैठने की जगह चाहिए थी। सो मैं वहीं पैर फैलाकर बैठ गया। मैं सोच रहा था कि सुबह जाते हुए जो दो लोग मिले थे, जो हम उम्र थे। जो हर दस मिनट में पूछते थे कि आपको बैठने में कोई दिक्‍कत तो नहीं हो रही। और एक ये नौजवान हैं जिन्‍हें अपने सिवाय किसी और की कोई परवाह ही नहीं है। 
पुरानी (एंटिक्र) वस्‍तुओं की एक दुकान माल रोड पर

माल रोड पर मसूरी नगरपालिका द्वारा बनवाई गया म्‍यूरल
यहां उन सैंडिलों की कोई तस्‍वीर नहीं है, जिनके बारे में आप पढ़ते रहे हैं। साथ की तस्‍वीरें  भी बहुत अच्‍छी नहीं हैं। पर यही मसूरी के बारे में वह सारी बात आपको बताएंगी, जिनका मैंने यहां कोई जिक्र नहीं किया है। पहले मुझे लगता रहा कि गिरने से कैमरे के लैंस को कोई क्षति पहुंची है जिससे तस्‍वीरें अच्‍छी नहीं आई हैं। पर बाद में समझ आया कि वातावरण में धूप के कारण लगातार बर्फ से उठती हुई पानी की नमी छाई हुई थी, जिससे तस्‍वीरें धुंधली आई हैं। बाद में  प्रिया से बात करते हुए यह भी पता चला कि कैमरे में बर्फीले मौसम में फोटो खींचने के लिए सैंटिंग करने की व्‍यवस्‍था होती है। अब अपना तो जीवन में इतनी बर्फ एक साथ देखने का यह पहला मौका था। सो यह ज्ञान भी अपने को नहीं था। इसीलिए तो हमने कहा कि, यह मुंह और मसूरी की सैर।                              0 राजेश उत्‍साही